

करीब उन्नीस साल पहले बहुजन राजनीति की अगुआ मायावती ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का जो प्रयोग किया था, उसने यह साबित कर दिया था कि अगर सामाजिक समीकरण सधे हों तो सियासी गणित ध्वस्त भी हो सकता है. 2007 की जीत उसी प्रयोग की देन थी. लेकिन समय के साथ वही फार्मूला कमजोर पड़ता गया. दलित-मुस्लिम समीकरण आजमाया गया, फिर दोबारा ब्राह्मणों की ओर हाथ बढ़ाया गया, लेकिन बीएसपी का जनाधार सिमटता चला गया. 2022 में पार्टी एक सीट पर आ गई. यह गिरावट खुद बताती है कि सिर्फ नारे और प्रतीक काफी नहीं होते, जमीन पर भरोसा भी चाहिए.इसी बदले हुए माहौल में सोशल इंजीनियरिंग 2.0 की चर्चा शुरू हुई है. इस बार प्रयोग सिर्फ एक दल नहीं कर रहा.
इस रणनीति का एक और पहलू है. राजभर का निशाना बार-बार समाजवादी पार्टी पर रहा. संदेश यह कि आजमगढ़ में जो भीड़ जुटी है, वह सिर्फ समर्थन देने नहीं, बल्कि सपा के दबदबे को तोड़ने आई है. यह दावा जितना राजनीतिक है, उतना ही मनोवैज्ञानिक भी. चुनाव से पहले अगर किसी क्षेत्र में यह धारणा बन जाए कि मुकाबला अब एकतरफा नहीं रहा, तो वोटर का व्यवहार बदलने लगता है.उधर, समाजवादी पार्टी भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी. पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का जो फॉर्मूला लोकसभा चुनाव 2024 में असरदार साबित हुआ, उसी को आगे बढ़ाने की तैयारी है. लेकिन साथ ही ब्राह्मणों के बीच संदेश देने की कोशिशें भी दिख रही हैं. विधानसभा में नेता विपक्ष के तौर पर माता प्रसाद पांडेय की नियुक्ति, पूर्वांचल के प्रभावशाली ब्राह्मण परिवारों से मुलाकातें और सोशल मीडिया के जरिए दिए जा रहे संकेत इसी दिशा में पढ़े जा रहे हैं.
भाजपा के लिए स्थिति और भी नाजुक है. सत्ता में होने के फायदे हैं, लेकिन एंटी-इनकंबेंसी का दबाव भी. पार्टी के भीतर ब्राह्मण बनाम ठाकुर की चर्चाएं सामने आ चुकी हैं. कुछ ब्राह्मण विधायकों की बैठक और उस पर नेतृत्व की नाराजगी ने साफ कर दिया कि अंदरखाने खींचतान है. बरेली से लेकर प्रयागराज तक सामने आए विवादों ने इस असंतोष को और हवा दी. यही वजह है कि उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक जैसे चेहरे प्रतीकात्मक कदमों के जरिए ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश करते नजर आए.कांग्रेस इस पूरी बहस में अपेक्षाकृत खामोश है. एक तरफ राहुल गांधी की ओबीसी राजनीति, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की मजबूरी. कभी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की पहली पसंद रही कांग्रेस अब असमंजस में दिखती है. क्या वह दोबारा उस वर्ग की ओर खुले मन से लौट पाएगी, या मौजूदा लाइन पर ही चलेगी, यह वक्त बताएगा.
असल सवाल यह है कि क्या ब्राह्मण वोट बैंक आज भी किसी सोशल इंजीनियरिंग का निर्णायक आधार बन सकता है. आंकड़े बताते हैं कि सवर्ण आबादी करीब बीस फीसदी है, जिसमें ब्राह्मण सबसे बड़ा हिस्सा हैं. लेकिन यह वोट हमेशा जाति के आधार पर एकजुट नहीं होता. उम्मीदवार, क्षेत्रीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और सत्ता का माहौल सब मिलकर फैसला तय करते हैं. यही कारण है कि ब्राह्मण राजनीति जोखिम भरी भी है और जरूरी भी.2027 की ओर बढ़ते उत्तर प्रदेश में सियासत अब सिर्फ नारों की नहीं, बल्कि धैर्य, संगठन और भरोसे की परीक्षा बनती जा रही है. सोशल इंजीनियरिंग 2.0 का शोर तेज है, लेकिन उसका नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन सा दल प्रतीकों से आगे जाकर ज़मीनी हकीकत को साध पाता है. ब्राह्मण वोटर इस बार भी निर्णायक हो सकता है, लेकिन किसके पक्ष में, यह अभी पूरी तरह खुला सवाल है.
























