UP में 242 करोड़ वृक्षारोपण,फिर भी बढ़ रही गर्मी! आखिर क्यों?

उत्तर प्रदेश में पिछले 9 वर्षों में 242 करोड़ से अधिक पौधे लगाए जाने का दावा किया जा रहा है। सरकार कहती है कि हरित आवरण बढ़ा है, लाखों एकड़ भूमि हरी हुई है और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक काम हुआ है। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह है कि गर्मी लगातार नए रिकॉर्ड तोड़ रही है। 2025 भारत का आठवां सबसे गर्म साल रहा, हीटवेव बढ़ रही हैं, बारिश का पैटर्न बदल रहा है और जलवायु संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है—अगर करोड़ों पौधे लगाए गए हैं, तो फिर तापमान क्यों बढ़ रहा है? क्या ये पौधे वास्तव में जीवित हैं? क्या इनके लिए पर्याप्त जमीन थी? और क्या पौधरोपण के आंकड़े जमीनी हकीकत से मेल खाते हैं? आज हम इसी बड़े सवाल की पड़ताल करेंगे कि आखिर यूपी में 242 करोड़ पौधे लगाने के बावजूद गर्मी क्यों बढ़ रही है और इसके पीछे की असली कहानी क्या है।”

क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में पिछले 9 वर्षों में 242 करोड़ से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं? सरकार दावा कर रही है कि प्रदेश का हरित आवरण लगातार बढ़ रहा है, लाखों एकड़ भूमि हरी हो चुकी है और वर्ष 2030 तक हरित क्षेत्र को 15 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।लेकिन दूसरी तरफ एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जो डराने वाली तस्वीर दिखाती है। भारत ने 2025 को अपने इतिहास के आठवें सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया। 124 साल में पहली बार तापमान ने कई रिकॉर्ड तोड़ दिए। 4,421 लोगों की जान चरम मौसम की घटनाओं में चली गई। तो सवाल यह है… क्या पौधरोपण के ये अभियान जलवायु संकट का समाधान बन पाएंगे? या खतरा हमारी सोच से कहीं ज्यादा बड़ा है? आइए जानते हैं पूरी कहानी।

यूपी की हरित क्रांति

उत्तर प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर अभियान चलाए गए हैं। 9 वर्षों में रोपे गये पौधों की संख्या वर्ष 2017-18 ——-5.72 करोड़, वर्ष 2018-19 ——-11.77 करोड़, वर्ष 2019-20 ——–22.60 करोड़, वर्ष 2020-21 ——–25.87 करोड़, वर्ष 2021-22 ——–30.53 करोड़, वर्ष 2022-23 ———35.49 करोड़, वर्ष 2023-24 ———36.16 करोड़, वर्ष 2024-25———-36.81 करोड़, वर्ष 2025-26——— 37.26 करोड़, 2017 में जहां लगभग 5.72 करोड़ पौधे लगाए गए थे, वहीं 2025-26 तक यह संख्या बढ़कर 37.26 करोड़ पौधों तक पहुंच गई। अगर कुल आंकड़ा देखें तो 9 वर्षों में 242 करोड़ से अधिक पौधरोपण किया गया है।

सरकार के अनुसार— प्रदेश का वनावरण बढ़कर 9.96 प्रतिशत हो गया है। 3.38 लाख एकड़ भूमि के हरित आवरण में वृद्धि दर्ज हुई है। लगाए गए लगभग 80 प्रतिशत पौधे आज भी सुरक्षित हैं। 2030 तक हरित क्षेत्र को 15 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। सिर्फ सरकारी विभाग ही नहीं, बल्कि लाखों किसानों और आम नागरिकों ने भी इस अभियान में भाग लिया।

मुख्यमंत्री कृषक वृक्ष घन योजना के तहत किसानों को खेत की मेड़ों पर वृक्ष लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रदेश के सभी जिलों में “अमृत वन” विकसित किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना में पंजीकृत लगभग 2.86 करोड़ किसानों को भी पौधरोपण से जोड़ा गया है। यानी वृक्षारोपण अब सिर्फ सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि जन आंदोलन बनाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन क्या सिर्फ पौधे लगाने भर से पर्यावरण बच जाएगा? दूसरी तरफ डराने वाली रिपोर्ट-विश्व पर्यावरण दिवस से ठीक पहले एक रिपोर्ट ने पूरे देश का ध्यान खींचा। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट यानी CSE की रिपोर्ट ने जो तस्वीर दिखाई, वह बेहद चिंताजनक है।

रिपोर्ट के मुताबिक— साल 2025 भारत का आठवां सबसे गर्म वर्ष रहा। औसत तापमान सामान्य से 0.28 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। सर्दियों में तापमान की विसंगति 1.17 डिग्री सेल्सियस रही, जो 124 वर्षों में सबसे ज्यादा थी। और सबसे हैरान करने वाली बात— भारत वर्ष 2025 में 99 प्रतिशत दिनों तक किसी न किसी चरम मौसमीय घटना का गवाह बना। कहीं भीषण गर्मी, कहीं भारी बारिश, कहीं बाढ़, कहीं ओलावृष्टि, तो कहीं सूखे जैसी स्थिति। इन घटनाओं के कारण— 4,421 लोगों की मौत हुई। 1.74 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा फसलें प्रभावित हुईं। और करोड़ों लोगों की आजीविका पर असर पड़ा।

कटते जंगल और घटता भूजल विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट की जड़ सिर्फ तापमान नहीं है। असल समस्या है—

कटते जंगल, घटता भूजल स्तर, और अनियंत्रित शहरीकरण। जब जंगल कम होते हैं तो वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ती है। जब जमीन के नीचे का पानी कम होता है तो मिट्टी की नमी खत्म होती है। जब शहरों में कंक्रीट बढ़ती है तो हीट आइलैंड इफेक्ट पैदा होता है।

परिणाम— गर्मी और ज्यादा बढ़ती है। बारिश का पैटर्न बदल जाता है। कृषि प्रभावित होती है। और लोगों की सेहत पर सीधा असर पड़ता है। रिपोर्ट बताती है कि आज देश का हर आठवां नागरिक किसी न किसी बीमारी से प्रभावित है। वायु प्रदूषण लगातार अधिक जानलेवा होता जा रहा है। फरवरी 2026 में पहली बार देश में एक भी शीतलहर दर्ज नहीं हुई। वहीं हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में मार्च की शुरुआत में ही गंभीर हीटवेव देखने को मिली। ये संकेत बताते हैं कि मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है।

समाधान क्या है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि— लगाए गए पौधे जीवित भी रहें। जल संरक्षण को प्राथमिकता मिले। वेटलैंड्स और नदियों की रक्षा हो। स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग बढ़े। वायु प्रदूषण कम करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रिक बसों, ई-रिक्शा, स्वच्छ ईंधन आधारित कुक स्टोव और सौर ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रदेश में 12 रामसर साइटों के संरक्षण और हर जिले में वेटलैंड्स की पहचान का काम भी जारी है। इसके साथ ग्राम पंचायत स्तर पर ग्रीन चौपाल और क्लाइमेट स्मार्ट पंचायत की अवधारणा को लागू किया जा रहा है। यानी सरकार और समाज दोनों को मिलकर काम करना होगा।

एक तरफ उत्तर प्रदेश में करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ तापमान के रिकॉर्ड टूट रहे हैं।एक तरफ हरियाली बढ़ाने की कोशिशें हैं।दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा।आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि हमारे प्रयास प्रकृति को बचा पाएंगे या नहीं।लेकिन एक बात साफ है—पर्यावरण संरक्षण अब सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है।यह हम सबकी जिम्मेदारी है।

“उत्तर प्रदेश में पिछले 9 वर्षों में 242 करोड़ से ज्यादा पौधे लगाने का दावा किया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये पौधे आज भी जीवित हैं? अगर 242 करोड़ पौधे लगाए गए हैं, तो क्या उनके लिए उतनी जमीन उपलब्ध थी? सरकार का दावा है कि लगभग 80 प्रतिशत पौधे सुरक्षित हैं और हरित आवरण में लाखों एकड़ की वृद्धि हुई है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि सिर्फ पौधे लगाना ही काफी नहीं, उनकी निगरानी और संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। कई बार रिकॉर्ड में पौधे लग जाते हैं, लेकिन जमीन पर उनका अस्तित्व दिखाई नहीं देता। तो आखिर सच क्या है? क्या पौधरोपण अभियान वास्तव में पर्यावरण बचा रहा है, या फिर आंकड़ों का खेल बनकर रह गया है? क्या बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण जलवायु संकट का समाधान बन सकता है?या इसके लिए और भी बड़े कदम उठाने होंगे?

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