
UGC ने अपनी नियामक शक्तियों का उपयोग करके एक ऐसा ‘समानांतर दंड विधान’ तैयार कर दिया है।जो BNS तथा अन्य अपराधिक कानूनों के प्रावधानों को दरकिनार करता है। UGC ने बनाया ‘समानांतर दंड विधान’
अजीत सिंह
जब किसी अपराध के लिए पहले से ही स्थापित कानून हैं तो हर संस्थान द्वारा रोज नए-नए नियम बनाकर बखेड़ा खड़ा करना कहां तक उचित है.? विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा हाल ही में जारी ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नियम-2026 (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations-2026) को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यह नियम 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित (Notify) किए गए और 15 जनवरी 2026 से प्रभावी हो गए हैं।
विरोध के मुख्य कारण क्या हैं..?
सामान्य वर्ग के छात्र और संगठनों (जैसे सवर्ण समाज समन्वय समिति- S4) के विरोध के पीछे निम्नलिखित प्रमुख तर्क हैं:-
कमेटियों में प्रतिनिधित्व का अभाव:- नए नियमों के तहत हर कॉलेज में एक ‘इक्विटी कमेटी’ (Equity Committee) बनाना अनिवार्य है। इसमें SC,ST,OBC,महिला और दिव्यांग श्रेणियों के सदस्यों का होना जरूरी है, लेकिन सामान्य वर्ग (General Category) के प्रतिनिधित्व की कोई अनिवार्यता नहीं है। छात्रों को डर है कि यह कमेटियां एकतरफा निर्णय ले सकती हैं।
झूठी शिकायतों पर दण्ड का प्रावधान हटाना:- शुरुआती ड्राफ्ट में प्रावधान था कि यदि कोई छात्र झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत दर्ज कराता है, तो उस पर कार्रवाई होगी, लेकिन बाद में इस क्लॉज को हटा दिया गया है।
OBC को शामिल करना:- 2012 के पुराने नियमों में मुख्य रूप से SC और ST छात्रों पर ध्यान दिया गया था। अब OBC छात्रों को भी ‘जातिगत भेदभाव’ की परिभाषा में शामिल कर लिया गया है। सवर्ण छात्रों का तर्क है कि इससे सामान्य वर्ग के छात्रों पर दबाव बढ़ेगा।
दोषी मान लेने की धारणा:- सवर्ण प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि ये नियम यह मानकर चलते हैं कि केवल कुछ विशिष्ट समूह ही पीड़ित होते हैं, जबकि अन्य (सामान्य वर्ग) हमेशा दोषी होते हैं। उनका कहना है कि यह ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (उलटा भेदभाव) है।
आश्चर्य है कि हमारे देश में संवैधानिक संस्थाओं द्वारा आए दिन सनसनी पैदा करने वाले नियम बनाकर खुद को सुर्खियों में बनाये रखने की बाढ़ आ गई है । अभी तक सरकार द्वारा यही समझा जा रहा है कि नियम तोड़ने और उत्पीड़न करने का काम सिर्फ सवर्ण ही कर रहे हैं, बाकी सब दूध के धुले हैं । एक तरफ भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14,16 और 21 है, वही दूसरी ओर इसके खिलाफ UGC मनमाने नियम बनाकर संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन कर रही है । किसी तरह के उत्पीड़न के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं ही काफी है। UGC ने बनाया ‘समानांतर दंड विधान’























