जानें गुजरात का किंग मेकर कौन….?

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”इस समाचार को सुने”] गुजरात में किंग मेकर है ‘पिछड़ा वोट बैंक’, तय करते हैं चुनाव में सरकार की दशा और दिशा,गुजरात का जातिगत समीकरण दूसरे राज्यों से बिल्कुल अलग है। इस राज्य में हिंदू पिछड़ी जातियों की सबसे ज्यादा अधिकता है। राज्य की जनसंख्या में 52 फीसदी मतदाता पिछड़ा वर्ग की 146 जातियों से आते हैं।पिछड़ी जातियों में सबसे अधिक 24.22 प्रतिशत आबादी कोली मछुआरों की है।मीठे जल में मच्छीमारी करने वाले मछुआरे अपने को भाई, केवट, माछी, धीवर, कहार, गोडिया,मल्लाह आदि हैं,जिनकी संख्या भी गुजरात में अच्छी खासी है। उत्तर प्रदेश के निषाद समाज की भी गुजरात में बहुत अच्छी संख्या है।ये बलसाड़,नवसारी,नर्मदा,सूरत,भरूच,बड़ौदा,जामनगर,पालन,बनासकांठा,अहमदाबाद, सुरेंद्रनगर आदि जिलों व्यवसायरत हैं।


गुजरात में साल 2022 के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछ चुकी हैं।वहीं, राज्य की सत्ता पर पिछले 27 सालों से बीजेपी का कब्जा बना हुआ है ।जबकि 27 सालों से कांग्रेस गुजरात की सत्ता से दूर है। 1995 तक कांग्रेस गुजरात पर एक छत्र राज कर चुकी है।गुजरात की राजनीति में जातिगत समीकरण के बड़े मायने हैं।राज्य की 6 करोड़ की आबादी में से 52 फ़ीसदी यानी 3 करोड़ से अधिक पिछड़ा वर्ग की आबादी है। वहीं, प्रदेश में 146 जातियां OBC समुदाय में आती है।ऐसे में पिछड़ा वर्ग की यह जातियां ही तय करती है कि सत्ता पर कौन काबिज होगा।गुजरात की कुल आबादी की 24 प्रतिशत से अधिक आबादी कोली समाज की है जिनकी संख्या लगभग डेढ़ करोड़ हैं।कोली मछुआरा व खेतिहर दोनों हैं।उत्तरी गुजरात में ये क्षत्रिय कहलाना सम्मान समझते हैं।कोली समाज ऑस्ट्रिक/निषाद नश्ल की प्रमुख जाति है।भील व मीणा जाति भी निषाद नस्लीय हैं,जो एकलव्य को अपना पूर्वज मानते है।गुजरात में दूसरे नम्बर की जाति भील ही है जिनकी संख्या 15 प्रतिशत आदिवासी आबादी में 13 प्रतिशत से अधिक है।तीसरे नम्बर की जाति पाटीदार/कुनबी है,जिनकी आबादी 12 प्रतिशत से कुछ अधिक है और गुजरात में इसी जाति को गेमचेंजर मानकर भाजपा व कांग्रेस ज्यादा महत्व देती हैं।पाटीदार जाति 4 फिरकों कड़वा पटेल,लेऊआ पटेल,मोती और आंजना में विभक्त है।मोती व आंजना ओबीसी में हैं और कड़वा पटेल व लेऊआ पटेल सामान्य वर्ग में आते हैं।प्रदेश में 4 प्रतिशत कड़वा पटेल हैं तो 8 प्रतिशत लेऊआ पटेल हैं।कड़वा उत्तर प्रदेश के कुर्मी व लेऊआ पटेल कुशवाहा/कोयरी/मौर्य जैसे हैं।जिस तरह बिहार का कुर्मी अपने को राम पुत्र लव व कोयरी कुश का वंशज बताते हैं,वैसे ही गुजरात का कड़वा पटेल अपने को लववंशी व लेऊआ पटेल कुशवंशी बताते हैं।


दरअसल, प्रदेश में सवर्ण मतदाताओं की आबादी सबसे कम है।वहीं, दूसरी तरफ राज्य में पटेल समुदाय की आबादी 12 फीसदी है लेकिन यह जाति सबसे ज्यादा ताकतवर मानी जाती है। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव 2022 में गुजरात में 52 फ़ीसदी पिछड़ा वर्ग की जातियों को साधने के लिए बीजेपी और कांग्रेस अपने-अपने तरीके से कोशिशों में जुट गई हैं।हार्दिक पटेल पहले से कांग्रेस में हैं और सौराष्ट्र के नरेश पटेल जो बहुत बड़े व्यवसायी हैं,कांग्रेस उन्हें पार्टी में शामिल कराकर मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने का विचार कर रही है।मार खाय मांछी, माल खाय घाँची दक्षिणी गुजरात में यह कहावत बड़े जोर शोर से कही जाती है। मांछी व खारवा बड़े ही लड़ाकू व कट्टर हिंदू होते है।धर्म के मुद्दे पर मारकाट पर उतारू हो जाते हैं।गुजरात में मांछी,खारवा, कोली, तांडेल की संख्या गुजरात की कुल जनसंख्या की एक चौथाई से अधिक है और नरेन्द्र मोदी की मोड़घांची की आबादी महज 0.32 प्रतिशत है।धर्म के नाम पर मार खाता व लूटता पिटता मांछी कोली खारवा है और राजनीतिक,आर्थिक लाभ घांची उठाता है।भाजपा हो या कांग्रेस किसी ने कोली,खारवा, मांछी, भोई को समुचित प्रतिनिधित्व वी राजनीतिक सम्मान नहीं दिया।पाटीदारों को हमेशा दोनो दल चार चार दर्जन या इससे भी अधिक टिकट देते हैं,पर कोली को दर्जन भर भी नहीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 52 पाटीदारों को टिकट दिया तो कांग्रेस ने 43,वही सबसे बड़ी संख्या वाले कोली समाज को दोनो दल मात्र 11-11 टिकट ही दिए।

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