Tuesday, May 19, 2026
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अंकों की चमक में दबता बचपन और शिक्षा का असली उद्देश्य

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अंकों की चमक में दबता बचपन और शिक्षा का असली उद्देश्य
अंकों की चमक में दबता बचपन और शिक्षा का असली उद्देश्य
डॉ.सत्यवान सौरभ
डॉ.सत्यवान सौरभ

विज्ञापन हुई पढ़ाई,अंकों की चमक में दबता बचपन और शिक्षा का असली उद्देश्य।

परीक्षा परिणाम आते ही आजकल विद्यालयों के बाहर एक अजीब सी होड़ दिखाई देने लगती है। कहीं बड़े-बड़े होर्डिंग लगे होते हैं, कहीं रंगीन पोस्टर, कहीं सोशल मीडिया पर लगातार तस्वीरों की भरमार। किसी छात्र के साथ 99%, किसी के साथ 98%, किसी के साथ 97% अंक लिखे होते हैं। विद्यालय इन तस्वीरों को ऐसे प्रस्तुत करते हैं मानो कोई व्यावसायिक उपलब्धि हासिल हुई हो। देखने वाले अभिभावकों को संदेश दिया जाता है कि यही वह संस्थान है जहाँ “सफलता” मिलती है। शिक्षा अब धीरे-धीरे ज्ञान का माध्यम कम और प्रचार का साधन अधिक बनती दिखाई दे रही है। यही कारण है कि आज यह प्रश्न गंभीरता से उठने लगा है कि क्या पढ़ाई अब शिक्षा कम और विज्ञापन अधिक बन गई है?

निस्संदेह, मेहनत करने वाले विद्यार्थियों का सम्मान होना चाहिए। अच्छे परिणाम किसी भी छात्र, शिक्षक और अभिभावक के लिए गर्व का विषय होते हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब विद्यालय केवल कुछ चुनिंदा विद्यार्थियों को ही सफलता का चेहरा बनाकर प्रस्तुत करने लगते हैं। बाकी बच्चे, जिन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार मेहनत की, संघर्ष किया, परिस्थितियों से लड़ते हुए परीक्षा पास की, वे सब इस चमक-दमक में कहीं पीछे छूट जाते हैं। विद्यालय के पोस्टरों पर उनकी तस्वीरें नहीं होतीं, उनके प्रयासों की चर्चा नहीं होती। धीरे-धीरे उनके मन में यह भावना बैठने लगती है कि शायद वे पर्याप्त अच्छे नहीं हैं।

आज शिक्षा का वातावरण अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक हो चुका है। बच्चे अब ज्ञान प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि प्रतिशत हासिल करने के लिए पढ़ रहे हैं। माता-पिता की अपेक्षाएँ, समाज की तुलना और विद्यालयों की प्रचार नीति मिलकर बच्चों पर ऐसा दबाव बना देती हैं कि वे स्वयं को अंकों के तराजू में तौलने लगते हैं। यदि किसी बच्चे के 95% अंक आए हैं तो वह “प्रतिभाशाली” कहलाता है, लेकिन 70% लाने वाला बच्चा स्वयं को साधारण या कमजोर मानने लगता है। यह सोच शिक्षा की आत्मा के विरुद्ध है।

हर बच्चा अलग होता है। किसी की रुचि विज्ञान में होती है, किसी की साहित्य में, कोई खेल में उत्कृष्ट होता है तो कोई कला, संगीत या तकनीकी कौशल में। लेकिन वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने सफलता की परिभाषा को केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित कर दिया है। विद्यालय भी उसी दिशा में चलते दिखाई देते हैं जहाँ उन्हें अधिक प्रचार और अधिक प्रवेश मिलने की संभावना हो। परिणामस्वरूप बच्चे “विद्यार्थी” कम और “रिजल्ट प्रोडक्ट” अधिक बनते जा रहे हैं।

सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि इस प्रकार का प्रचार बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। जिन छात्रों के अंक अपेक्षाकृत कम आते हैं, वे स्वयं को दूसरों से कमतर समझने लगते हैं। कई बच्चे अवसाद, तनाव और हीनभावना का शिकार हो जाते हैं। कुछ बच्चे तो इतने दबाव में आ जाते हैं कि वे परिवार और समाज से कटने लगते हैं। आज देश में परीक्षा परिणामों के बाद आत्महत्या जैसी घटनाएँ भी सामने आती हैं। यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि उस सामाजिक और शैक्षणिक दबाव का परिणाम है जो बच्चों पर लगातार डाला जा रहा है।

विद्यालयों को यह समझना होगा कि शिक्षा केवल टॉपर बनाने का माध्यम नहीं है। एक योग्य शिक्षक की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि उसके कितने छात्रों ने 95% अंक प्राप्त किए, बल्कि इससे होती है कि उसने कितने बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाया। असली शिक्षा वह है जो बच्चे को जीवन के संघर्षों के लिए तैयार करे, उसे संवेदनशील बनाए, उसके भीतर नैतिकता और मानवता का विकास करे। यदि कोई बच्चा परीक्षा में औसत अंक लाता है लेकिन अच्छा इंसान बनता है, समाज के प्रति जिम्मेदार बनता है, तो वह भी शिक्षा की सफलता है।

आज कई विद्यालय परीक्षा परिणामों को व्यवसायिक रणनीति की तरह इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट, अखबारों में विज्ञापन, शहर भर में बैनर—यह सब शिक्षा के व्यवसायीकरण का संकेत है। अभिभावक भी इन चमकदार परिणामों से प्रभावित होकर विद्यालय चुनते हैं। उन्हें लगता है कि जहाँ अधिक टॉपर हैं, वही विद्यालय श्रेष्ठ है। लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता केवल कुछ विद्यार्थियों के प्रतिशत से तय नहीं हो सकती। किसी विद्यालय की वास्तविक पहचान इस बात से होनी चाहिए कि वहाँ औसत और कमजोर छात्रों के साथ कैसा व्यवहार होता है, उन्हें कितना सहयोग और प्रोत्साहन मिलता है।

यह भी सच है कि बहुत से विद्यालय जानबूझकर केवल मेधावी बच्चों पर अधिक ध्यान देते हैं ताकि उनका परिणाम अच्छा दिखाई दे। कमजोर छात्रों को अक्सर उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। कई बार उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि वे विद्यालय की “प्रतिष्ठा” पर बोझ हैं। यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। शिक्षा में समान अवसर और समान सम्मान सबसे आवश्यक तत्व हैं। यदि विद्यालय ही बच्चों में भेदभाव करने लगेंगे, तो समाज में संवेदनशीलता कैसे विकसित होगी?

अभिभावकों की भूमिका भी यहाँ महत्वपूर्ण है। कई माता-पिता अपने बच्चों की तुलना दूसरों से करने लगते हैं। “देखो शर्मा जी के बेटे के 98% आए हैं” जैसे वाक्य बच्चों के आत्मविश्वास को तोड़ देते हैं। हर बच्चा अपनी गति और क्षमता के अनुसार सीखता है। जरूरत उसे समझने और प्रोत्साहित करने की है, न कि उसे लगातार दूसरों से कम साबित करने की। बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि वे केवल अंकों के कारण प्रिय नहीं हैं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और प्रयास भी महत्वपूर्ण हैं।

हमें यह भी समझना होगा कि जीवन में सफलता का संबंध केवल परीक्षा परिणामों से नहीं होता। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ औसत या सामान्य छात्र आगे चलकर महान वैज्ञानिक, लेखक, कलाकार, उद्यमी और नेता बने। दुनिया के कई सफल लोग पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में “टॉपर” नहीं थे। उनका आत्मविश्वास, रचनात्मकता और संघर्ष ही उनकी असली ताकत बने। इसलिए बच्चों को केवल प्रतिशत के आधार पर परखना उनके भविष्य को सीमित करना है।

विद्यालय यदि सचमुच बच्चों को प्रेरित करना चाहते हैं तो उन्हें केवल टॉपर्स की तस्वीरें लगाने के बजाय हर उस छात्र की सराहना करनी चाहिए जिसने मेहनत की है। किसी ने पिछली बार से सुधार किया, किसी ने कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई जारी रखी, किसी ने आर्थिक समस्याओं के बावजूद परीक्षा पास की—ये उपलब्धियाँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। शिक्षा का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा से अधिक सहयोग होना चाहिए।

आज जरूरत इस बात की है कि शिक्षा को फिर से मानवीय बनाया जाए। बच्चों को यह सिखाया जाए कि उनका मूल्य केवल रिपोर्ट कार्ड से तय नहीं होता। विद्यालयों में ऐसी संस्कृति विकसित होनी चाहिए जहाँ हर बच्चा सम्मान और आत्मविश्वास महसूस करे। शिक्षक बच्चों के भीतर सीखने की जिज्ञासा जगाएँ, केवल अंक लाने की दौड़ नहीं। शिक्षा तब सार्थक होगी जब वह बच्चों को बेहतर इंसान बनाएगी, न कि केवल बेहतर प्रतिशत दिलाएगी। सरकार और शिक्षा विभाग को भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। विद्यालयों के प्रचार के लिए बच्चों की तस्वीरों और अंकों के अत्यधिक प्रदर्शन पर कुछ दिशानिर्देश होने चाहिए। शिक्षा संस्थानों को यह समझाना होगा कि बच्चे विज्ञापन का माध्यम नहीं हैं। उनकी भावनाएँ, आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य किसी भी प्रचार से अधिक महत्वपूर्ण हैं।

समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। यदि हम केवल ऊँचे अंकों वालों को ही सम्मान देंगे, तो बाकी बच्चे स्वयं को असफल समझने लगेंगे। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर बच्चा अलग है और हर प्रतिभा महत्वपूर्ण है। कोई बच्चा डॉक्टर बनेगा, कोई कलाकार, कोई किसान, कोई सैनिक, कोई शिक्षक—हर भूमिका समाज के लिए आवश्यक है। शिक्षा का उद्देश्य सभी को एक ही साँचे में ढालना नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत क्षमता को विकसित करना होना चाहिए।

आज जब पढ़ाई “विज्ञापन” बनती जा रही है, तब सबसे अधिक आवश्यकता संवेदनशीलता की है। विद्यालयों को बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिए, न कि उन्हें तुलना और प्रदर्शन की मशीन बनाना चाहिए। बच्चे प्रतिशत नहीं, भविष्य हैं। उनका सम्मान केवल अंकों से नहीं, बल्कि उनके प्रयास, संघर्ष और सपनों से होना चाहिए। यदि शिक्षा केवल पोस्टरों और प्रतिशतों तक सीमित हो गई, तो हम शायद अच्छे अंक तो पा लेंगे, लेकिन अच्छे इंसान खो देंगे। इसलिए समय की मांग है कि शिक्षा को फिर से शिक्षा बनने दिया जाए, विज्ञापन नहीं।