Sunday, February 1, 2026
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रिश्ते,शर्तें और डर से घिरी एक पीढ़ी..!

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रिश्ते,शर्तें और डर से घिरी एक पीढ़ी..!
रिश्ते,शर्तें और डर से घिरी एक पीढ़ी..!
प्रियंका सौरभ
प्रियंका सौरभ

आज की पीढ़ी भावनाओं से ज़्यादा समझौतों में जी रही है। रिश्ते अब भरोसे नहीं, शर्तों पर टिके हैं और फैसले सपनों से नहीं, डर से लिए जा रहे हैं। करियर का दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ और असफलता का भय—इन सबके बीच एक पूरी पीढ़ी खुद को साबित करने की जद्दोजहद में उलझी हुई है। सवाल यह है कि क्या यह पीढ़ी सच में आज़ाद है, या सिर्फ हालातों की कैद में जी रही है? रिश्ते,शर्तें और डर से घिरी एक पीढ़ी..!

आज के समय में यदि कोई सबसे जोखिम भरा सामाजिक कार्य है, तो वह है—किसी को रिश्ते की बात कहना। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि हमारे बदलते सामाजिक मानस की सच्चाई है। जिस विषय को कभी परिवार, भरोसे और सामूहिक निर्णय का आधार माना जाता था, वह आज शर्तों, अपेक्षाओं और भय की प्रयोगशाला बन चुका है। परिणाम यह है कि अच्छे-खासे घरों में पढ़े-लिखे, सक्षम युवा कुंवारे बैठे-बैठे अधेड़ हो रहे हैं, लेकिन समझौते को कमजोरी मानकर ठुकराया जा रहा है। रिश्ते,शर्तें और डर से घिरी एक पीढ़ी..!

आज रिश्ते भावनात्मक समझ से अधिक तकनीकी परियोजना की तरह देखे जा रहे हैं। हर प्रस्ताव एक लंबी “चेकलिस्ट” के साथ आता है—हाइट कितनी है, रंग कैसा है, पैकेज कितना है, घर कितना बड़ा है, ज़मीन कितनी है, माता-पिता कितने हस्तक्षेप करते हैं, भविष्य में कौन कितना “एडजस्ट” करेगा। इस गणित में मनुष्य ग़ायब है, आंकड़े उपस्थित हैं। यही वजह है कि रिश्ता तय करने में महीनों लगते हैं, पर टूटने में कुछ हफ्ते भी पर्याप्त हो जाते हैं।

यह पीढ़ी सुविधाओं की भाषा में रिश्ते तलाश रही है। लड़कियों को ऐसा घर चाहिए जहाँ घरेलू श्रम की कोई अपेक्षा न हो, जहाँ जिम्मेदारी का बोझ “पुरानी सोच” मान लिया जाए। वहीं लड़कों को ऐसी बहू चाहिए जो आधुनिक भी हो और परंपरागत अपेक्षाओं का निर्वाह भी बिना सवाल किए करे। दोनों पक्ष चाहते हैं कि सामने वाला “समझौता” करे, पर स्वयं झुकने को कोई तैयार नहीं। रिश्ते साझेदारी नहीं, सेवाओं की सूची बनते जा रहे हैं।

हनीमून पेरिस में मनाने का सपना है, लेकिन अपने ही देश और अपने परिवेश की जिम्मेदारियों से बचने में पसीना छूट जाता है। यह विरोधाभास केवल भौगोलिक नहीं, मानसिक है। वैश्विक आकांक्षाएँ हैं, पर स्थानीय दायित्वों से परहेज़। आधुनिकता का अर्थ सुविधाओं का उपभोग समझ लिया गया है, दायित्वों को स्वीकार करना नहीं।

खेती किसी को करनी नहीं, पर ज़मीन—क़िल्ले—ज़रूर होने चाहिए। मेहनत का सम्मान घटा है, संपत्ति का आकर्षण बढ़ा है। जिस समाज की जड़ें श्रम में थीं, वहाँ अब श्रम से दूरी और संपत्ति से निकटता प्रतिष्ठा का मानक बन गई है। रिश्ता तय करते समय परिश्रम, धैर्य, संघर्ष और जीवन-कौशल की जगह संपत्ति, पद और प्रोफ़ाइल ने ले ली है। इंसान का मूल्यांकन उसके चरित्र से नहीं, उसके संसाधनों से किया जा रहा है।

आज एक-एक इंच हाइट नापी जाती है; रंग, जाति, सैलरी, कार और सोशल मीडिया की मौजूदगी तक गिनी जाती है। विवाह-पूर्व जाँच एजेंसियों की तरह रिश्तों की पड़ताल होती है। लेकिन तमाम जाँच-पड़ताल के बावजूद छह महीने बाद वही लोग कोर्ट के बाहर खड़े मिल जाते हैं। सवाल यह नहीं कि तलाक क्यों बढ़ रहे हैं; सवाल यह है कि इतनी सावधानी के बाद भी रिश्ते टिक क्यों नहीं रहे? क्योंकि हमने मानवीय गुणों को मापना छोड़ दिया है—संवाद, सहनशीलता, धैर्य, असहमति में सम्मान और संकट में साथ निभाने की क्षमता।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे त्रासद स्थिति माँ-बाप की है। वे बच्चों से डरते हैं—कि कहीं कुछ कह न दें, कहीं दबाव न डाल दें, कहीं “इमोशनल ब्लैकमेल” का आरोप न लग जाए। दूसरी ओर बच्चे शादी से डरते हैं—जिम्मेदारी, स्थायित्व और समझौते से। रिश्ता दोनों के बीच पिस रहा है। यह डर का ऐसा चक्र है जिसमें कोई नेतृत्व नहीं चाहता, सब दर्शक बने रहना चाहते हैं।

माता-पिता आज निर्णयकर्ता नहीं, केवल वित्तीय और भावनात्मक सहायक बनकर रह गए हैं। वे न रिश्ता सुझा सकते हैं, न आपत्ति जता सकते हैं। वहीं युवा पीढ़ी स्वतंत्रता चाहती है, लेकिन निर्णयों की जवाबदेही से बचना चाहती है। यह असंतुलन रिश्तों को खोखला कर रहा है। स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी उठाने की क्षमता होना चाहिए—यह बुनियादी समझ कहीं खो गई है।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि हमारे माँ-बाप का समय अलग था। यह सच है कि तब दुनिया सरल थी, विकल्प कम थे। लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि तब भरोसा था। उन्होंने न काला देखा, न गोरा; न लंबी सूची बनाई, न परफेक्ट प्रोफ़ाइल ढूँढी। बुज़ुर्गों पर भरोसा किया, परिवार की सामूहिक बुद्धि पर विश्वास रखा और उसी भरोसे के सहारे जीवन जिया। यह नहीं कि तब समस्याएँ नहीं थीं, पर समस्याओं से भागने की प्रवृत्ति नहीं थी।

आज समस्याएँ कम नहीं हुईं, बल्कि समाधान से भागने की आदत बढ़ी है। छोटी-छोटी असहमति को “टॉक्सिक” करार देकर रिश्ता तोड़ देना साहस नहीं, पलायन है। विवाह को आज़ादी का अंत समझा जाने लगा है, जबकि सच यह है कि सही साझेदारी ही व्यक्ति को मानसिक और भावनात्मक स्वतंत्रता देती है। अकेले रहने का विकल्प सबके लिए संभव नहीं, और सबके लिए समाधान भी नहीं।

सोशल मीडिया और मैट्रिमोनियल ऐप्स ने अपेक्षाओं को बाज़ार बना दिया है। हर प्रोफ़ाइल तुलना का विषय है, हर विकल्प अस्थायी। “बेहतर” की खोज अंतहीन है, इसलिए “पर्याप्त” कभी मिलता ही नहीं। यह उपभोक्तावादी दृष्टि रिश्तों को भी उपभोग की वस्तु में बदल रही है—पसंद न आए तो बदल दो। लेकिन विवाह मोबाइल फ़ोन नहीं, जिसे हर साल अपग्रेड किया जाए; यह एक दीर्घकालिक सामाजिक अनुबंध है, जिसे निभाने की मानसिकता चाहिए।

आज शादी से ज़्यादा डर “फँस जाने” का है। यह डर बताता है कि हमने रिश्ते को सुरक्षा नहीं, बंधन के रूप में देखना शुरू कर दिया है। जबकि सच यह है कि रिश्ता बंधन नहीं, साझी ज़िम्मेदारी है—जहाँ दोनों को देना भी होता है और लेना भी। जहाँ बराबरी का अर्थ समानता नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान होता है।

समाधान क्या है..?

पहला—अपेक्षाओं की ईमानदार समीक्षा। क्या हम जो चाहते हैं, वह हम स्वयं देने में सक्षम हैं?

दूसरा—संवाद की बहाली। संवाद केवल बोलना नहीं, सुनना भी है। शादी से पहले ही नहीं, बाद में भी संवाद रिश्ते की रीढ़ है।

तीसरा—परिवार की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन। माता-पिता को “दखल” के खांचे से बाहर निकालकर “मार्गदर्शक” के रूप में स्वीकार करना होगा।

चौथा—स्थानीय जीवन के सम्मान की वापसी। पेरिस का सपना बुरा नहीं, लेकिन अपने शहर, अपने काम और अपनी मिट्टी से शर्मिंदा होना आत्मघाती है।

यह पीढ़ी प्रतिभाशाली है, शिक्षित है, संभावनाओं से भरी है। इसमें दुनिया बदलने की क्षमता है। पर यदि रिश्तों में साहस नहीं होगा—समझौता करने का साहस, टिके रहने का साहस, साथ सीखने का साहस—तो भविष्य अनिश्चित रहेगा। शादी कोई परीक्षा नहीं, जिसमें शत-प्रतिशत अंक चाहिए हों; यह एक यात्रा है, जिसमें गिरते-पड़ते, सीखते हुए आगे बढ़ना होता है।

आज सवाल सिर्फ़ बुज़ुर्ग नहीं पूछ रहे—वक़्त भी पूछ रहा है:-

क्या हम रिश्तों को शर्तों से आज़ाद कर पाएँगे..? क्या हम डर से बाहर निकलकर भरोसे की ओर लौटेंगे…? यदि उत्तर “हाँ” है, तो यह पीढ़ी भी बेहतर ज़िंदगी जी सकेगी। और यदि उत्तर “न” है—तो कुंवारापन केवल वैवाहिक स्थिति नहीं, एक स्थायी सामाजिक अवस्था बन जाएगा। रिश्ते,शर्तें और डर से घिरी एक पीढ़ी..!