
राजेन्द्र चौधरी
अखिलेश यादव ने ‘पीडीए दिवस’ को सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की नई पहल बताते हुए इसे पीड़ित, वंचित और उपेक्षित समाज के संघर्षशील महापुरुषों को समर्पित बताया। उन्होंने कहा कि यह दिवस उन सभी व्यक्तित्वों की विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प है, जिन्होंने बराबरी और मान-सम्मान के लिए किसी भी वर्चस्ववादी ताकत के सामने समझौता नहीं किया।
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि पीडीए दिवस’ एक नयी शुरुआत है जो सांकेतिक रूप से पीडीए समाज के उन सभी महान व्यक्तियों को समर्पित है, जिन्होंने समाज के हर पीड़ित, दुखी, अपमानित के मान-सम्मान, उत्थान और बराबरी के लिए कभी भी, किसी भी वर्चस्ववादी का साथ नहीं दिया। आज समस्त ‘पीडीए समाज’ इस निर्णय से हर्षित और प्रसन्न है कि मान्यवर कांशीराम जैसे अनेक पीडीए महापुरुषों के मिशन को सच में आगे बढ़ाने का संकल्प पुनर्जीवित किया जा रहा है और सच तो ये है कि वो सब भी अंदर-ही-अंदर बेहद खुश हैं, जो किसी मजबूरीवश अपना पक्ष स्पष्ट रूप से नहीं रख पा रहे हैं या वो कहने पर मजबूर हैं जो वो कभी भी कहना नहीं चाहते हैं। उन्होंने कहा कि ज़रूरी नहीं क़लम जिसकी हो लफ़्ज़ भी उसी के हों।
अखिलेश यादव ने कहा कि ये सदैव नहीं होता कि जो लिख रहा है, शब्द उसी के हों, न ही हमेशा ये होता है कि बात से जो अर्थ निकले, वही उसका भाव भी हो। कभी-कभी लिखनेवाले और लिखवानेवाले अलग भी होते हैं। अक्सर समाज को बाँटकर, अपनी सत्ता बरक़रार रखने के लिए नकारात्मक-विभाजनकारी सियासी ताक़तें, इस तरह की साज़िश करती हैं और लोगों को मजबूर भी करती हैं। हम जिन बड़ों का सम्मान करते हैं, उनसे सहानुभूति भी रखते हैं। हम अपने बड़ों और मुँहबोले संबंधों को सदैव मन से निभाते हैं। ऐतिहासिक तिरस्कार के कारण पीड़ा के एक सूत्र में बँधे ‘हम सब एक ही हैं’, हम सब पीडीए हैं क्योंकि हम सदैव कहते हैं, आज फिर कह रहे हैं, जो पीड़ित, वो पीडीए।





















