दूजे के घर आग में, सेंके अपने हाथ। याद रखो वह आग फिर, ढूँढे तेरा साथ।।
दूजे के दुख पर हँसे, चेहरे पर मुस्कान। वक्त बदलते देर क्या, रोएगा इंसान।।
जिसकी नाव डुबो रहे, बैठे उसके घाट। लहरों का भी धर्म है, लौटेंगी सौगात।।
आज किसी की हार पर, बजती तेरी गाल। कल तेरे ही द्वार पर, गूँजेगी बदहाल।।
दूजे की छत टूटती, तुम गिनते हो ईंट। वक्त पड़े तो दीखती, दुनिया कितनी नीच।।
जिस कुएँ में जहर तुम, रोज रहे हो डाल। प्यास कभी अपनी लगे, तब समझोगे हाल।।
परनिंदा के रस लिए, डूबे आठों याम। दिखा आईना सामने, भूलें अपना नाम।।
दूजे के घर राख को, समझ रहे हो खेल। हवा किसी की दास कब, बदले सारे मेल।।
जिनको गिरता देख तुम, हँस रहे हो यार। समय बड़ा है निर्दयी, देगा करके चार।।
दर्द किसी का बेचकर, करता अपना जोड़। वक्त पड़े तो लोग वो, सह ना पाते मोड़।।
दूजे की मजबूरियों, किया खूब व्यापार। होती क्या इंसानियत, क्या है तुम्हें विचार?।।
—– डॉ.सत्यवान सौरभ



