क्या निषाद सिर्फ़ खेवनहार…..

निषाद बने सभी के खेवनहार,पर किसी दल ने नहीं किया इनके साथ न्याय,अनुसूचित जाति में जाने की आस धरी की धरी रह गयी।

लौटनराम निषाद


निषाद समुदाय की मल्लाह, केवट,बिन्द,मांझी,धीवर,कश्यप, कहार,गोड़िया,कश्यप,तुरहा,बाथम, रायकवार,मछुआ आदि सामाजिक, शैक्षिक,आर्थिक व राजनैतिक रूप से काफी पिछड़ी हुई हैं। इनका परम्परागत पुश्तैनी पेशा मत्स्याखेट व शिकारमाही, मत्स्य पालन, नौकाफेरी घाट,सिंघाड़ा,कमलगट्टा उत्पादन,बालू मौरंग खनन व नदियों की कछार में खरबूज,तरबूज आदि जायद की फसलों की खेती आदि रहा है।नदियों पर पक्का पुल, पांटून ब्रिज,पीपा पुल बन जाने से इनका नौकफेरी घाट बन्द हो गया।गंग बरार, नदी कछार की जमीनों पर बाहुबलियों, भू माफियाओं के कब्जा होने से जायद की खेती व नदियों,ताल-पोखरों,जलाशयों,झीलों के अतिक्रमण व मत्स्य माफियाओं के दखल से मछुआरा समाज की जातियाँ मत्स्य पालन से वंचित हो गयी है।इसी तरह बालू मोरंग खनन,निकासी पर पूरी तरह बालू माफियाओं के एकछत्र राज कायम हो गया है।


दो दशक से एससी में शामिल करने की इनकी मांग अधूरी-
उत्तर प्रदेश के जातिगत समीकरण में इनकी 10 प्रतिशत से अधिक संख्या होने के बाद भी निषाद समाज की जातियाँ लगभग हर क्षेत्र में पिछड़ी व उपेक्षित ही हैं।ग़ाज़ीपुर, जौनपुर, मिर्जापुर, सुल्तानपुर,चंदौली, वाराणसी,शाहजहांपुर, उन्नाव, गोरखपुर,फतेहपुर,अयोध्या, प्रयागराज,भदोही,अम्बेडकरनगर, सिद्धार्थनगर,सन्तकबीरनगर, बस्ती,महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया,हमीरपुर,चित्रकूट,बहराइच,श्रावस्ती,लखीमपुर,आज़मगढ़, बाराबंकी,पीलीभीत, शाहजहांपुर, कानपुर,बरेली,बदायूँ, मुजफ्फरनगर, शामली, इटावा, औरैया, कन्नौज, इटावा, एटा, फिरोजाबाद,आगरा,बाँदा,बलिया,रामपुर,बुलन्दशहर आदि जिलों में इनकी अच्छी खासी संख्या है।इनकी निर्णायक संख्या को देखते हुए ही कांग्रेस,भाजपा,सपा,बसपा आदि दलों ने निषाद मछुआ वर्ग को जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कराने का वादा किया।पर,किसी भी दल ने अपना वादा पूरा नहीं किया।


एससी में डालने के लिए अनुच्छेद-341 में संशोधन आवश्यक-
किसी भी जाति,उपजाति,जातीय समूह को अनुसूचित जाति का हिस्सा बनाने के लिए संविधान के अनुच्छेद-341 में संशोधन आवश्यक है।संविधान में संशोधन का अधिकार भारतीय संसद के पास निहित है।
सभी दलों ने घोषणा-पत्र में वादा किया,पर नहीं पूरा किया वादा-
विधानसभा चुनाव-2007 में काँग्रेस ने चुनाव घोषणा पत्र में संकल्प लिया था कि अन्य राज्यों की भाँति निषाद/मछुआ समुदाय की जातियों को एससी में शामिल किया जाएगा।जल आधारित इनके पेशों को भयाल किया जाएगा।कांग्रेस की 2014 तक केंद्र में सरकार थी ,पर नहीं पूरा किया अपना वादा।10 मार्च,2004 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने निषाद/मछुआ समुदाय की जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजा। 4 मार्च,2008 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने भी प्रधानमंत्री के नाम अर्द्धशासकीय पत्र भेजकर निषाद,मल्लाह,केवट,बिन्द, धीवर,गोड़िया आदि को अनुसूचित जाति में शामिल करने का आग्रह किया।यूपीए-1 व 2 की सरकार सपा,बसपा के समर्थन से ही चलती रही।पर,निषादों की आस पूरी नहीं हुई।भाजपा ने भी 2012 के दृष्टि पत्र में निषाद जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कराने व इनका परम्परागत पेशा दिलाने का वादा किया था। 5 अक्टूबर,2012 को भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मावलंकर ऑडिटोरियम दिल्ली में मछुआरा दृष्टि पत्र जारी करते हुए संकल्प लिया था कि 2014 में भाजपा की सरकार बनने पर आरक्षण की विसंगतियों को दूर कर सभी मछुआरा जातियों को एससी/एसटी का दर्जा दिलाया जाएगा।नीली क्रांति के माध्यम से मछुआरों का आर्थिक विकास किया जाएगा।पर,राम-निषादराज की मित्रता का बखान करने वाली भाजपा से निषादराज के वंशजों के साथ वादाखिलाफी पर उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया।

निषादों से सभी दलों ने किया वादाखिलाफी, आशाओं पर फेरा पानी

2002 से ही राष्ट्रीय निषाद संघ के माध्यम से निषाद समुदाय की जातियों को अनुसूचित जाति के आरक्षण व अधिकार कद लिए संघर्ष करते आ रहे चौ.लौटनराम निषाद ने कहा कि सभी दलों ने आरक्षण का लॉलीपॉप दिखाया,वादा किया।पर,कोई भी अपने वादे पर खरा नहीं उतरा।बहुत बड़ी आशा भाजपा से थी,पर भाजपा ने तो अपना वादा पूरा नहीं किया,उल्टे जो कुछ इनके पेशे बचे थे,योगी सरकार ने उसे भी छीन लिया।उत्तर प्रदेश में मझवार, तुरैहा, गोड़, बेलदार,खैरहा, खोरोट आदि जातियाँ 10 अगस्त, 1950 की राष्ट्रपति की प्रथम अधिसूचना के आधार पर अनुसूचित जाति में शामिल की गई हैं। मांझी, मल्लाह, केवट, राजगौड़, मुजाविर, गोड़ मझवार आदि सेन्सस ऑफ इण्डिया -1961 के अनुसार मझवार की पर्यायवाची व वंशानुगत नाम हैं। कई समाजशास्त्रियों व मानवशास्त्रियों ने उक्त सभी जातियों को एक दूसरे की पर्यायवाची व आदिवासी जाति करार दिया है। परन्तु अभी तक निषाद, मछुआ समुदाय की जातियों को सामाजिक न्याय नहीं मिला।राष्ट्रीय निषाद संघ के राष्ट्रीय सचिव चौ.लौटनराम निषाद ने बताया कि निषाद मछुआ समुदाय की जातियों का परम्परागत पुश्तैनी पेशा मत्स्य पालन, मत्स्याखेट व शिकारमाही, बालू, मौरंग खनन, सिंघाड़ा उत्पादन व नदियों की कछार में जायद की खेती रहा है। परन्तु सरकार की गलत नीतियों के कारण निषाद मछुआरों के परम्परागत पेशों पर मत्स्य माफियाओं, बालू व भू-माफियाओं का कब्जा हो गया है। उत्तर प्रदेश के जातिगत समीकरण में इस समाज की आबादी 12.91 प्रतिशत है और ये जातियां उ.प्र. की 169 सीटों पर विशेष प्रभावशाली व निर्णायक हैं। सभी दलों ने बारी-बारी इनको आरक्षण का लालीपॉप दिखाकर सरकारें बनाया, परन्तु किसी ने भी इन जातियों के साथ न्याय नहीं किया।

भाजपा व इसके आनुषांगिक संगठन चुनाव के समय श्री राम व निषादराज की मित्रता का हवाला देकर वोट लिया परन्तु सरकार बनने पर निषाद समाज के साथ दोयमदर्जे का बर्ताव किया।
निषाद ने बताया कि योगी कस नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने पर निषाद समाज अधिकार विहीन हो गया।योगी सरकार ने ई-टेंडरिंग की व्यवस्था कर बालू मोरम खनन व खुली बोली द्वारा मत्स्य पालन पट्टा का अधिकार निषादों से छीन लिया गया। विभिन्न दलों ने समय-समय पर केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजा व चुनाव घोषणा पत्र में वायदा किया।परन्तु केन्द्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्तावों पर सकारात्मक कदम नहीं उठाया।जिसके कारण यह समाज सामाजिक अन्याय का शिकार हो रहा है।निषाद ने कहा कि आज उत्तर प्रदेश व केन्द्र में भाजपा की सरकार होने के बाद भी निषाद, मछुआरा समाज की जातियों को न्याय नहीं मिल रहा है।उन्होंने अनुसूचित जाति में शामिल मझवार,तुरैहा, गोंड़ को परिभाषित कर मल्लाह, केवट, मांझी, बिन्द, धीवर, धीमर,तुरहा,गोड़िया,कहार,रायकवार आदि को अनुसूचित जाति का आरक्षण देने,मत्स्य पालन को कृषि का दर्जा देने,मत्स्य पालन का 10 वर्षीय पट्टा पुश्तैनी पेशेवर निषाद मछुआरा जातियों को देने की माँग किया है।


ये हैं निषाद समाज की उपजातियाँ- मल्लाह,केवट,मछुआ,बिन्द, धीवर, धीमर, गोड़िया,तुरहा,बाथम,रैकवार,मछुआ,माँझी, कहार,कश्यप।

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