विद्या शक्ति पहलः अक्षर ज्ञान से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ती अयोध्या की ग्रामीण महिलाएँ।“अब अंगूठा नहीं, अपने नाम के हस्ताक्षर से लिखती हैं अपनी पहचान।”
अयोध्या। अयोध्या के ग्रामीण अंचलों में कभी ऐसी अनेक महिलाएँ थीं, जो अपने नाम तक लिखने में असमर्थ थीं। निरक्षरता केवल अक्षरों से अनजान होने की स्थिति नहीं थी, बल्कि यह उनके आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत आत्मविश्वास के रास्ते में भी एक बड़ी बाधा थी। बैंक पासबुक समझने से लेकर स्वयं सहायता समूह के ऋण का हिसाब रखने, सरकारी योजनाओं से जुड़े दस्तावेजों को समझने और बच्चों की पढ़ाई में सहयोग करने तककृहर कदम पर उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था। इसी चुनौती को अवसर में बदलने के उद्देश्य से जिला प्रशासन, अयोध्या द्वारा “विद्या शक्ति पहल” की शुरुआत की गई। यह पहल केवल महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को ज्ञान, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से जोड़ने का एक सामुदायिक अभियान बनकर सामने आई है।
समस्या का समाधान, गांव की महिलाओं के माध्यम से
विद्या शक्ति पहल की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्थानीय और सामुदायिक स्वरूप है। बाहरी शिक्षकों की नियुक्ति के बजाय राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के अंतर्गत संचालित स्वयं सहायता समूहों की साक्षर महिलाओं को “विद्या सखी” के रूप में प्रशिक्षित किया गया। हर विद्या सखी अपने ही गांव की लगभग 10 से 20 महिलाओं के छोटे समूह को पढ़ाती है। शिक्षिका और शिक्षार्थी एक-दूसरे से पहले से परिचित होने के कारण सीखने का वातावरण सहज, सहयोगात्मक और झिझक से मुक्त रहता है।
गांव की चौपाल बनी कक्षा
इस पहल ने पढ़ाई के लिए महिलाओं को किसी दूर के विद्यालय या प्रशिक्षण केंद्र तक जाने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया। गांव के आंगन, चौपाल और घरों के आसपास ही लचीली कक्षाएँ संचालित की जा रही हैं। स्लेट और चॉक से अक्षरों का अभ्यास, दीवार पर लगे देवनागरी एवं अंग्रेजी वर्णमाला चार्ट, संख्या चार्ट और पोर्टेबल ब्लैकबोर्ड जैसे सरल संसाधनों के माध्यम से महिलाओं को पढ़ना-लिखना और बुनियादी गणित सिखाया जा रहा है। कुल 3,150 शिक्षण किट उपलब्ध कराई गई हैं।
सिर्फ साक्षरता नहीं, जीवन में बदलाव
विद्या शक्ति की कक्षाओं में जब महिलाएँ पहली बार अपना नाम लिखती हैं और अपने हाथों से हस्ताक्षर करती हैं, तो यह उनके लिए केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं होतीकृयह आत्मसम्मान और स्वतंत्र पहचान की शुरुआत होती है। अब वे दस्तावेजों पर केवल अंगूठे के निशान पर निर्भर रहने के बजाय अपने नाम के हस्ताक्षर करना सीख रही हैं। इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ने के साथ-साथ दस्तावेजों से जुड़ी धोखाधड़ी से सुरक्षा की भावना भी मजबूत हुई है। साक्षरता ने महिलाओं के आर्थिक जीवन को भी प्रभावित किया है। वे बैंक पासबुक को देख-समझ सकती हैं, स्वयं सहायता समूह के माइक्रो लोन का हिसाब रख सकती हैं और मनरेगा की मजदूरी का सत्यापन कर सकती हैं।
मां पढ़ी तो बच्चों की पढ़ाई भी मजबूत हुई
इस पहल का सकारात्मक प्रभाव अगली पीढ़ी तक भी पहुंच रहा है। साक्षर माताएँ अपने बच्चों के दैनिक गृहकार्य में बेहतर सहयोग कर पा रही हैं और उनकी विद्यालय में उपस्थिति पर निगरानी रख सकती हैं। इससे बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर कम करने में भी मदद मिलती है।
इस प्रकार विद्या शक्ति केवल महिलाओं को अक्षर ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मां, परिवार और आने वाली पीढ़ीकृतीनों के भविष्य को मजबूत करने वाली पहल बन रही है।

आंकड़े बता रहे हैं सफलता की कहानी
अयोध्या जनपद में विद्या शक्ति पहल के अंतर्गत अब तकः-
- 63,106 निरक्षर महिलाओं का नामांकन किया गया।
- 3,200 विद्या सखियों को साक्षर शिक्षिका के रूप में जोड़ा गया।
- प्रत्येक विद्या सखी के साथ औसतन 15 शिक्षार्थियों का समूह है।
- 40,000 से अधिक शिक्षार्थियों को केंद्रीय ULLAS पोर्टल पर टैग किया जा चुका है।
- शिक्षार्थियों को वयस्क साक्षरता का आधिकारिक प्रमाण-पत्र प्राप्त होगा।
- डिजिटल निगरानी से पारदर्शिता और निरंतरता।
केवल जमीनी स्तर तक सीमित न रखते हुए शिक्षार्थियों और विद्या सखियों का पंजीकरण ULLAS पोर्टल पर किया जा रहा है। इससे महिलाओं की सीखने की प्रगति का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हो रहा है और वयस्क साक्षरता का आधिकारिक प्रमाणन संभव हो रहा है। कार्यक्रम की प्रगति और जमीनी संचालन की दैनिक वीडियो कॉल के माध्यम से निगरानी भी की जाती है।
साक्षरता से सक्रिय नागरिक भागीदारी तक
जब कोई महिला पढ़ना-लिखना सीखती है तो उसके लिए दुनिया को समझने के नए रास्ते खुलते हैं। विद्या शक्ति के माध्यम से साक्षर हुई महिलाएँ ग्राम सभा की बैठकों में अधिक आत्मविश्वास के साथ भाग ले सकती हैं और अपने गांव तथा समुदाय की आवश्यकताओं एवं समस्याओं को अधिक प्रभावी ढंग से सामने रख सकती हैं।
एक पहल, अनेक बदलाव
विद्या शक्ति पहल ने यह सिद्ध किया है कि बड़े सामाजिक बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। यदि स्थानीय समुदाय, उपलब्ध नेटवर्क और प्रशासनिक इच्छाशक्ति को एक दिशा में जोड़ा जाए, तो गांव की चौपाल भी कक्षा बन सकती है और गांव की एक साक्षर महिला सैकड़ों जीवनों में बदलाव की वाहक बन सकती है। अयोध्या में 3,200 विद्या सखियाँ आज केवल शिक्षिका नहीं हैं, बल्कि अपने गांव की महिलाओं के लिए बदलाव की प्रतिनिधि बन चुकी हैं। उनके हाथों में स्लेट और चॉक के साथ-साथ एक नई जिम्मेदारी है निरक्षरता के अंधेरे से महिलाओं को ज्ञान, गरिमा और आत्मनिर्भरता की रोशनी की ओर ले जाने की। विद्या शक्ति पहल की असली सफलता इसी में है कि यहां महिलाएँ केवल अक्षर नहीं सीख रहीं,वे अपने अधिकार समझ रही हैं, अपनी पहचान लिख रही हैं और अपने भविष्य की कहानी स्वयं लिखने की ओर बढ़ रही हैं।



