

आज शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना कम और कमाई का जरिया बनना ज्यादा नजर आने लगा है। स्कूलों में किताबों के नाम पर कमीशन का खेल अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या यह व्यवस्था वास्तव में बच्चों के भविष्य के लिए है, या फिर शिक्षा के नाम पर एक संगठित व्यापार बन चुकी है?
शिक्षा को सदैव समाज की आत्मा, विकास का आधार और समान अवसरों का सेतु माना गया है। यह केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक के निर्माण की प्रक्रिया भी है। परंतु जब यही शिक्षा लाभ कमाने का साधन बन जाए, तो यह चिंता का विषय ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के लिए एक गंभीर चेतावनी बन जाती है। हाल ही में सामने आई खबर कि कुछ निजी विद्यालय 50 प्रतिशत तक कमीशन लेकर किताबें बेच रहे हैं, इस चिंता को और अधिक गहरा करती है। यह केवल एक प्रशासनिक अनियमितता नहीं, बल्कि शिक्षा के मूल स्वरूप पर सीधा आघात है।
आज शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी है, प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, और साथ ही बढ़ा है शिक्षा का खर्च। लेकिन इस बढ़ते खर्च के पीछे यदि गुणवत्ता, बेहतर सुविधाएं और आधुनिक संसाधन हों, तो इसे एक हद तक उचित ठहराया जा सकता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब शिक्षा के नाम पर अभिभावकों को अनावश्यक आर्थिक बोझ के नीचे दबाया जाने लगे। किताबों के नाम पर लिया जा रहा भारी कमीशन इसी प्रवृत्ति का एक उदाहरण है।
कई निजी विद्यालय अभिभावकों को यह निर्देश देते हैं कि वे केवल स्कूल द्वारा निर्धारित दुकानों से ही किताबें खरीदें या सीधे स्कूल परिसर से किताबें लें। यह स्थिति एक प्रकार का एकाधिकार (मोनोपॉली) पैदा करती है, जहां अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता। खुले बाजार में उपलब्ध सस्ती या वैकल्पिक पुस्तकों को खरीदने की स्वतंत्रता उनसे छीन ली जाती है। परिणामस्वरूप, उन्हें मजबूरी में अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जिसमें एक बड़ा हिस्सा कमीशन के रूप में शामिल होता है।
इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का भी घोर अभाव है। अभिभावकों को यह नहीं बताया जाता कि किन आधारों पर इन पुस्तकों का चयन किया गया है, उनकी वास्तविक कीमत क्या है, और उन पर कितना अतिरिक्त लाभ जोड़ा गया है। कई बार तो यह भी देखा गया है कि एक ही विषय की पुस्तक हर वर्ष बदल दी जाती है, ताकि पुरानी किताबें किसी काम की न रहें और नई किताबें खरीदने के लिए अभिभावक बाध्य हों। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक शोषण को बढ़ावा देती है, बल्कि संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी भी करती है।
यह स्थिति केवल आर्थिक दृष्टि से ही चिंताजनक नहीं है, बल्कि यह शिक्षा के मूल उद्देश्य को भी कमजोर करती है। जब विद्यालय ज्ञान के केंद्र के बजाय लाभ कमाने के साधन बन जाते हैं, तो शिक्षा का मूल्य स्वतः ही गिरने लगता है। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच का संबंध, जो कभी विश्वास और मार्गदर्शन पर आधारित होता था, धीरे-धीरे एक औपचारिक लेन-देन में बदलने लगता है। बच्चों के समग्र विकास की जगह संस्थान का आर्थिक लाभ प्राथमिकता बन जाता है।
अभिभावकों की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक दयनीय हो जाती है। वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए सर्वोत्तम शिक्षा चाहते हैं, लेकिन उन्हें बार-बार आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है। मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों के लिए यह बोझ और भी अधिक भारी हो जाता है। कई बार वे अपनी अन्य आवश्यकताओं में कटौती करके इन खर्चों को पूरा करते हैं। यह स्थिति सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देती है, जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल उन लोगों तक सीमित होती जा रही है, जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं।
इस पूरे मुद्दे का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—सिलेबस में बार-बार होने वाला बदलाव। हर वर्ष या दो वर्ष में पाठ्यक्रम में छोटे-मोटे बदलाव कर दिए जाते हैं, जिससे पुरानी किताबें अप्रासंगिक हो जाती हैं। यह बदलाव अक्सर शैक्षणिक आवश्यकता से अधिक व्यावसायिक हितों से प्रेरित प्रतीत होता है। यदि पाठ्यक्रम में वास्तव में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, तो केवल किताबों के संस्करण बदलना और नई किताबें अनिवार्य करना कहीं न कहीं संदेह पैदा करता है।
सबसे चिंताजनक पहलू है—शिक्षा विभाग की निष्क्रियता। नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कोई भी स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। इसके बावजूद, यह प्रथा खुलेआम जारी है। इसका अर्थ यह है कि या तो नियमों का पालन नहीं हो रहा, या फिर उनके पालन को सुनिश्चित करने की इच्छाशक्ति का अभाव है। यह खामोशी कहीं न कहीं इस व्यवस्था को मौन स्वीकृति देती प्रतीत होती है।
यह भी आवश्यक है कि हम इस समस्या को केवल आलोचना तक सीमित न रखें, बल्कि इसके समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने की बात करें। सबसे पहले, शिक्षा विभाग को इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच करनी चाहिए और दोषी पाए जाने वाले संस्थानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। केवल चेतावनी या औपचारिक नोटिस पर्याप्त नहीं होंगे; आवश्यक है कि ऐसे मामलों में दंडात्मक कार्रवाई भी हो, ताकि एक स्पष्ट संदेश जाए।
दूसरे, किताबों की बिक्री में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। स्कूलों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे कौन-सी किताबें क्यों निर्धारित कर रहे हैं और उनकी कीमत क्या है। यदि संभव हो, तो सभी किताबों की सूची ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाए, ताकि अभिभावक कहीं से भी उन्हें खरीद सकें। इससे एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी बनी रहेगी और कीमतों में अनावश्यक वृद्धि पर रोक लगेगी।
तीसरे, सिलेबस में बार-बार होने वाले अनावश्यक बदलावों पर भी नियंत्रण होना चाहिए। यदि पाठ्यक्रम में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं है, तो किताबों को बार-बार बदलने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। इससे न केवल अभिभावकों का आर्थिक बोझ कम होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान मिलेगा।
चौथे, अभिभावकों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा। वे यदि संगठित होकर अपनी बात रखते हैं, तो इस प्रकार की प्रथाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है। समाज के अन्य वर्गों, जैसे सामाजिक संगठनों और मीडिया को भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाना चाहिए।
अंततः, हमें यह समझना होगा कि शिक्षा कोई वस्तु नहीं है, जिसे मुनाफे के लिए बेचा जाए। यह एक सामाजिक दायित्व है, जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को निर्धारित करता है। यदि इस क्षेत्र में अनियंत्रित व्यावसायीकरण को बढ़ावा दिया गया, तो इसका दुष्प्रभाव केवल वर्तमान पर ही नहीं, बल्कि आने वाले समय पर भी पड़ेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को उसके मूल उद्देश्य की ओर लौटाया जाए—ज्ञान, संस्कार और समान अवसर। यदि हम इस दिशा में समय रहते कदम नहीं उठाते, तो वह दिन दूर नहीं जब शिक्षा पूरी तरह एक व्यापार बन जाएगी, जहां किताबों के पन्नों में ज्ञान नहीं, बल्कि केवल लाभ-हानि का हिसाब लिखा होगा।



















