स्त्री देह पर अटकी सोच, विश्वगुरु बनने के सपने!

डॉ. सत्यवान सौरभ

सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने, विचार व्यक्त करने और दुनिया से जुड़ने का अवसर दिया है। यह ज्ञान, विज्ञान, साहित्य, कला और सामाजिक सरोकारों को व्यापक स्तर पर पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन सकता है। लेकिन सवाल यह है कि हम इस माध्यम का इस्तेमाल किसलिए कर रहे हैं? वैज्ञानिक खोजों को समझने के लिए, साहित्य पढ़ने के लिए, देश-दुनिया की समस्याओं पर विचार करने के लिए या दूसरों की तस्वीरों में शरीर के अंग तलाशने और अश्लील टिप्पणियाँ करने के लिए? यह सवाल केवल सोशल मीडिया के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि हमारी मानसिकता, रुचियों और सामाजिक प्राथमिकताओं का भी है।

एक महिला की शिकायत है कि उसकी तस्वीरों पर बार-बार इस तरह की टिप्पणियाँ की जाती हैं कि वह हर फोटो में अपना पिछवाड़ा क्यों दिखाती है। ऐसे कमेंट्स सैकड़ों बार आ चुके हैं। यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। तस्वीर पर टिप्पणी करने वाले व्यक्ति की दृष्टि क्या है? वह किसी महिला की पूरी तस्वीर, उसके व्यक्तित्व, उसके काम या उसकी उपलब्धियों को देखने के बजाय शरीर के किसी एक हिस्से पर ही क्यों अटक जाता है? क्या सोशल मीडिया पर किसी महिला की मौजूदगी का अर्थ यही रह गया है कि उसके शरीर पर सार्वजनिक टिप्पणियाँ की जाएँ?

इस महिला का जवाब भी तीखा है। वह कहती है कि जब कुछ लोगों को इसी तरह की तस्वीरों में दिलचस्पी है, तो वह उन्हें वही दिखाती है, क्योंकि उनकी रुचि और समझ का स्तर इससे आगे बढ़ता दिखाई नहीं देता। उसके जवाब में व्यंग्य है, आक्रोश है और उन लोगों के प्रति उपेक्षा भी है, जो किसी महिला की तस्वीर को उसके व्यक्तित्व के बजाय उसके शरीर तक सीमित कर देते हैं। हालाँकि, इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष किसी महिला की तस्वीर या उसका जवाब नहीं, बल्कि वह मानसिकता है जो महिलाओं को लगातार वस्तु की तरह देखने और उनके शरीर पर अश्लील टिप्पणियाँ करने को सामान्य मान बैठी है।

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यहाँ एक बुनियादी बात समझने की जरूरत है। किसी महिला को अपनी तस्वीर में क्या दिखाना है, यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है। किसी को उसकी तस्वीर पसंद आ सकती है, किसी को नहीं भी आ सकती। लेकिन पसंद और नापसंद के नाम पर अश्लीलता परोसना, अपमानजनक टिप्पणियाँ करना या किसी के चरित्र पर हमला करना उचित नहीं हो जाता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि दूसरे व्यक्ति की गरिमा को कुचलने का अधिकार मिल गया। किसी की तस्वीर पर असहमति जताने और उसे अपमानित करने के बीच स्पष्ट अंतर है।

इस प्रसंग का दूसरा पहलू और भी गंभीर है। जब रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाले वैज्ञानिकों की उपलब्धियों पर पोस्ट साझा की जाती है, तो उस पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती। पोस्ट को सौ लोग भी पसंद नहीं करते, पचास लोग भी अपने विचार व्यक्त नहीं करते। वहीं, शरीर को केंद्र में रखने वाली तस्वीरों पर लोगों की दिलचस्पी कहीं अधिक दिखाई देती है। यदि किसी सोशल मीडिया उपयोगकर्ता का अनुभव ऐसा है, तो इस पर विचार होना चाहिए कि हमारी सामूहिक रुचियाँ किस दिशा में जा रही हैं।

हालाँकि, किसी एक पोस्ट पर मिले लाइक और टिप्पणियों के आधार पर पूरे समाज की बौद्धिक क्षमता का फैसला नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम, पोस्ट का समय, प्रस्तुति, विषय और दर्शकों की रुचि भी उसकी पहुँच को प्रभावित करते हैं। फिर भी, यदि बार-बार यही अनुभव सामने आता है कि मनोरंजन और देह-केंद्रित सामग्री पर अधिक प्रतिक्रिया मिलती है, जबकि विज्ञान, शोध और गंभीर चिंतन पर उदासीनता दिखाई देती है, तो यह हमारी डिजिटल संस्कृति की समीक्षा करने का उचित अवसर है।

हम चाहते हैं कि भारत विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करे। हम चाहते हैं कि हमारे वैज्ञानिक नई खोजें करें, हमारे विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय अनुसंधान केंद्र बनें और हमारी युवा पीढ़ी चिकित्सा, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा रसायन विज्ञान में नए कीर्तिमान स्थापित करे। हम अमेरिका, चीन और इसराइल जैसे देशों की तकनीकी उपलब्धियों से आगे निकलने की आकांक्षा रखते हैं। लेकिन क्या केवल नारों से ऐसा संभव है? क्या विश्वगुरु बनने का सपना देखते हुए हम वैज्ञानिकों के काम को जानने, शोध को समझने और ज्ञान को साझा करने की जिम्मेदारी से बच सकते हैं?

किसी देश की वैज्ञानिक प्रगति केवल प्रयोगशालाओं में नहीं होती। उसके लिए ऐसा सामाजिक वातावरण भी चाहिए, जहाँ जिज्ञासा का सम्मान हो, सवाल पूछने की आदत विकसित हो, शोध करने वालों को प्रोत्साहन मिले और ज्ञान को प्रतिष्ठा प्राप्त हो। जब युवा किसी वैज्ञानिक की उपलब्धि पर चर्चा करते हैं, किसी शोध के निष्कर्षों को समझते हैं और किसी नई तकनीक के सामाजिक प्रभाव पर विचार करते हैं, तभी वैज्ञानिक चेतना समाज का हिस्सा बनती है। यदि ज्ञान को उबाऊ और अश्लील मनोरंजन को सबसे आकर्षक मान लिया जाए, तो इस प्रवृत्ति पर गंभीर विमर्श आवश्यक है।

यह भी सच है कि मनोरंजन और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सोशल मीडिया पर हास्य, सुंदरता, फैशन और मनोरंजन के लिए भी जगह होनी चाहिए। हर व्यक्ति से हर समय गंभीर लेख पढ़ने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। समस्या मनोरंजन में नहीं, बल्कि तब है जब किसी महिला की तस्वीर के बहाने अश्लीलता, अपमान और स्त्री-विरोधी सोच को बढ़ावा दिया जाता है तथा ज्ञानवर्धक सामग्री के प्रति रुचि विकसित करने के प्रयासों को लगातार अनदेखा किया जाता है।

महिलाओं के प्रति दोहरा रवैया भी कम चिंताजनक नहीं है। एक ओर लोग उनकी तस्वीरें देखते हैं, उन पर टिप्पणियाँ करते हैं और उनकी लोकप्रियता का हिस्सा बनते हैं; दूसरी ओर उन्हीं महिलाओं को नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगते हैं। यदि किसी महिला की तस्वीर पसंद नहीं है, तो उसे देखना या उस पर टिप्पणी करना अनिवार्य नहीं है। लेकिन किसी की तस्वीर को लेकर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना उस व्यक्ति की गरिमा के प्रति असम्मान दर्शाता है। किसी महिला की स्वतंत्रता पर सवाल उठाने से पहले यह भी देखना चाहिए कि टिप्पणी करने वाले व्यक्ति का अपना व्यवहार कितना जिम्मेदार है।

सोशल मीडिया पर लोकप्रियता और कमाई का प्रश्न भी इसी बहस से जुड़ा है। जब किसी तरह की सामग्री पर अधिक दर्शक आते हैं, तो कुछ लोग उसे अपनी आय का माध्यम बना लेते हैं। इसमें अपने आप में कोई आश्चर्य नहीं है; डिजिटल मंचों पर दर्शकों की रुचि ही अक्सर सामग्री के प्रसार और कमाई को प्रभावित करती है। लेकिन यह प्रश्न जरूर उठता है कि हम किस प्रकार की सामग्री को प्रोत्साहित कर रहे हैं। यदि दर्शक किसी सामग्री को लगातार देखते, साझा करते और उस पर प्रतिक्रिया देते हैं, तो वे अनजाने में ही सही, उसके प्रसार में योगदान करते हैं।

इसलिए केवल सामग्री बनाने वालों को दोष देना पर्याप्त नहीं है। दर्शकों को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। जिस पोस्ट पर वे प्रतिक्रिया देते हैं, जिस वीडियो को बार-बार देखते हैं और जिस टिप्पणी को आगे बढ़ाते हैं, उससे डिजिटल वातावरण का स्वरूप बनता है। यदि हम चाहते हैं कि सोशल मीडिया पर विज्ञान, साहित्य, शिक्षा और सामाजिक सरोकारों को अधिक जगह मिले, तो हमें ऐसी सामग्री को पढ़ना, साझा करना और उस पर सार्थक चर्चा करना भी सीखना होगा।

अंततः प्रश्न किसी महिला के कपड़ों, तस्वीरों या उसके जवाब का नहीं है। प्रश्न उस दृष्टि का है जो महिला को एक संपूर्ण मनुष्य के बजाय शरीर के कुछ हिस्सों तक सीमित कर देती है। प्रश्न उस समाज का भी है जो विश्वगुरु बनने की आकांक्षा तो रखता है, लेकिन ज्ञान और वैज्ञानिक उपलब्धियों को लोकप्रिय बनाने के लिए पर्याप्त सामूहिक प्रयास नहीं करता।

विश्वगुरु बनने के लिए केवल तकनीकी प्रगति के सपने देखना पर्याप्त नहीं; समाज में ज्ञान के प्रति सम्मान, महिलाओं के प्रति गरिमा और विचारों के प्रति जिज्ञासा भी विकसित करनी होगी। किसी की तस्वीर देखकर अश्लील टिप्पणी करना आसान है, लेकिन किसी वैज्ञानिक की खोज को समझना, किसी पुस्तक को पढ़ना और किसी सामाजिक समस्या पर गंभीरता से विचार करना प्रयास माँगता है। हमें तय करना है कि हम अपनी डिजिटल दुनिया को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं—सतही आकर्षण की ओर या ज्ञान, विवेक और संवेदनशीलता की ओर। यही चुनाव अंततः हमारे सामाजिक चरित्र को भी निर्धारित करेगा।

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