भीषण गर्मी में महिलाओं की बढ़ती परेशानियाँ

डॉ. विजय गर्ग
डॉ. विजय गर्ग

र्मी का मौसम हर किसी के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन महिलाओं के लिए यह चुनौती कई बार अधिक गंभीर रूप ले लेती है। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान, लगातार पड़ने वाली लू और लंबी होती गर्मी की अवधि ने महिलाओं के स्वास्थ्य, कामकाज और दैनिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। विशेष रूप से ग्रामीण और निम्न आय वर्ग की महिलाओं के सामने गर्मी से जुड़ी समस्याएँ अधिक जटिल रूप में उभर रही हैं।

महिलाएँ घर और बाहर दोनों स्थानों पर अनेक जिम्मेदारियाँ निभाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में वे खेतों में काम करती हैं, पशुओं की देखभाल करती हैं, पानी और ईंधन जुटाती हैं तथा घर के अन्य कार्य भी संभालती हैं। जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर पहुँच जाता है, तब इन कार्यों को करना उनके लिए अत्यंत कठिन हो जाता है। तेज धूप और गर्म हवाओं के कारण शरीर में पानी की कमी, थकान, चक्कर आना और हीट स्ट्रोक जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

गर्भवती महिलाओं के लिए भीषण गर्मी और भी अधिक खतरनाक साबित हो सकती है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक गर्मी गर्भावस्था के दौरान जटिलताओं को बढ़ा सकती है। इससे उच्च रक्तचाप, निर्जलीकरण तथा समय से पहले प्रसव जैसी समस्याएँ उत्पन्न होने की आशंका रहती है। कई शोध यह भी संकेत देते हैं कि लगातार उच्च तापमान माँ और शिशु दोनों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

शहरी क्षेत्रों में भी महिलाओं की परेशानियाँ कम नहीं हैं। घरों में खाना बनाते समय रसोई का तापमान पहले ही अधिक होता है। जब बाहर का तापमान भी अत्यधिक बढ़ जाता है, तब रसोई में काम करना और कठिन हो जाता है। कई निम्न आय वर्ग के परिवारों में एयर कंडीशनर तो दूर, पर्याप्त पंखे और शीतलन की सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होतीं। परिणामस्वरूप महिलाओं को लंबे समय तक गर्म वातावरण में रहना पड़ता है।

गर्मी का प्रभाव केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। यह मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। लगातार गर्मी, नींद की कमी, कार्यभार और परिवार की जिम्मेदारियों के कारण तनाव, चिड़चिड़ापन और चिंता की समस्याएँ बढ़ सकती हैं। महिलाओं को अक्सर परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल को प्राथमिकता देनी पड़ती है, जिससे वे अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा कर देती हैं।

जल संकट भी महिलाओं की कठिनाइयों को बढ़ा देता है। भारत के अनेक क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान पानी की उपलब्धता कम हो जाती है। ऐसे में महिलाओं और किशोरियों को पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे उनका समय और ऊर्जा दोनों खर्च होते हैं। कई बार उन्हें भीषण धूप में कई चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और बढ़ जाते हैं।

गरीब और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं पर गर्मी का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है। अस्थायी घरों, झुग्गियों या टिन की छत वाले मकानों में रहने वाली महिलाएँ दिनभर अत्यधिक गर्मी झेलती हैं। इनके पास स्वास्थ्य सेवाओं तक पर्याप्त पहुँच भी नहीं होती। इसलिए जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न संकट सामाजिक असमानताओं को और गहरा कर देता है।

इस समस्या का समाधान केवल व्यक्तिगत सावधानियों से संभव नहीं है। सरकारों, स्थानीय प्रशासन और समाज को मिलकर महिलाओं के लिए गर्मी से बचाव की बेहतर व्यवस्था करनी होगी। स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता, कार्यस्थलों पर छाया और विश्राम की व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार तथा जलवायु-संवेदनशील नीतियाँ समय की आवश्यकता हैं। साथ ही महिलाओं को गर्मी से बचाव के उपायों के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है।

भीषण गर्मी आज एक बहुत बड़ी स्वास्थ्य समस्या है। दुनियाभर में हर साल लगभग 490,000 लोग गर्मी से अपनी जान गंवा देते हैं। लेकिन ये आंकड़े महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी पर गर्मी के खतरनाक असर को नहीं दर्शाते। एक नए अध्ययन ने एशिया, अफ्रीका और ओशिनिया के उदाहरणों के हवाले से बताया है कि महिलाओं को गर्मी के हालात में सबसे ज्यादा एडजस्ट करने के लिए मजबूर किया जाता है, लेकिन जलवायु संबंधी नीतियों में उन्हें सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया जाता है। एशिया, अफ्रीका और ओशिनिया के कई हिस्सों में महिलाएं घर की मुख्य देखभाल करने वाली होती हैं। वे अक्सर पुरुषों के मुकाबले घर के अंदर ज्यादा समय बिताती हैं। उन्हें कम हवादार घरों में बिना इंसुलेशन या कूलिंग के रहना पड़ता है, जिससे उन्हें शारीरिक और मानसिक तनाव होता है। इससे पता चलता है कि बहुत ज्यादा गर्मी महिलाओं की सेहत को कैसे नुकसान पहुंचाती है।

काम की जगहों पर लिंग के आधार पर भेदभाव भी गर्मी के संपर्क को प्रभावित करता है। एक रिसर्च से पता चलता है कि अनौपचारिक काम की जगहों पर साफ-सफाई की कमी महिलाओं को बहुत ज्यादा गर्मी के दौरान खास तौर पर परेशान करती है। कुछ महिलाएं गंदे टॉयलेट इस्तेमाल करने से बचने के लिए कम पानी पीती हैं, जिससे उनमें डिहाइड्रेशन और सेहत से जुड़ी और दूसरी समस्याएं उत्पन हो जाती हैं। ये छोटी-मोटी परेशानियां नहीं हैं। ये सब मिलकर महिलाओं के गर्मी के संपर्क में निरंतर इजाफा करती हैं।

बहुत ज्यादा गर्मी महिलाओं की सामाजिक दुनिया को बदल देती है। हीटवेव के दौरान कई उष्णकटिबंधीय जगहों पर औरतें घर के अंदर रहती हैं, जिससे उनके सामाजिक संपर्क कम हो जाते हैं। बांग्लादेश, कंबोडिया और नेपाल में तेज गर्मी को बाल विवाह में बढ़ोतरी से जोड़ा गया है, क्योंकि मुश्किल में फंसे परिवार पैसे का तनाव कम करने और घर का खर्च कम करने के लिए अपनी बेटियों को शादी के लिए मजबूर करते हैं।

एक अन्य अध्ययन के अनुसार दुनिया के कई हिस्सों में परिवार ऐसे घरों में रहते हैं जो गर्मी को अंदर रोककर रखते हैं, जहां बिजली की भरोसेमंद सुविधा नहीं है और साफ पानी की उपलब्धता सीमित है। बहुत से लोग आज भी चिलचिलाती धूप में बाहर काम करते हैं। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ रहा है, इस तरह के हालात सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर संकट पैदा कर रहे हैं।

‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ में छपी एक नई स्टडी में बताया गया है कि दुनिया में अरबों लोग ‘कूलिंग पॉवर्टी’ (ठंडक की कमी) का सामना कर रहे हैं। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि दो अरब से ज्यादा लोग ऐसी स्थिति में रहते हैं जिसे वे कूलिंग पॉवर्टी कहते हैं। यानी वे खतरनाक गर्मी का सामना करते हैं और उनके पास ठंडक पाने के सुरक्षित या सस्ते तरीके नहीं होते।

ये नतीजे ऐसे समय में आए हैं जब दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में इन गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। इतनी ज्यादा गर्मी ये जरूरी सवाल खड़े करती है कि सबसे ज्यादा खतरे में कौन है और उनकी सुरक्षा के लिए क्या किया जा सकता है। आमतौर पर लोग मान लेते हैं कि इन लोगों को बस एक एयर कंडीशनर की जरूरत है। शोधकर्ता इस सोच को बदलना चाहते हैं। यूरो-मेडिटेरेनियन सेंटर ऑन क्लाइमेट चेंज के वैज्ञानिक जियाकोमो फाल्चेटा ने कहा, कूलिंग पॉवर्टी का मतलब ऐसे हालात से है जहां लोगों को ताप सुरक्षा नहीं मिल पाती और इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि उनके पास एयर कंडीशनर नहीं है।

वैसे भी, एयर कंडीशनर बांटने से कोई लाभ नहीं होगा। वे बहुत ज्यादा बिजली की खपत करते हैं और कमजोर पावर ग्रिड पर बोझ डालते हैं। हम इस संकट से निपटने के लिए सिर्फ एयर कंडीशनर का सहारा नहीं ले सकते। गरीबी गर्मी के असर को और बढ़ा देती है। स्टडी से पता चलता है कि गर्मी गरीबी, खराब घरों और कमजोर सार्वजनिक सेवाओं के साथ मिलकर नुकसान पहुंचाती है। पहला खतरा तो घर ही है। कमज़ोर बनावट वाला घर आपको गर्मी से नहीं बचाता; बल्कि वह गर्मी को अंदर ही रोककर रखता है।

शहरों में रहने वाले लाखों गरीब लोग टिन या एस्बेस्टस की छतों के नीचे रहते हैं, जिससे घर के अंदर का तापमान बाहर की हवा के मुकाबले पांच डिग्री तक ज्यादा हो सकता है। जब बिजली बार-बार जाती है और पानी सुरक्षित नहीं होता, तो पर्याप्त पानी पीना और शरीर को ठंडा रखना भी मुश्किल हो जाता है। दूसरा खतरा सेहत से जुड़ा है। जब भीषण गर्मी शरीर की सहनशक्ति से बाहर हो जाती है,तो जान बचाने के लिए अक्सर तुरंत मदद की जरूरत होती है।

जिन देशों में क्लिनिक कम हैं या दूर हैं, वहां गर्मी से होने वाली बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है। तीसरा खतरा काम से जुड़ा है। किसान, निर्माण कार्य करने वाले और सड़क किनारे सामान बेचने वाले लोग घंटों तक खुली धूप में काम करते हैं और वे किसी ठंडे कमरे में नहीं जा सकते। उनके शरीर को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है,क्योंकि यह गर्मी ज्यादातर नमी वाली होती है, जिससे पसीना त्वचा को ठंडा नहीं कर पाता। इन मुश्किलों का असर सब पर एक जैसा नहीं होता।

महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और सबसे गरीब परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। अक्सर यही लोग खराब घरों में रहते हैं। उन्हें स्वास्थ्य सेवा और जानकारी नहीं मिल पाती, और खुद को बचाने के लिए उनके पास कोई अतिरिक्त साधन नहीं होता। अगर समुदायों के पास गर्मी से निपटने के साधन हों, तो इसके असर को कम किया जा सकता है। अच्छी बात यह है कि आसान और कम खर्चीले उपाय भी कारगर होते हैं। छतों को सफेद रंगने से कमरे का तापमान कई डिग्री कम हो सकता है। पुआल और मिट्टी से सस्ता इंसुलेशन (तापमान रोकने वाली परत) बनाया जा सकता है। पेड़ लगाने, तालाबों और पार्कों को ठीक करने और नि:शुल्क पानी की सुविधा वाले सार्वजनिक शेल्टर खोलने जैसे उपायों से पूरे इलाके को बिना किसी एयर कंडीशनर के ठंडा रखने में मदद मिलती है।

नि:संदेह, तेजी से गर्म होती दुनिया में ढालने के लिए सरकारों, संस्थाओं और लोगों को मिलकर कोशिश करनी पड़ेगी। छतों पर सफेद पेंट को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्योंकि सफेद पेंट सूरज की अधिकांश रोशनी को परावर्तित करके कमरों को ठंडा रखता है। सरकार को इसके लिए विशेष जन अभियान चलाना चाहिए। चूंकि गर्मी महिलाएं और पुरुषों को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करती है, नीति-निर्धारकों को इस अंतर का भी ध्यान रखना पड़ेगा।

भीषण गर्मी अब केवल मौसम की समस्या नहीं रह गई है; यह स्वास्थ्य, समानता और सामाजिक न्याय का मुद्दा बन चुकी है। यदि महिलाओं की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नीतियाँ नहीं बनाई गईं, तो बढ़ता तापमान उनके जीवन और आजीविका पर और अधिक गंभीर प्रभाव डाल सकता है। इसलिए आवश्यक है कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में महिलाओं के अनुभवों और चुनौतियों को केंद्र में रखा जाए।

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