Friday, January 16, 2026
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ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी अब हकीकत बनी..!

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ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी अब हकीकत बनी..!
ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी अब हकीकत बनी..!
सुनील कुमार महला
सुनील कुमार महला

ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी अब हकीकत बन चुकी है:-यूरोपीय संघ की कोपरनिकस जलवायु परिवर्तन सेवा (सी3एस) द्वारा जलवायु परिवर्तन को लेकर आई हालिया रिपोर्ट में गंभीर चेतावनी। ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी अब हकीकत बनी..!

धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और इसके दुष्परिणाम अब पूरी दुनिया में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। इसी क्रम में यूरोपीय संघ की कोपरनिकस जलवायु परिवर्तन सेवा (सी3एस) ने 14 जनवरी 2026 को जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की। रिपोर्ट के अनुसार, यह इतिहास में पहली बार हुआ है जब लगातार तीन वर्षों-2023, 2024 और 2025 के दौरान वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। वर्ष 2025 रिकॉर्ड में तीसरा सबसे गर्म वर्ष रहा, जो वर्ष 2023 से 0.01 डिग्री सेल्सियस और 2024 से 0.13 डिग्री सेल्सियस ठंडा था। गौरतलब है कि वर्ष 2024 सबसे गर्म और वर्ष 2023 दूसरा सबसे गर्म वर्ष रहा, जबकि पिछले 11 वर्ष अब तक के सबसे गर्म वर्षों की सूची में शामिल हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2025 में अंटार्कटिका ने अब तक का सबसे गर्म साल दर्ज किया, जबकि आर्कटिक क्षेत्र दूसरे स्थान पर रहा। तापमान में इस असामान्य वृद्धि के कारण दुनिया भर में भीषण तबाही देखने को मिली। भारत और पाकिस्तान में मानसूनी बारिश और बाढ़ से एक हजार से अधिक लोगों की जान गई। वैज्ञानिकों ने इस गर्मी के लिए दो प्रमुख कारण बताए हैं—पहला, ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, जलवाष्प, ओजोन और फ्लोरोन युक्त गैसों का लगातार बढ़ता उत्सर्जन, और दूसरा, अल-नीनो की सक्रियता के साथ महासागरों की सतह का रिकॉर्ड स्तर तक गर्म होना।

अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री सतही तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है, जिससे वैश्विक मौसम प्रणाली प्रभावित होती है। भारत में अल-नीनो के दौरान मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे कम वर्षा, सूखा और अत्यधिक गर्मी की स्थिति बनती है, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में भारी वर्षा और बाढ़ जैसी आपदाएँ देखने को मिलती हैं।

धरती के बढ़ते तापमान का ताज़ा उदाहरण उत्तराखंड का ओम पर्वत है, जो आमतौर पर जनवरी महीने में मोटी बर्फ की चादर से ढका रहता है। वर्ष 2026 में, लगभग 15,700 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह पवित्र पर्वत शीतकाल के बीचों-बीच भी लगभग बर्फविहीन नजर आ रहा है। ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में पर्याप्त बर्फबारी न होने के कारण पर्वत का निचला और मध्य हिस्सा काला दिखाई दे रहा है। पहले अगस्त-सितंबर में बर्फ का न होना असामान्य माना जाता था, लेकिन अब जनवरी में भी यही स्थिति सामने आना जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी है।

वर्ष 2025 में बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण पृथ्वी पर भारी तबाही देखी गई। औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में औसत वैश्विक तापमान लगभग 1.47 से 1.48 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जिससे यह वर्ष अब तक का तीसरा सबसे गर्म साल बन गया। इसके परिणामस्वरूप हीटवेव, बाढ़, तूफान और सूखे जैसी आपदाओं से वैश्विक आर्थिक नुकसान 120 बिलियन डॉलर से अधिक पहुँच गया। अकेले कैलिफ़ोर्निया की जंगल की आग से लगभग 60 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ और 400 से अधिक लोगों की जान चली गई।

एशिया में भारत और पाकिस्तान की बाढ़ ने लगभग 1,860 से अधिक लोगों की मौतें दर्ज कीं और करीब 5.6 बिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ, जबकि पाकिस्तान में 70 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए। एक प्रतिष्ठित पत्रिका के अनुसार, भारत में 2025 के पहले 11 महीनों में 334 में से 331 दिनों पर कहीं न कहीं चरम मौसम की घटनाएँ दर्ज की गईं। इन घटनाओं में लगभग 4,419 लोगों की मौत हुई, 1.74 करोड़ हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई और 1.81 लाख से अधिक घरों को नुकसान पहुँचा।

भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लोबल वार्मिंग का असर और भी तेज़ी से दिखाई दे रहा है। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में तापमान वृद्धि की दर वैश्विक औसत से अधिक है, जिसके कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, लद्दाख के ज़ांस्कर क्षेत्र में स्थित डुरुंग-द्रुंग ग्लेशियर 2015 से 2023 के बीच लगभग 165 मीटर पीछे हट चुका है। डाउन टू अर्थ पत्रिका के अनुसार, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर 2011 से 2020 के दौरान पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत तेज़ी से सिकुड़े हैं, और यदि तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तो सदी के अंत तक लगभग 45 से 50 प्रतिशत बर्फ समाप्त हो सकती है।

ग्लेशियर और बर्फ पहाड़ों में जल का प्राकृतिक भंडार होते हैं। सर्दियों की बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर साल भर नदियों को पानी देती है, लेकिन बढ़ते तापमान के कारण अब बर्फ कम गिर रही है और जल्दी पिघल भी रही है। बर्फ की जगह बारिश हो रही है, जो तुरंत बह जाती है, जिससे बारिश और बर्फ का संतुलन बिगड़ रहा है। डाउन टू अर्थ के अनुसार, वर्ष 2100 तक सर्दियों में बर्फबारी लगभग 25.8 प्रतिशत और वसंत में लगभग 54.1 प्रतिशत तक कम हो सकती है, जिससे भविष्य में जल संकट, सूखा और अचानक बाढ़ जैसी समस्याएँ और गंभीर होंगी।

हिमालयी ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी प्रमुख नदियों का आधार है। बर्फ में कमी का सीधा अर्थ है गर्मियों में नदियों में कम पानी, गिरता भूजल स्तर और कृषि पर बढ़ता संकट। आज उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में जलस्रोत सूख रहे हैं, जिससे गाँवों का परित्याग, कृषि संकट और आजीविका पर खतरा बढ़ रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव अब केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा है। भारत के मैदानी, तटीय और शहरी इलाकों में भी इसके दुष्परिणाम स्पष्ट हैं। वर्ष 2025 में देशभर में 270 से अधिक दिनों तक चरम मौसम की घटनाएँ दर्ज की गईं। फरवरी 2025 पिछले 124 वर्षों में सबसे गर्म महीना रहा, जबकि गर्मी के मौसम में भारत-पाकिस्तान क्षेत्र में कई स्थानों पर तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया। एक अध्ययन के अनुसार, भारत के 85 प्रतिशत से अधिक जिले अब बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी चरम जलवायु घटनाओं के जोखिम में हैं।

इन लगातार बढ़ते प्रभावों के चलते ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स-2026 में भारत को दुनिया के सबसे अधिक प्रभावित देशों में नौवाँ स्थान मिला है। संक्षेप में, यह स्पष्ट है कि ग्लोबल वार्मिंग अब केवल तापमान वृद्धि तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह मानव जीवन, कृषि, जल संसाधन, बुनियादी ढाँचे और अर्थव्यवस्था पर गहरा और विनाशकारी प्रभाव डाल रही है। वर्ष 2025 इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट भविष्य में और अधिक भयावह रूप ले सकता है। ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी अब हकीकत बनी..!