Thursday, April 23, 2026
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डिजिटल दुनिया में निजता और पारदर्शिता की टकराहट

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डिजिटल दुनिया में निजता और पारदर्शिता की टकराहट
डिजिटल दुनिया में निजता और पारदर्शिता की टकराहट
डॉ.सत्यवान सौरभ
डॉ.सत्यवान सौरभ

‘भूल जाने का अधिकार’ (राइट टू बी फॉरगॉटन—आरटीबीएफ) आज के डिजिटल युग की सबसे जटिल और बहुआयामी कानूनी-नैतिक बहसों में से एक बन चुका है। इंटरनेट और डिजिटल प्रौद्योगिकी के विस्तार ने सूचना को स्थायी, सर्वसुलभ और वैश्विक बना दिया है, जिसके कारण एक बार प्रकाशित हुई जानकारी लंबे समय तक ऑनलाइन बनी रहती है और व्यक्ति के जीवन को निरंतर प्रभावित करती है। ऐसे परिदृश्य में आरटीबीएफ व्यक्ति को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह अपनी पुरानी, अप्रासंगिक, भ्रामक या हानिकारक जानकारी को हटाने या कम-से-कम उसकी दृश्यता को सीमित करने की मांग कर सके। यह अधिकार विशेष रूप से उन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण हो जाता है जहाँ किसी व्यक्ति के अतीत की जानकारी उसके वर्तमान जीवन, रोजगार, सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही हो। पहली दृष्टि में यह अधिकार मानवीय गरिमा, निजता और आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक प्रतीत होता है, लेकिन जब यह प्रेस की स्वतंत्रता और जनता के ‘जानने के अधिकार’ से टकराता है, तब यह एक गंभीर संवैधानिक और नैतिक द्वंद्व उत्पन्न करता है, जिसका समाधान सरल नहीं है।

आरटीबीएफ की अवधारणा का वैश्विक उद्भव 2014 में यूरोपीय संघ के प्रसिद्ध “गूगल स्पेन” मामले से हुआ, जहाँ न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि सर्च इंजन कुछ परिस्थितियों में ऐसी जानकारी को अपने सर्च परिणामों से हटा सकते हैं, जो अब अप्रासंगिक हो चुकी हो या व्यक्ति की निजता का अनावश्यक उल्लंघन करती हो। इस निर्णय ने डिजिटल अधिकारों के क्षेत्र में एक नया अध्याय खोला और इसके परिणामस्वरूप जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) के अनुच्छेद 17 में ‘मिटाने का अधिकार’ (राइट टू इरेज़र) को कानूनी मान्यता दी गई। हालांकि, यूरोपीय मॉडल ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जनहित, ऐतिहासिक अभिलेखों और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण अपवादों के साथ संतुलित किया जाना आवश्यक है। इस प्रकार, आरटीबीएफ को एक सशर्त अधिकार के रूप में विकसित किया गया, जो व्यक्ति की निजता और समाज के व्यापक हित के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

भारत में आरटीबीएफ का कोई स्पष्ट और समर्पित वैधानिक ढाँचा अभी तक विकसित नहीं हुआ है, लेकिन इसका आधार संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित ‘गोपनीयता के अधिकार’ में देखा जा सकता है, जिसे 2017 के ऐतिहासिक पुट्टास्वामी निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी। इसके अतिरिक्त, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (डीपीडीपी एक्ट) सीमित रूप से डेटा मिटाने का अधिकार प्रदान करता है, लेकिन यह मीडिया रिपोर्टों, सार्वजनिक अभिलेखों और पत्रकारिता से जुड़े मामलों में स्पष्ट दिशानिर्देश देने में अभी अपर्याप्त साबित होता है। सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 भी शिकायत निवारण का एक ढाँचा प्रदान करते हैं, परंतु वे इस जटिल संतुलन को प्रभावी ढंग से संभालने में सक्षम नहीं हैं। परिणामस्वरूप, भारत में आरटीबीएफ के अनुप्रयोग को लेकर न्यायिक निर्णयों में असंगति और अस्पष्टता देखी जा रही है, जो एक सुसंगत नीति की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

आरटीबीएफ और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच टकराव को समझने के लिए ‘सूचनात्मक आत्म-निर्धारण’ की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सिद्धांत व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत डेटा, डिजिटल पहचान और ऑनलाइन उपस्थिति पर नियंत्रण का अधिकार देता है। आज के समय में, जब किसी व्यक्ति की ऑनलाइन छवि उसके पेशेवर अवसरों, सामाजिक संबंधों और व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करती है, तब यह अधिकार और भी प्रासंगिक हो जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ किसी समय आपराधिक आरोप लगे हों, लेकिन बाद में वह अदालत द्वारा बरी कर दिया गया हो, तब भी इंटरनेट पर उपलब्ध पुरानी समाचार रिपोर्टें उसके जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। ऐसे मामलों में आरटीबीएफ व्यक्ति को एक ‘दूसरा मौका’ प्रदान करने का माध्यम बन सकता है, जिससे वह अपने अतीत की छाया से मुक्त होकर वर्तमान में आगे बढ़ सके।

दूसरी ओर, प्रेस की स्वतंत्रता, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित है, लोकतंत्र का एक मूलभूत स्तंभ है। यह केवल अभिव्यक्ति का अधिकार नहीं, बल्कि जनता के ‘जानने के अधिकार’ का भी प्रतीक है। मीडिया की भूमिका केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सत्ता की निगरानी करना, भ्रष्टाचार को उजागर करना और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी है। यदि आरटीबीएफ का उपयोग व्यापक रूप से समाचार रिपोर्टों, खोजी पत्रकारिता या सार्वजनिक हित से जुड़ी जानकारी को हटाने के लिए किया जाने लगे, तो यह लोकतांत्रिक जवाबदेही को गंभीर रूप से कमजोर कर सकता है। विशेष रूप से तब, जब प्रभावशाली व्यक्ति या सार्वजनिक पदाधिकारी अपने अतीत से जुड़ी असुविधाजनक जानकारी को हटाने के लिए इस अधिकार का उपयोग करें, तब यह समाज के लिए खतरनाक प्रवृत्ति बन सकती है।

हाल के वर्षों में कुछ न्यायिक मामलों में आरटीबीएफ के नाम पर गैग ऑर्डर जारी किए गए हैं, जो मीडिया को किसी विशेष जानकारी के प्रकाशन या प्रसार से रोकते हैं। ये आदेश कई बार ‘प्रायर रेस्ट्रेंट’ का रूप ले लेते हैं, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूर्व-प्रतिबंध होता है और संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत संदेहास्पद माना जाता है। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब ऐसे आदेश एकपक्षीय रूप से पारित किए जाते हैं, बिना मीडिया या अन्य संबंधित पक्षों को सुने। इससे न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं। यद्यपि कुछ मामलों में अदालतों ने बरी हुए व्यक्तियों के पक्ष में निर्णय देते हुए पुरानी जानकारी को हटाने का आदेश दिया है, वहीं अन्य मामलों में प्रेस की स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते हुए ऐसे आदेशों को निरस्त भी किया गया है। इन विरोधाभासी निर्णयों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में इस विषय पर एक सुसंगत और स्पष्ट कानूनी ढाँचे की तत्काल आवश्यकता है।

आरटीबीएफ के संभावित दुरुपयोग के खतरे भी कम नहीं हैं। प्रभावशाली व्यक्ति, राजनेता या आर्थिक अपराधों में संलिप्त लोग इस अधिकार का उपयोग अपने अतीत को ‘साफ’ करने और सार्वजनिक स्मृति को नियंत्रित करने के लिए कर सकते हैं। इसके अलावा, स्ट्रैटेजिक लॉसूट्स अगेंस्ट पब्लिक पार्टिसिपेशन (एसएलएपीपी) जैसे मुकदमे पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर कानूनी दबाव डालने का एक साधन बन सकते हैं, जिससे वे संवेदनशील मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने से बचें। साथ ही, ‘स्ट्राइसैंड इफेक्ट’ का खतरा भी बना रहता है, जहाँ किसी जानकारी को दबाने का प्रयास उसे और अधिक प्रचारित कर देता है, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है।

इन सभी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि भारत एक सुविचारित वैधानिक संतुलन परीक्षण विकसित करे, जो आरटीबीएफ और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच उचित संतुलन स्थापित कर सके। इस परीक्षण में कुछ प्रमुख तत्वों को शामिल किया जाना चाहिए, जैसे कि जानकारी की प्रकृति—क्या वह पूरी तरह निजी है या उसका स्पष्ट संबंध जनहित से है; संबंधित व्यक्ति की भूमिका—क्या वह एक निजी नागरिक है या सार्वजनिक जीवन से जुड़ा हुआ व्यक्ति; मामले की स्थिति—क्या यह केवल आरोप का चरण है या अंतिम निर्णय आ चुका है; और वास्तविक हानि का आकलन—क्या सूचना की उपलब्धता से व्यक्ति को ठोस और सिद्ध नुकसान हो रहा है या नहीं। इसके अतिरिक्त, ‘कम से कम प्रतिबंधक विकल्प’ के सिद्धांत को भी अपनाया जाना चाहिए, जिसके तहत किसी जानकारी को पूरी तरह हटाने के बजाय पहले यह देखा जाए कि क्या उसे संशोधित किया जा सकता है, उसमें संदर्भ जोड़ा जा सकता है या केवल सर्च परिणामों से हटाया जा सकता है।

संस्थागत सुधार भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। डेटा संरक्षण बोर्ड को एक स्वतंत्र, सक्षम और विशेषज्ञ निकाय के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जो आरटीबीएफ से जुड़े मामलों का निष्पक्ष और कुशलतापूर्वक निपटारा कर सके। साथ ही, न्यायपालिका को भी स्पष्ट दिशानिर्देशों और सुसंगत निर्णयों के माध्यम से इस क्षेत्र में स्थिरता लानी होगी। वैश्विक अनुभव, विशेष रूप से यूरोपीय संघ का मॉडल, यह दर्शाता है कि एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाकर इस जटिल समस्या का समाधान संभव है। भारत को भी अपनी संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप एक ऐसा ढाँचा विकसित करना होगा, जो न केवल व्यक्ति की गरिमा और निजता की रक्षा करे, बल्कि समाज की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही को भी बनाए रखे।

अंततः, ‘भूल जाने का अधिकार’ और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संबंध को प्रतिस्पर्धी या विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें एक-दूसरे के पूरक के रूप में समझा जाना चाहिए। दोनों ही अधिकार एक स्वस्थ और सशक्त लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं। चुनौती इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने की है, ताकि न तो व्यक्ति की गरिमा और निजता का हनन हो और न ही समाज की पारदर्शिता और सूचना के अधिकार पर आंच आए। डिजिटल युग में यह संतुलन पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, और इसके लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायसंगत कानूनी ढाँचे का निर्माण अत्यावश्यक है। तभी हम एक ऐसे डिजिटल समाज की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ व्यक्ति और समाज दोनों के हित समान रूप से सुरक्षित रह सकें।