मन था निर्मल, प्रेम था, मधुर वचन की छाँव। अपने ही जब घाव दें, बदल गया स्वभाव॥
हँसकर हर पीड़ा सही, रखा सभी का मान। अपनों ने ही तोड़ दी, विश्वासों की शान॥
सच को जिसने ओढ़ लिया, पाया वही दुराव। अपने ही जब घाव दें, बदल गया स्वभाव॥
झुकता रहा हर मोड़ पर, रिश्तों की ही आस। टूट गया सम्मान जब, बिखर गया विश्वास॥
आँसू पीकर मुस्कुरा, करता रहा निभाव। अपने ही जब घाव दें, बदल गया स्वभाव॥
चुप्पी मेरी पढ़ न सके, समझे सब लाचार। मन के भीतर जल उठे, पीड़ा के अंगार॥
शब्द हुए अब तीक्ष्ण से, खो गया वह भाव।अपने ही जब घाव दें, बदल गया स्वभाव॥
कड़वे लगते आज जो, मेरे सारे बोल। बरसों के संताप ने, बदले मन के मोल॥
घाव समय ने दे दिए, बदला जीवन-गाँव। अपने ही जब घाव दें, बदल गया स्वभाव॥
दोष न देना व्यक्ति को, समझो मन की पीर। अपने ही जब दर्द दें, बदल जाए तक़दीर॥
‘सौरभ’ रिश्ते तब खिले, जब हो सच्चा भाव।
मन था निर्मल, प्रेम था, मधुर वचन की छाँव। अपने ही जब घाव दें, बदल गया स्वभाव॥
—–डॉ. सत्यवान सौरभ



