
भारतीय कृषि लंबे समय से मौसम, मिट्टी और बाजार की अनिश्चितताओं के बीच अपना रास्ता तलाशती रही है। किसान के लिए खेती केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ रोज होने वाला संवाद है। अब इस संवाद में तकनीक की आवाज भी शामिल हो रही है। मोबाइल पर मौसम की सूचना, मिट्टी का डिजिटल विश्लेषण, उपग्रह से खेतों की निगरानी, ड्रोन से फसल पर छिड़काव, डिजिटल मंडियों में कीमतों की जानकारी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कृषि सलाह धीरे-धीरे खेती के पारंपरिक तौर-तरीकों को बदल रही है। इसलिए डिजिटल खेती को केवल आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल मानना पर्याप्त नहीं होगा; यह खेती में निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया के बदलने का संकेत है।
भारत में कृषि की महत्ता को देखते हुए यह बदलाव महत्वपूर्ण है। किसान के सामने केवल उत्पादन बढ़ाने की चुनौती नहीं है। उसे यह भी तय करना होता है कि कब बोना है, कितना बीज डालना है, सिंचाई कब करनी है, किस मात्रा में उर्वरक देना है, फसल में बीमारी की पहचान कैसे करनी है और तैयार उपज को किस बाजार में बेचने पर बेहतर मूल्य मिल सकता है। डिजिटल तकनीक इन सवालों के जवाब आंकड़ों और समय पर उपलब्ध सूचना के माध्यम से देने की कोशिश कर रही है। सही सूचना सही समय पर मिले तो किसान का गलत निर्णय बच सकता है और लागत भी घट सकती है।
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इसी दिशा में सितंबर 2024 में 2,817 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ डिजिटल कृषि मिशन को मंजूरी दी गई। इसके तहत कृषि क्षेत्र के लिए डिजिटल सार्वजनिक ढांचा विकसित करने की योजना है। इसमें किसान पंजीकरण, बोई गई फसल का अभिलेख, भू-संदर्भित गांवों के मानचित्र, कृषि निर्णय सहायता प्रणाली और मृदा संबंधी जानकारी जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। मार्च 2026 तक देश में 9.20 करोड़ से अधिक किसान पहचान-पत्र बनाए जा चुके थे। इससे किसानों को सरकारी योजनाओं, कृषि बीमा, ऋण और अन्य सेवाओं से जोड़ने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है।
डिजिटल खेती का दूसरा बड़ा आधार अंतरिक्ष और दूरसंवेदी तकनीक है। उपग्रह चित्रों की सहायता से फसल की स्थिति, मिट्टी की नमी, सूखे और मौसम से जुड़े संकेतकों का अध्ययन किया जा सकता है। कृषि क्षेत्र में अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल प्रमुख फसलों के उत्पादन पूर्वानुमान और सूखा निगरानी जैसे कार्यों में किया जा रहा है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में भी उपग्रह चित्र, ड्रोन और दूरसंवेदी तकनीक का उपयोग फसल क्षेत्र तथा नुकसान के आकलन को अधिक सटीक बनाने के लिए किया जा रहा है।
ड्रोन तकनीक डिजिटल खेती का सबसे दिखाई देने वाला चेहरा बनकर सामने आई है। खेत के ऊपर उड़ता ड्रोन अब केवल तस्वीर लेने का उपकरण नहीं है। इसका इस्तेमाल कीटनाशकों और तरल उर्वरकों के छिड़काव जैसी गतिविधियों में किया जा रहा है। ‘नमो ड्रोन दीदी’ योजना के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन उपलब्ध कराने की पहल की गई है। चयनित समूहों को ड्रोन पैकेज की लागत पर 80 प्रतिशत तक केंद्रीय सहायता, अधिकतम आठ लाख रुपये तक, देने का प्रावधान है। गांव या किसान समूह के स्तर पर ड्रोन सेवा उपलब्ध हो तो छोटे किसान भी इसका लाभ ले सकते हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं और युवाओं के लिए तकनीकी सेवाओं से जुड़े रोजगार भी बन सकते हैं।
खेती का एक निर्णायक मोर्चा बाजार है। किसान की मेहनत का वास्तविक मूल्य खेत में नहीं, बाजार में तय होता है। उत्पादन अच्छा हो लेकिन उचित मूल्य न मिले तो तकनीकी सुधार का लाभ अधूरा रह जाता है। राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम ने कृषि उपज के व्यापार को डिजिटल मंच से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मार्च 2026 तक 1,656 मंडियां इससे जुड़ चुकी थीं और 1.80 करोड़ से अधिक किसान तथा 4,724 किसान उत्पादक संगठन पंजीकृत थे। मार्च 2026 तक इस मंच पर 13.25 करोड़ मीट्रिक टन कृषि उपज का व्यापार हुआ, जिसका मूल्य लगभग 4.84 लाख करोड़ रुपये रहा।
डिजिटल बाजार का अर्थ केवल ऑनलाइन व्यापार नहीं है। किसान को अलग-अलग मंडियों में चल रहे भाव की जानकारी मिले, गुणवत्ता के आधार पर उपज का मूल्य तय हो और भुगतान अधिक पारदर्शी हो, तो उसकी बाजार संबंधी समझ मजबूत हो सकती है। सूचना बाजार में किसान की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ा सकती है। लेकिन केवल डिजिटल मंच बना देने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। परिवहन, भंडारण, गुणवत्ता परीक्षण, स्थानीय बाजार व्यवस्था और मांग जैसे कारक आज भी महत्वपूर्ण हैं। डिजिटल तकनीक बाजार का विकल्प नहीं, बल्कि उसे अधिक पारदर्शी बनाने का माध्यम है।
अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता खेती के अगले चरण की ओर संकेत कर रही है। मिट्टी, मौसम, फसल की अवस्था और पिछले उत्पादन से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करके किसान को अधिक व्यक्तिगत सलाह दी जा सकती है। किसी क्षेत्र में बीमारी फैलने की आशंका हो तो समय रहते चेतावनी दी जा सकती है। सिंचाई की आवश्यकता का अनुमान लगाया जा सकता है और उर्वरक का उपयोग फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार किया जा सकता है। इसका उद्देश्य खेत को मशीनों से भर देना नहीं, बल्कि किसान के अनुभव और वैज्ञानिक जानकारी के बीच बेहतर तालमेल बनाना होना चाहिए।
तकनीक का सबसे बड़ा लाभ वहां दिखाई देगा जहां वह संसाधनों की बचत करेगी। पानी की हर बूंद और उर्वरक की हर मात्रा का महत्व बढ़ रहा है। यदि सेंसर और आंकड़ों की सहायता से किसान यह जान सके कि खेत के किस हिस्से में कितनी नमी है, तो अनावश्यक सिंचाई कम की जा सकती है। फसल की वास्तविक स्थिति के अनुसार पोषक तत्वों का उपयोग किया जाए तो लागत घटने के साथ मिट्टी पर दबाव भी कम हो सकता है। इस दृष्टि से डिजिटल खेती केवल उत्पादन बढ़ाने का नहीं, टिकाऊ कृषि का भी माध्यम बन सकती है।
लेकिन डिजिटल खेती के रास्ते में कई वास्तविक चुनौतियां हैं। सभी किसान समान आर्थिक क्षमता, डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट सुविधा वाले नहीं हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए महंगे उपकरण और निजी डिजिटल सेवाएं कठिन हो सकती हैं। स्थानीय भाषाओं में भरोसेमंद कृषि सलाह की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है। कई बार किसान के पास सूचना होती है, लेकिन उसके आधार पर निर्णय लेने के लिए प्रशिक्षण और स्थानीय सहायता नहीं होती। इसलिए डिजिटल कृषि का अर्थ केवल स्मार्टफोन या इंटरनेट की उपलब्धता नहीं है; इसके साथ प्रशिक्षण, कृषि विशेषज्ञों की सहायता और सरल भाषा में विश्वसनीय जानकारी भी जरूरी है।
सबसे जरूरी बात यह है कि डिजिटल खेती किसान के ऊपर थोपी गई तकनीकी परियोजना नहीं बननी चाहिए। तकनीक खेत की वास्तविक जरूरत से निकले और किसान की भाषा में किसान तक पहुंचे, तभी उसका प्रभाव स्थायी होगा। यदि मोबाइल पर मौसम की सूचना आ जाए लेकिन किसान के पास सिंचाई का साधन न हो, बीमारी की पहचान हो जाए लेकिन उपचार उपलब्ध न हो, या मंडी का भाव पता चल जाए लेकिन उपज को वहां तक ले जाने की व्यवस्था न हो, तो सूचना अपनी पूरी उपयोगिता हासिल नहीं कर पाएगी।
भारतीय कृषि का भविष्य न केवल परंपरा में है और न केवल तकनीक में। असली रास्ता दोनों के संतुलन में है। किसान का वर्षों का अनुभव और वैज्ञानिक आंकड़ों का विश्लेषण एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। किसान मौसम के मिजाज को अपने अनुभव से समझता है, जबकि आधुनिक प्रणालियां आंकड़ों के आधार पर संभावित बदलाव का अनुमान लगा सकती हैं। जब अनुभव और विज्ञान साथ चलेंगे, तभी कृषि अधिक टिकाऊ, लाभकारी और जोखिम-सक्षम बन सकेगी।
डिजिटल खेती का अंतिम लक्ष्य खेत को डिजिटल बनाना नहीं, किसान को अधिक सक्षम बनाना होना चाहिए। आने वाले वर्षों में वही तकनीक सफल होगी जो किसान की लागत घटाए, संसाधनों का बेहतर उपयोग कराए, बाजार तक उसकी पहुंच बढ़ाए और प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम से निपटने में सहायता करे। खेत में हल और ट्रैक्टर के साथ अब आंकड़े, उपग्रह, ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी उतर रहे हैं। सवाल यह नहीं कि खेती में तकनीक आएगी या नहीं; असली सवाल यह है कि वह किसान की जिंदगी को कितना बेहतर बना पाएगी। यही डिजिटल खेती की सबसे बड़ी परीक्षा और भारतीय कृषि के भविष्य की असली कसौटी है।



