Saturday, April 18, 2026
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जब थालियाँ भरकर फेंकी जाती हैं और पेट खाली सोते हैं

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जब थालियाँ भरकर फेंकी जाती हैं और पेट खाली सोते हैं
जब थालियाँ भरकर फेंकी जाती हैं और पेट खाली सोते हैं
डॉ.सत्यवान सौरभ
डॉ.सत्यवान सौरभ

विश्व एक ऐसे विरोधाभास के बीच खड़ा है, जहां एक ओर भारी मात्रा में खाद्य पदार्थ बर्बाद हो रहे हैं और दूसरी ओर करोड़ों लोग भूख से जूझ रहे हैं। यह केवल विडंबना नहीं, बल्कि हमारी वर्तमान खाद्य व्यवस्था की गहरी खामियों का संकेत है। एक ओर उत्पादन में निरंतर वृद्धि हो रही है, तो दूसरी ओर वितरण, भंडारण और उपभोग के स्तर पर इतनी बड़ी असमानता है कि भोजन जरूरतमंद तक पहुँच ही नहीं पाता। यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर खाद्य अपशिष्ट और भूख साथ-साथ मौजूद हैं।

भारत की स्थिति इस वैश्विक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है। देश में पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न उत्पादन होने के बावजूद भूख और कुपोषण की समस्या बनी हुई है। हाल के वर्षों में कुछ सुधार अवश्य दर्ज किया गया है, लेकिन यह सुधार इतना सीमित है कि इसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। बड़ी संख्या में लोग आज भी पर्याप्त पोषण से वंचित हैं और बच्चों में कुपोषण के आंकड़े चिंता पैदा करते हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि समस्या उत्पादन की कमी नहीं, बल्कि संसाधनों के प्रबंधन और वितरण की अक्षमता है।

खाद्य अपशिष्ट की समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय भी है। जब भोजन बर्बाद होता है, तो उसमें प्रयुक्त जल, ऊर्जा और श्रम भी व्यर्थ चला जाता है। साथ ही, सड़े-गले खाद्य पदार्थों से निकलने वाली गैसें पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं। इस प्रकार खाद्य अपशिष्ट जलवायु परिवर्तन को भी बढ़ावा देता है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जिसमें संसाधनों की बर्बादी और पर्यावरणीय क्षति दोनों शामिल हैं।

इस समस्या की जड़ें उत्पादन से लेकर उपभोग तक फैली हुई हैं। कृषि स्तर पर ही बड़ी मात्रा में फसलें नष्ट हो जाती हैं। इसका कारण अक्सर उचित भंडारण सुविधाओं का अभाव, परिवहन में देरी, और प्राकृतिक आपदाएँ होती हैं। विशेष रूप से फल और सब्जियाँ, जो जल्दी खराब हो जाती हैं, सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। किसानों के पास पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज सुविधाएँ नहीं होतीं, जिसके कारण उन्हें या तो जल्दी बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है या फिर उनकी उपज खराब हो जाती है। इससे न केवल किसानों को आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि खाद्य आपूर्ति भी प्रभावित होती है।

आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियाँ इस समस्या को और गंभीर बना देती हैं। उत्पादन और उपभोग के बीच कई चरण होते हैं, जिनमें हर स्तर पर हानि की संभावना रहती है। परिवहन, भंडारण और वितरण की अपर्याप्त व्यवस्था के कारण बड़ी मात्रा में खाद्यान्न बाजार तक पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाता है। कई बार बाजारों में अधिक आपूर्ति होने के कारण भी खाद्य पदार्थ फेंक दिए जाते हैं, क्योंकि उन्हें संग्रहित करने या दूसरे स्थान पर भेजने की उचित व्यवस्था नहीं होती।

उपभोक्ता स्तर पर भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। घरों, होटलों और आयोजनों में भोजन की बर्बादी आम बात है। लोग अक्सर आवश्यकता से अधिक भोजन खरीदते हैं और फिर उसका पूरा उपयोग नहीं कर पाते। समाप्ति तिथि को लेकर अत्यधिक सतर्कता भी कई बार अनावश्यक बर्बादी का कारण बनती है। विवाह और अन्य सामाजिक आयोजनों में तो यह समस्या और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, जहाँ प्रतिष्ठा के नाम पर आवश्यकता से कहीं अधिक भोजन तैयार किया जाता है, जिसका बड़ा हिस्सा अंततः कूड़े में चला जाता है।

इस पूरे परिदृश्य में नीतिगत और संस्थागत कमियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अधिकांश सरकारी नीतियाँ उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित हैं, जबकि अपशिष्ट प्रबंधन पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। कोल्ड चेन और भंडारण अवसंरचना में निवेश पर्याप्त नहीं है, और जो योजनाएँ हैं, उनका प्रभाव भी सीमित है। इसके अलावा, खाद्य अपशिष्ट को कम करने के लिए कोई सख्त नियम या दंडात्मक प्रावधान भी व्यापक रूप से लागू नहीं किए गए हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि समस्या को समग्र दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।

यदि इस चुनौती का समाधान करना है, तो एक व्यापक और समन्वित प्रयास की आवश्यकता होगी। सबसे पहले, अवसंरचना के स्तर पर सुधार अनिवार्य है। कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक भंडारण सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि नाशवान वस्तुओं को सुरक्षित रखा जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष ध्यान देना आवश्यक है, जहाँ इस प्रकार की सुविधाओं की सबसे अधिक कमी है। इसके साथ ही, परिवहन और लॉजिस्टिक्स प्रणाली को भी सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए, ताकि खाद्य पदार्थ समय पर और सुरक्षित तरीके से बाजार तक पहुँच सकें।

तकनीक का उपयोग भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और डेटा आधारित प्रणाली के माध्यम से मांग और आपूर्ति का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है, जिससे अनावश्यक उत्पादन और बर्बादी को रोका जा सके। इसके अलावा, खाद्य अपशिष्ट को ऊर्जा या खाद में बदलने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जा सके।

नीतिगत सुधार भी अत्यंत आवश्यक हैं। सरकार को ऐसे कानून और नीतियाँ बनानी चाहिए, जो खाद्य अपशिष्ट को कम करने के लिए प्रोत्साहित करें और अनावश्यक बर्बादी पर नियंत्रण लगाएँ। होटलों, रेस्तरां और बड़े आयोजनों में बचा हुआ भोजन जरूरतमंदों तक पहुँचाने के लिए अनिवार्य प्रावधान किए जा सकते हैं। इसके साथ ही, किसानों को उनकी उपज के नुकसान के लिए सुरक्षा प्रदान करना भी आवश्यक है, ताकि वे आर्थिक रूप से सुरक्षित रह सकें।

सामुदायिक और शैक्षिक पहल भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लोगों में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि वे भोजन के महत्व को समझें और उसकी बर्बादी से बचें। स्कूलों और कॉलेजों में इस विषय को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है, जिससे नई पीढ़ी अधिक जिम्मेदार बने। इसके अलावा, सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से अतिरिक्त भोजन को जरूरतमंदों तक पहुँचाने की पहल को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

अंततः, इस समस्या का समाधान केवल एक पक्ष के प्रयास से संभव नहीं है। इसके लिए सरकार, निजी क्षेत्र, किसानों और आम नागरिकों के बीच सहयोग आवश्यक है। एक समग्र और सर्कुलर दृष्टिकोण अपनाकर ही हम खाद्य अपशिष्ट को कम कर सकते हैं और भूख की समस्या का समाधान कर सकते हैं। यह स्पष्ट है कि खाद्य अपशिष्ट केवल संसाधनों की बर्बादी नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्थागत विफलता है, जो हमारी प्राथमिकताओं और नीतियों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। यदि हम इस चुनौती को गंभीरता से लें और समन्वित प्रयास करें, तो न केवल भूख को कम किया जा सकता है, बल्कि एक अधिक न्यायसंगत और सतत समाज की दिशा में भी कदम बढ़ाया जा सकता है।