विरोध का जवाब देने के लिए नया संगठन? ‘लाल हिट जनता पार्टी’

सौरभ वार्ष्णेय


देश की राजनीति में विरोध और प्रतिरोध की नई तस्वीर सामने आ रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच अभिजीत दीपके से जुड़ी बताई जा रही कॉकरोच जनता पार्टी  के मुकाबले ‘लाल हिट जनता पार्टी नाम से एक नए संगठन के सामने आने की खबर चर्चा का विषय बनी हुई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली में इस संगठन की पहली सदस्यता बैठक आयोजित की गई, जिसमें शामिल लोगों ने सीजेपी, कांग्रेस और अन्य प्रदर्शनकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाए। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि लोकतंत्र में विरोध की सीमा क्या होनी चाहिए और असहमति का जवाब किस तरीके से दिया जाना चाहिए।’लाल हिट जनता पार्टीÓ के प्रमुख और संयोजक अयान भटनागर के बयानों के मुताबिक, इस संगठन का उद्देश्य चुनाव लडऩा नहीं, बल्कि सीजेपी और उसके विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करना है। उनका दावा है कि संगठन भविष्य की रणनीति तैयार करेगा और विभिन्न स्थानों पर छोटे-बड़े समूहों के माध्यम से अपनी बात रखेगा।

उन्होंने सीजेपी को खुली बहस की चुनौती भी दी है। उनके अनुसार, यदि विरोध करने वाले अपने विचारों को लेकर आश्वस्त हैं, तो उन्हें सार्वजनिक चर्चा के लिए आगे आना चाहिए। यह घटनाक्रम केवल दो संगठनों के बीच टकराव की कहानी नहीं है। इसके पीछे लोकतांत्रिक विरोध, राजनीतिक लामबंदी, जनमत निर्माण और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न मौजूद हैं। किसी संगठन का विरोध करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन उस विरोध की वैधता और प्रभाव का आकलन उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्यों, तथ्यों और तरीकों से किया जाना चाहिए।लोकतंत्र में असहमति को दबाने के बजाय उसे सुनना और समझना आवश्यक है। किसी सरकारी संस्था, संवैधानिक पदाधिकारी या राजनीतिक दल के फैसलों से असहमति होने पर नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने, अपनी बात रखने और सवाल पूछने का अधिकार प्राप्त है। इसी तरह, किसी प्रदर्शन से असहमत नागरिकों को भी अपनी राय व्यक्त करने तथा उसके विरोध में शांतिपूर्ण अभियान चलाने का अधिकार है।इस दृष्टि से ‘लाल हिट जनता पार्टीÓ का सामने आना विरोध की राजनीति के जवाब में एक दूसरे विचार के उभरने के रूप में देखा जा सकता है। यदि एक समूह किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है, तो दूसरे समूह को उस प्रदर्शन की आलोचना करने से रोका नहीं जा सकता।

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इसी बहुलता में निहित है, जहां अलग-अलग विचारों को सामने आने का अवसर मिलता है।लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब वैचारिक असहमति व्यक्तिगत आरोपों, अपमानजनक भाषा और एक-दूसरे को समाप्त करने की राजनीतिक मानसिकता में बदल जाती है। लोकतंत्र में किसी विचार का मुकाबला बेहतर तर्क से होना चाहिए, न कि केवल तीखे नारों और उत्तेजक नामों से। किसी संगठन की लोकप्रियता का वास्तविक आकलन इस बात से होगा कि वह जनता के सामने कौन-से तथ्य रखता है और जनहित के सवालों पर उसका दृष्टिकोण कितना स्पष्ट है।मीडिया रिपोर्टों में सीजेपी से जुड़े लोगों पर अराजकता फैलाने और विदेशी फंडिंग प्राप्त करने जैसे आरोप लगाए जाने की बात सामने आई है। इन आरोपों को गंभीरता से देखा जा सकता है, लेकिन किसी भी आरोप को प्रमाण के बिना स्थापित तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा। यदि किसी संगठन की गतिविधियों, वित्तीय स्रोतों या प्रदर्शन के दौरान उसके आचरण को लेकर संदेह है, तो संबंधित तथ्यों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता सभी संगठनों के लिए आवश्यक है।

जो संगठन जनता के नाम पर आंदोलन करते हैं, उनसे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे अपने उद्देश्यों, नेतृत्व, वित्तीय संसाधनों और गतिविधियों के संबंध में जवाबदेह रहें। लेकिन यही कसौटी उन संगठनों पर भी लागू होनी चाहिए जो विरोध प्रदर्शनों का प्रतिरोध करने के लिए सामने आते हैं।एक पक्ष पर लगाए गए आरोपों को दूसरे पक्ष की स्वत: निर्दोषता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कानून का शासन इसी सिद्धांत पर आधारित है कि जांच तथ्यों के आधार पर हो, न कि राजनीतिक पसंद और नापसंद के आधार पर। यदि किसी संगठन को लेकर गंभीर शिकायत है, तो सक्षम संस्थाओं को नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। आरोपों के आधार पर किसी समूह को दोषी घोषित करना न्यायपूर्ण लोकतंत्र की भावना के विपरीत है।अयान भटनागर ने सीजेपी को खुली बहस की चुनौती दी है।

यह पहल अपने आप में महत्वपूर्ण हो सकती है, बशर्ते बहस का उद्देश्य केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाना न होकर जनता के सामने तथ्यों को स्पष्ट करना हो। लोकतंत्र में सार्वजनिक संवाद की संस्कृति कमजोर पडऩे का एक बड़ा कारण यह है कि राजनीतिक और वैचारिक समूह अक्सर विरोधी विचारों को सुनने के बजाय उन्हें पूरी तरह खारिज करने लगते हैं।यदि सीजेपी और ‘लाल हिट जनता पार्टीÓ के प्रतिनिधि किसी सार्वजनिक मंच पर आमने-सामने बैठकर अपने विचार रखते हैं, तो जनता को दोनों पक्षों के तर्क समझने का अवसर मिल सकता है। ऐसी बहस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध के कारण, प्रदर्शन की वैधता, निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े सवाल, राजनीतिक दलों की भूमिका और सार्वजनिक व्यवस्था पर पडऩे वाले प्रभाव जैसे विषय शामिल किए जा सकते हैं।हालांकि, बहस केवल चुनौती देने से सफल नहीं होती। इसके लिए तथ्यात्मक तैयारी, संयमित भाषा और विरोधी पक्ष को सुनने की इच्छाशक्ति भी आवश्यक है। यदि दोनों समूह पहले से तय निष्कर्षों के साथ मंच पर आते हैं और केवल आरोप-प्रत्यारोप करते हैं, तो उससे राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत, प्रमाणों और तर्कों पर आधारित संवाद लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है।

अयान भटनागर ने यह भी दावा किया है कि प्रदर्शनों के कारण कारोबारियों का धंधा प्रभावित हो रहा है। उन्होंने प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों के साथ कथित बदसलूकी का मुद्दा भी उठाया। इन शिकायतों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन व्यापक सिद्धांत स्पष्ट है कि किसी भी आंदोलन के दौरान आम नागरिकों के अधिकारों और सार्वजनिक सुविधाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए।बाजारों में काम करने वाले व्यापारी, दैनिक मजदूरी करने वाले श्रमिक, कार्यालय जाने वाले कर्मचारी, मरीज और विद्यार्थी किसी भी राजनीतिक विवाद के प्रत्यक्ष पक्षकार नहीं होते। यदि विरोध प्रदर्शनों के कारण यातायात बाधित होता है, दुकानों का कारोबार प्रभावित होता है या लोगों को आवश्यक सेवाओं तक पहुंचने में कठिनाई होती है, तो इसका समाधान निकालना जरूरी है।इसका अर्थ यह नहीं कि कारोबार या यातायात में असुविधा का हवाला देकर हर प्रदर्शन पर रोक लगा दी जाए। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है।

आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन प्रदर्शन के लिए उचित स्थान, समय और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करे तथा आयोजक कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखें। पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार या हिंसा की कोई घटना होती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इसी प्रकार, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।अयान भटनागर का यह कहना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक फोन कर दें तो बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर आ सकते हैं, राजनीतिक लामबंदी की संभावनाओं की ओर संकेत करता है। लेकिन किसी नेता के आह्वान पर भीड़ जुट जाना और किसी विचार को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त होना दो अलग-अलग बातें हैं।भीड़ की संख्या किसी संगठन की वास्तविक सामाजिक स्वीकार्यता का एकमात्र प्रमाण नहीं हो सकती। जनसमर्थन का मूल्यांकन इस बात से भी होना चाहिए कि संगठन कितने समय तक सक्रिय रहता है, समाज के वास्तविक मुद्दों पर क्या योगदान देता है और अपने विचारों को कितनी स्पष्टता से प्रस्तुत करता है।


 किसी भी राजनीतिक या सामाजिक संगठन की विश्वसनीयता उसके काम, व्यवहार और जवाबदेही से बनती है। यदि ‘लाल हिट जनता पार्टीÓ वास्तव में सीजेपी की गतिविधियों का वैचारिक प्रतिरोध करना चाहती है, तो उसे अपने उद्देश्यों और कार्ययोजना को स्पष्ट करना होगा। केवल किसी विरोधी संगठन के खिलाफ खड़ा होना स्थायी राजनीतिक पहचान बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। जनता यह भी जानना चाहेगी कि संगठन लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों, चुनावी पारदर्शिता और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे सवालों पर क्या सोचता है।


भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में विचारों का टकराव स्वाभाविक है। यहां सत्ता पक्ष और विपक्ष, सरकार समर्थक और सरकार विरोधी, तथा अलग-अलग सामाजिक समूहों को अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन इस अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। किसी आंदोलन को केवल उसके विरोधियों की नाराजगी के आधार पर गलत नहीं कहा जा सकता और किसी विरोधी संगठन को केवल उसके नाम या राजनीतिक झुकाव के आधार पर खारिज करना भी उचित नहीं है।


‘लाल हिट जनता पार्टी का उदय फिलहाल सीजेपी के विरोध में एक नई संगठनात्मक पहल के रूप में सामने आया है। यह पहल आगे किस दिशा में जाएगी, इसका आकलन उसके भविष्य के कार्यों और सार्वजनिक व्यवहार के आधार पर ही किया जा सकता है। अभी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा संगठन किसे चुनौती देता है, बल्कि यह है कि इस राजनीतिक टकराव से लोकतांत्रिक विमर्श को क्या हासिल होगा।
यदि दोनों पक्ष तथ्य, तर्क और शांतिपूर्ण संवाद का रास्ता अपनाते हैं, तो जनता को लाभ हो सकता है। लेकिन यदि यह मुकाबला केवल आरोपों, उत्तेजक नारों और भीड़ जुटाने की प्रतिस्पर्धा तक सीमित रहा, तो लोकतंत्र के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाएंगे।


लोकतंत्र में किसी विचार का जवाब दूसरा विचार है, किसी आरोप का जवाब प्रमाण है और किसी विवाद का बेहतर समाधान संवाद है। सीजेपी हो या ‘लाल हिट जनता पार्टी, दोनों के लिए असली चुनौती एक-दूसरे को हराना नहीं, बल्कि जनता के सामने अपनी विश्वसनीयता साबित करना है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब विरोध का अधिकार सुरक्षित रहे, विरोध का विरोध करने की स्वतंत्रता भी बनी रहे और दोनों के बीच कानून, मर्यादा तथा जनहित की सीमाओं का सम्मान किया जाए।

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