यूपी में SIR घोटाला: 2.96 करोड़ वोटरों के नाम कटे, 16 लाख नए वोटरों के विवरण ग़ायब, 85,854 फ़ॉर्म-7 पर गंभीर सवाल!
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने, नए मतदाताओं को जोड़ने के विवरण सार्वजनिक नहीं किए जाने और फ़ॉर्म-7 के जरिए नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। इन मामलों में निर्वाचन आयोग की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में SIR के दौरान मतदाता सूची में इतने बड़े बदलाव किन आधारों पर किए गए और क्या पूरी प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन हुआ?
1. पहला सवाल: उत्तर प्रदेश में 2.96 करोड़ मतदाताओं के नाम किन कारणों से हटाए गए?
उत्तर प्रदेश में SIR के दौरान 2.96 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आँकड़ा सामने आया है। इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाने के पीछे क्या कारण थे? निर्वाचन आयोग को इसका स्पष्ट और श्रेणीवार विवरण देना चाहिए।
1. कितने नाम मृत मतदाताओं के कारण हटाए गए?
2. कितने नाम स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाने के कारण हटाए गए?
3. कितने नाम दोहरी प्रविष्टियों या अन्य कारणों से हटाए गए?
4. कितने पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाने की शिकायतें सामने आईं?
5. क्या प्रत्येक प्रभावित मतदाता को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया?
6. क्या निर्वाचन आयोग हटाए गए 2.96 करोड़ मतदाताओं की सूची कारणों सहित बूथवार जारी करेगा, ताकि जनता प्रत्येक बूथ पर हटाए गए नामों की संख्या और उनके कारणों की जाँच कर सके?
2. दूसरा सवाल: फ़ॉर्म-6 से जुड़े लगभग 16 लाख नए मतदाताओं के विवरण ग़ायब क्यों हैं?
SIR की प्रक्रिया के दौरान फ़ॉर्म-6 के जरिए लगभग 16 लाख नए मतदाताओं को जोड़े जाने का मामला सामने आया है। इन मतदाताओं के विवरण सार्वजनिक किए जाने को लेकर सवाल उठे हैं। निर्वाचन आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि नए मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप पूरी हुई या नहीं।
1. लगभग 16 लाख नए मतदाताओं के आवेदन कब प्राप्त हुए और किन तारीखों पर उनके नाम जोड़े गए?
2. क्या इन मतदाताओं से संबंधित निर्धारित सार्वजनिक सूचनाएँ उपलब्ध कराई गईं?
3. यदि विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए, तो इसका कानूनी आधार क्या है?
4. इस संबंध में विशेष अनुरोध किसने किया और किसके निर्देश पर कार्रवाई हुई?
5. उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) इस मामले में अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट क्यों नहीं करते?
6. क्या आयोग संबंधित रिकॉर्ड की जाँच कर आवश्यक जानकारी सार्वजनिक करेगा?
3. तीसरा सवाल: 85,854 फ़ॉर्म-7 किसके निर्देश पर तैयार हुए और इनके आधार पर कितने नाम हटाए गए?
फ़ॉर्म-7 के जरिए मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज करने तथा निर्धारित आधारों पर नाम हटाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इस मामले में 85,854 फ़ॉर्म-7 तैयार किए जाने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। प्रत्येक फ़ॉर्म के आधार, सत्यापन और उसके बाद हुई कार्रवाई की जाँच आवश्यक है।
1. 85,854 फ़ॉर्म-7 किसके निर्देश पर और किस आधार पर तैयार किए गए?
2. क्या प्रत्येक फ़ॉर्म के पीछे विधिवत दर्ज आपत्ति मौजूद थी?
3. यदि फ़ॉर्म पहले से भरे हुए थे, तो उनमें जानकारी किसने दर्ज की?
4. क्या संबंधित मतदाताओं को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया?
5. क्या प्रत्येक मामले में नाम हटाने का स्पष्ट कारण दर्ज किया गया?
6. इन फ़ॉर्मों के आधार पर वास्तव में कितने मतदाताओं के नाम हटाए गए?
7. क्या निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) ने प्रत्येक मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार किया?
8. क्या आपत्तियाँ दर्ज करने, उनकी सुनवाई और निर्णय लेने की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों तथा समय-सीमा का पालन किया गया?
4. चौथा सवाल: क्या SIR के दौरान मतदाता सूची में बदलाव की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष थी?
2.96 करोड़ नाम हटाए जाने, लगभग 16 लाख नए मतदाताओं को जोड़ने और 85,854 फ़ॉर्म-7 से जुड़े मामलों की अलग-अलग जाँच आवश्यक है। इन आँकड़ों के आधार पर किसी साजिश का निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित रिकॉर्ड और आधिकारिक तथ्यों की जाँच जरूरी है। लेकिन इन मामलों में उठे सवालों का जवाब देना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है।
1. क्या निर्वाचन आयोग नाम हटाने, नए नाम जोड़ने और फ़ॉर्म-7 के इस्तेमाल से संबंधित सभी आवश्यक रिकॉर्ड सार्वजनिक करेगा?
2. क्या हटाए गए नामों का कारणवार और श्रेणीवार विवरण उपलब्ध कराया जाएगा?
3. क्या नए मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी?
4. क्या 85,854 फ़ॉर्म-7 की तैयारी और उनके आधार पर हुई कार्रवाई की स्वतंत्र जाँच कराई जाएगी?
5. यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो क्या जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाएगी?
6. क्या आयोग यह सुनिश्चित करेगा कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से न हटे और उसका मताधिकार सुरक्षित रहे?
निर्वाचन आयोग जवाब दे: मतदाता सूची में हुए बदलावों का पूरा हिसाब सार्वजनिक हो
मतदाता सूची की विश्वसनीयता लोकतंत्र की बुनियाद है। उत्तर प्रदेश के नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनके नाम मतदाता सूची में सुरक्षित हैं या नहीं और सूची में किए गए बदलाव किन नियमों के तहत हुए हैं।
जब करोड़ों नाम हटाए जाने, लाखों नए मतदाताओं के विवरण सार्वजनिक न होने और हज़ारों फ़ॉर्म-7 की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हों, तब निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करे। आयोग को नाम हटाने के कारणवार आँकड़े, नए मतदाताओं से संबंधित निर्धारित सार्वजनिक विवरण और फ़ॉर्म-7 के इस्तेमाल का रिकॉर्ड सामने रखना चाहिए। यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
मताधिकार किसी भी नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। मतदाता सूची में किसी भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना लोकतंत्र के लिए गंभीर विषय है। यूपी में SIR को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब पारदर्शिता, आधिकारिक रिकॉर्ड और निष्पक्ष जाँच से ही मिल सकता है।



