अपने ही लटका रहें…

लगता खूब अजीब है, रिश्तों का संसार,

अपने ही लटका रहें, गर्दन पर तलवार॥

चेहरों पर मुस्कान है, भीतर गहरा वार,

मीठी बोली में छुपा, छल का सारा सार। 

विश्वासों की नींव पर, होते रोज़ प्रहार—

सौरभ खूब अजीब है, रिश्तों का संसार

अपनों की इस भीड़ में, गायब सच्चा प्यार,

पीठ पीछे वार कर, करते रोज प्रहार।

नेह-नदी सूख गई, टूटा हर व्यवहार—

सौरभ खूब अजीब है, रिश्तों का संसार॥

स्वार्थों की इस आग में, जलते सब संस्कार, 

दिख जाए जब फायदा, बदलें सभी विचार। 

सच्चे दिल की राह पर, मिलता तिरस्कार— 

सौरभ खूब अजीब है, रिश्तों का संसार॥

जागो अब इंसान तुम, समझो यह व्यवहार, 

सत्य-प्रेम के साथ ही, रहे संबंध प्यार।

वरना हो अलगाव बस, सौरभ बारंबार—

सौरभ खूब अजीब है, रिश्तों का संसार॥

….. डॉ.प्रियंका सौरभ

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