Wednesday, February 25, 2026
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हर दिल में बसे श्रीराम

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अयोध्या- हर किसी के दिल में बसे भगवान  श्रीराम को आज के दिन  ही  न्याय और भक्तो को प्रभु के दर्शन की अनुमति मिली थी  भक्तो के भगवान श्री राम आज के  दिन ही हुए थे तालो से आजाद यह अलग ही बिडम्बना है की भगवान को भी तालों में कैद रहना पड़ता और भक्तो से मिलने की अनुमति नहीं मिलती है हम बात कर रहे है धर्मनगरी अयोध्या की जो सिर्फ राम के नाम से ही जानी जाती है और जहाँ हर किसी के दिल बसते है राम आज ही वह दिन है जब लोगों के दिलो में बसने वाले भगवान श्रीराम को  अदालत के आदेश पर 1 फरवरी 1986 को आज़ादी मिली थी

कैसे 36 साल बाद आज़ाद हुए थे भगवान श्रीराम

वैसे तो भगवान श्रीराम को कोई ताला रोककर नहीं रख सकता है और ना  ही अपने भक्तों से मिलने से पर आज का ही वह शुभ  दिन है जब भगवान श्रीराम को कैद से आज़ादी मिली थी आज का दिन यानि  1 फरवरी का दिन रामजन्मभूमि आन्दोलन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। अदालत का आदेश मिलते ही इसी दिन सांयकाल 5.30 बजे तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट फैजाबाद इन्दुकुमार पाण्डेय एवं नगर मजिस्ट्रेट सभाजीत शुक्ला की उपस्थिति में शहर कोतवाल श्रीबृजपाल सिंह ने श्रीरामजन्मभूमि के मुख्य द्वार पर लगा ताला तोड़कर द्वार को खोल दिया था। अदालत के इस ऐतिहासिक निर्णय से चारों ओर श्रीरामलला की जय-जयकार की गूंज सुनाई देने लगी।

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क्यों हुआ भगवान श्रीराम का विरोध

भगवान श्रीराम को जहाँ तालों से आजाद होने के बाद लोगो में ख़ुशी का माहौल था तो वहीं  निर्णय के बाद ही मुसलमानों ने सरकार और न्यायपालिका पर एक पक्षीय कार्यवाही करने का आरोप लगाते हुये 1986 में ही बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया जिसके मुद्दई हाशिम अंसारी बनाये गये। आपको बता दे  यह वही कमेटी है जो अयोध्या में भगवान श्रीराम के पूजन स्थल होने  की बात को ही  नहीं मानती थी हालांकि इस मामले के मुद्दई हाशिम अंसारी अब इस दुनिया में नहीं रहे है।

क्यों होती है 1 फ़रवरी को न्याय दिवस के रूप में मनाने की मांग

कालान्तर के साथ ही 1 फरवरी 1986 का दिन भी लोग भूल गये। मंदिर विवाद के प्रतिवादी बाबा धर्मदास के प्रतिनिधि, शनिधाम पीठाधीश्वर व अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त तांत्रिक स्वामी हरिदयाल मिश्र कहते हैं कि जिस प्रकार 22 दिसम्बर को रामलला का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है उसी प्रकार 1 फरवरी को न्याय दिवस के रूप में मनाना चाहिए। क्योंकि 1 फरवरी 1986 को ही रामलला को न्याय मिला तथा उसी दिन से रामलला का पूजन, अर्चन, राग, भोग प्रारंभ हुआ जिसका अनुपालन विधि विधान पूर्वक आज तक होता आ रहा है।