रोज़गार का गला घोंट रही है सरकार-रीबू श्रीवास्तव

सरकारें आती हैं, वादे करती हैं, पर जब बात रोज़गार की आती है तो आँकड़ों का जाल बुनकर जनता को भ्रम में रखती हैं। आज देश का युवा डिग्री लेकर घूम रहा है, लेकिन नौकरी के नाम पर सिर्फ़ निराशा हाथ लग रही है। यह विडंबना नहीं, व्यवस्था की असफलता है।

देश की आज़ादी को 75 वर्ष से अधिक हो चुके हैं। भारत ने विज्ञान, तकनीक और वैश्विक मंचों पर कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन क्या विकास के इन तमगे के नीचे छुपी नहीं रह गई है आम जनता की करुण पुकार? क्या सरकारें सिर्फ चमकते आँकड़े दिखा कर अपनी विफलताओं को ढँकने में लगी हैं? आज सबसे बड़ा सवाल यही है — “रोज़गार कहाँ है?”

विकास के वादों और रोजगार देने की बातों के बीच आज आम जनता की रोज़ी-रोटी पर संकट मंडरा रहा है। सरकारी नीतियों के नाम पर निजीकरण, छँटनी, और स्थानीय रोजगारों का हनन आम हो गया है। जहां एक ओर युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जो पहले से कार्यरत हैं, उनकी नौकरियाँ भी सुरक्षित नहीं रहीं। छोटे दुकानदारों, ठेलेवालों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को नियमों के जाल, उठती महंगाई और प्रशासनिक अनदेखी ने घुटनों पर ला दिया है। यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि मानव गरिमा पर हमला है।आज आवश्यकता है कि सरकार सिर्फ अभियांत्रिक आंकड़े दिखाने की बजाय जमीन पर रोजगार सुनिश्चित करने की ठोस नीतियाँ बनाए। जनता को सिर्फ विकास के सपने नहीं, बल्कि कर्म और रोटी का अधिकार चाहिए।

युवा शक्ति हताश है

देश की सबसे बड़ी ताक़त युवा हैं, लेकिन आज वही युवा सबसे ज़्यादा निराश हैं। लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, लेकिन या तो परीक्षाएँ रद्द हो जाती हैं, या वर्षों तक नियुक्ति पत्र नहीं दिए जाते। कई युवाओं ने उम्र की सीमा पार कर ली, पर नौकरी की प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। क्या यही है ‘न्यू इंडिया’?

निजीकरण की मार और छँटनी की धार

सरकारी संस्थानों में रिक्त पद वर्षों से खाली पड़े हैं, और जो बचे हैं, उन्हें भी निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। निजीकरण के इस अंधाधुंध फैसले ने रेलवे, बैंक, बीमा, और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों के कर्मचारियों को असुरक्षा की आग में झोंक दिया है। असंगठित क्षेत्र के मज़दूर, दैनिक कमाई करने वाले श्रमिक और छोटे दुकानदार — सभी आज अपनी रोज़ी-रोटी बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

विकास के नाम पर विस्थापन

सरकारी नीतियाँ अक्सर विकास के नाम पर ज़मीनों का अधिग्रहण करती हैं, लेकिन उसका लाभ कुछ पूंजीपतियों तक ही सीमित रह जाता है। खेती उजाड़ दी जाती है, लेकिन ग्रामीणों को वैकल्पिक रोजगार नहीं मिलते। इसका परिणाम यह होता है कि गांव के लोग शहरों में पलायन करते हैं और शोषण का शिकार बनते हैं।

विकास का मतलब रोज़गार हो

सरकार को यह समझना होगा कि असली विकास वही है जो हर हाथ को काम और हर घर को रोटी दे सके। केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर या डिजिटल आँकड़े गिनवाने से देश मजबूत नहीं होता, उसे मजबूत बनाते हैं — सशक्त, आत्मनिर्भर और रोजगारयुक्त नागरिक।

अब जनता को सवाल पूछना होगा

जब तक आम जनता यह सवाल नहीं पूछेगी कि “मेरे बच्चे को नौकरी कब मिलेगी?”, “मेरी रोज़ी-रोटी की गारंटी कौन देगा?”, तब तक यह चुप्पी सत्ता को और अधिक बेपरवाह बनाती रहेगी। लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है और वह जवाबदेही सिर्फ चुनावी नारों से पूरी नहीं होती।

रोज़गार केवल व्यक्तिगत ज़रूरत नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव है। अगर सरकारें रोज़गार पैदा नहीं कर सकतीं, तो उन्हें सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार भी नहीं होना चाहिए। जनता का धैर्य अब टूट रहा है। अब आवाज़ उठानी होगी — रोज़गार दो, वरना कुर्सी छोड़ो..!

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