
समय तुम्हारा जो लगे, करने में श्रृंगार,
स्वयं-ज्ञान में लग सके, हो नारी उद्धार॥
हे नारी, पहचान तू, अपने मन का सार,
बढ़कर तेरे रूप से, ज्ञानमयी विस्तार।
सज-सँवरना ठीक है, जीवन का श्रृंगार,
पर खुद से खुद मेल भी, सबसे बड़ा विचार।
आईना दिखलाए तन, दिखता कब है मौन,
भीतर छिपे उजास को, बाहर लाये कौन।
जब तू खुद को जान ले, गिरती भ्रम दीवार,
आत्म-दीप से जगमगे, जीवन का हर द्वार।
बाहरी आभूषण लिए, केवल क्षणिक निखार,
अंतर का आलोक ही, देता सच्चा प्यार।
ज्ञान-दीप जब जल उठे, छँट जाए अंधकार,
स्वयं-चेतना से सजे, नारी का संसार॥
—– डॉ.प्रियंका सौरभ
























