
लखनऊ। भारतीय राजनीति में विचारधाराओं का टकराव नया नहीं है, लेकिन देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस में हाल के वर्षों में जो वैचारिक बदलाव आया है, वह न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि गंभीर सवाल भी खड़े करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी से राजनीतिक विरोध की आड़ में कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने विरोध की सभी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) हमेशा से उनके निशाने पर रहे हैं, लेकिन वर्तमान में यह मनमुटाव इस स्तर पर पहुंच चुका है, जहां व्यक्तिगत और दलीय विरोध अब देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाने लगा है।
राजनीतिक लाभ और वोट बैंक की इस अंधी दौड़ में राहुल गांधी को अब वे चेहरे सबसे अधिक भा रहे हैं, जिनकी पहचान केवल और केवल देश विरोधी और अराजक गतिविधियों से जुड़ी रही है। जेएनयू से निकले वामपंथी उग्रवाद के पैरोकार कन्हैया कुमार को पार्टी में मुख्यधारा का पद देना हो, या फिर शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे तत्वों के बयानों और हरकतों में राजनीति के अवसर तलाशना हो, कांग्रेस का यह नया चेहरा उसकी पुरानी राष्ट्रीय मुख्यधारा की छवि से बिल्कुल मेल नहीं खाता।
देश के संवेदनशील हिस्सों को भारत से अलग करने की बात करने वाले शरजील इमाम या दिल्ली दंगों की साजिश के आरोपों से घिरे उमर खालिद जैसे चेहरों के इर्द-गिर्द खड़े होकर जिस तरह का नैरेटिव तैयार करने की कोशिश की जा रही है, वह साफ तौर पर देश की संप्रभुता के खिलाफ खड़े होने जैसा है। इन तथाकथित युवा नेताओं के बयानों और उनकी रणनीतियों का यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो इसमें एक स्पष्ट विदेशी एजेंडा और वैश्विक भारत-विरोधी टूलकिट की गूंज सुनाई देती है। जब संसद, न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी भारत की सबसे मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अंतरराष्ट्रीय मंचों से सवाल उठाए जाते हैं, तो राहुल गांधी के सुर बिल्कुल उन्हीं विदेशी ताकतों और थिंक-टैंकों से मिलते हैं, जो भारत की बढ़ती वैश्विक साख को पचा नहीं पा रहे हैं।
भारत के भीतर असंतोष पैदा करने, युवाओं को भड़काने और विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास की खाई को गहरा करने के लिए जिस तरह वामपंथी विचारधारा का सहारा लिया जा रहा है, वह बेहद खतरनाक है। कन्हैया कुमार और शरजील इमाम जैसों का एजेंडा कभी भी लोकतांत्रिक सुधार नहीं रहा, बल्कि उनका उद्देश्य देश की आंतरिक स्थिरता को ध्वस्त करना रहा है। जब देश के टुकड़े करने के नारे लगाने वालों और विदेशी फंडिंग के सहारे भारत को बदनाम करने वाली ताकतों के साथ कांग्रेस पार्टी खड़ी दिखाई देती है, तो यह साफ हो जाता है कि सत्ता की छटपटाहट में राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता को भी दांव पर लगा दिया गया है।
कांग्रेस के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं ने समय-समय पर राहुल गांधी की इसी आत्मघाती सोच के कारण पार्टी से किनारा कर लिया, क्योंकि वे अपनी आंखों के सामने उस दल का पतन नहीं देख सकते थे, जिसने कभी आजादी के आंदोलन का नेतृत्व किया था। आज कांग्रेस के मंचों पर देश के दिग्गज कांग्रेसी नेताओं की जगह वामपंथी और चरमपंथी विचारधारा के लोग घेरा बनाए रहते हैं, जो राहुल और प्रियंका की हर सही-गलत बात में हां में हां मिलाने का काम करते हैं। यह स्थिति इस गंभीर सवाल को जन्म देती है कि क्या राहुल गांधी जानबूझकर कांग्रेस का वामपंथीकरण कर रहे हैं? इसका उत्तर कांग्रेस की मौजूदा कार्यशैली और उनके सलाहकारों की पृष्ठभूमि में साफ देखा जा सकता है। कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी मध्यमार्गी और सर्वसमावेशी राजनीति को छोड़कर घोर वामपंथी और विभाजनकारी एजेंडे की तरफ बढ़ चुकी है।
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पार्टी के पुराने और कद्दावर नेताओं को दरकिनार कर जेएनयू और वामपंथी थिंक-टैंक से आए लोगों को नीति-निर्धारक बना दिया गया है। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे असंसदीय और निम्न स्तर के बयानों को बढ़ावा देना और देश की जनता द्वारा चुनी गई सरकार को हर स्तर पर अवैध ठहराने की कोशिश करना इसी वामपंथी सोच का हिस्सा है, जो अराजकता में ही अपना भविष्य देखती है। हालात यह हैं कि कांग्रेस पार्टी में आमतौर पर पूरा ध्यान और लाइमलाइट गांधी परिवार या पार्टी के बहुत वरिष्ठ नेताओं तक ही सीमित रहता है। लेकिन अक्टूबर 2026 में इंडिया गठबंधन की एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक बेहद चौंकाने वाला दृश्य देखा गया। राहुल गांधी ने वरिष्ठ विपक्षी नेताओं की कतार को बीच में ही रोककर, पीछे खड़ीं नेहा बोरा को खुद आगे बुलाया और उनके हाथ में माइक थमा दिया।
यह राजनीतिक रूप से एक बहुत बड़ा संकेत था, जिसने स्थापित किया कि राहुल गांधी वामपंथी छात्र चेहरों को अपने मंच पर कितनी बड़ी प्राथमिकता दे रहे हैं। नेहा बोरा को कांग्रेस आलाकमान द्वारा दिए जा रहे इस अभूतपूर्व महत्व से खुद कांग्रेस के भीतर और उसकी अपनी छात्र शाखा नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया यानी एनएसयूआई के कैडर्स में भारी आंतरिक असंतोष और असहजता है। राहुल गांधी की इस राजनीति ने कांग्रेस को एक ऐसी दिशा में धकेल दिया है, जहां उसे राष्ट्रहित से बड़ा अपना संकुचित वोट बैंक नजर आता है।
विदेशी जमीन पर जाकर भारत के लोकतंत्र को मृत घोषित करना और विदेशी शक्तियों से हस्तक्षेप की गुहार लगाना इसी वैचारिक गुलामी का प्रमाण है। कांग्रेस का यह पूरी तरह से बदला हुआ वामपंथी स्वरूप न केवल पार्टी के ऐतिहासिक अस्तित्व को मिटा रहा है, बल्कि देश विरोधी तत्वों को मुख्यधारा की राजनीति में लाकर भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा भी पैदा कर रहा है। राहुल की अविश्वास वाली राजनीति के चलते पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस पार्टी के कई कद्दावर, युवा और दशकों पुराने निष्ठावान नेताओं ने आलाकमान की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए इस्तीफा दे दिया। इसमें गुलाम नबी आजाद जैसे मुस्लिम चेहरे भी शामिल हैं।



