Monday, April 13, 2026
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सुरों की अमर सरगम:आशा भोसले का अविस्मरणीय सफर

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सुरों की अमर सरगम:आशा भोसले का अविस्मरणीय सफर
सुरों की अमर सरगम:आशा भोसले का अविस्मरणीय सफर
सुनील कुमार महला
सुनील कुमार महला

भारतीय संगीत जगत में जब भी सुरों की मिठास, विविधता और जादू का ज़िक्र होता है, तो Asha Bhosle का नाम सबसे पहले सामने आता है। अपनी अनोखी आवाज़ और बहुमुखी प्रतिभा के दम पर उन्होंने दशकों तक संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज किया है। क्लासिकल, ग़ज़ल, पॉप, कैबरे या फिल्मी गीत—हर शैली में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। संघर्ष भरे शुरुआती दौर से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक का उनका सफर न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जुनून और मेहनत से कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। Asha Bhosle की आवाज़ आज भी उतनी ही ताज़गी और आकर्षण लिए हुए है, जितनी उनके करियर की शुरुआत में थी—यही कारण है कि उनका यह सफर सचमुच अविस्मरणीय, अनूठा और हमेशा यादगार बना हुआ है।

मशहूर पार्श्व गायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल 2026 को 92 वर्ष की आयु में ‘कार्डियक अरेस्ट’ के कारण मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में निधन हो गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार चेस्ट इंफेक्शन और अत्यधिक थकान के कारण उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। उनके निधन के साथ ही हिंदी सिनेमा का एक स्वर्णिम और सुरम्य अध्याय समाप्त हो गया। उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर, जिन्हें ‘भारत कोकिला/स्वर कोकिला’ कहा जाता है, का निधन 6 फरवरी 2022 को रविवार के दिन, 92 वर्ष की आयु में इसी अस्पताल में हुआ था। एक मार्मिक संयोग यह भी रहा कि ठीक लगभग चार वर्ष बाद, 22 अप्रैल 2026 को रविवार के दिन ही आशा भोसले ने भी 92वें वर्ष में उसी अस्पताल में अंतिम सांस ली।

8 सितम्बर 1933 को सांगली(महाराष्ट्र) में जन्मी आशा जी, महान शास्त्रीय गायक दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री और लता मंगेशकर की छोटी बहन थीं। उनके परिवार में उषा मंगेशकर, मीना खाडिकर और हृदयनाथ मंगेशकर जैसे प्रतिभाशाली सदस्य भी संगीत साधना से जुड़े रहे। पिता के असमय निधन के बाद उन्होंने बहुत कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारियां संभालीं और परिस्थितियोंवश गायन को अपनाया-इसी कारण वे स्वयं को ‘एक्सीडेंटल सिंगर’ भी कहा करती थीं।

बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि अपने विलक्षण और दीर्घ करियर में आशा भोसले ने 20 से अधिक भाषाओं में लगभग 12,000 से भी अधिक गीत गाए और 1000 से अधिक फिल्मों में अपनी आवाज़ दी और इस अद्वितीय,अनूठी व शानदार उपलब्धि के लिए वर्ष 2011 में उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। शास्त्रीय संगीत की सुदृढ़ नींव पर आधारित उनकी गायकी ने ग़ज़ल, भजन, पॉप, कैबरे और पश्चिमी संगीत तक हर विधा में अपना जादू बिखेरा। उनकी ‘वॉइस मॉड्यूलेशन’ की अद्भुत क्षमता-भाव, लय और शब्द के अनुरूप आवाज़ को ढाल लेने की कला-उन्हें अपने समय की सबसे बहुमुखी और प्रयोगशील गायिकाओं में स्थापित करती है। उनके निजी जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। उनका पहला विवाह गणपत राव भोसले से हुआ, जो सफल नहीं रहा।

बाद में उन्होंने 1980 में प्रसिद्ध संगीतकार आर. डी. बर्मन (पंचम दा) से विवाह किया। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि पंचम दा उनसे लगभग छह वर्ष छोटे थे। वे पहली बार आशा जी से ऑटोग्राफ लेने आए थे और बाद में विवाह का प्रस्ताव रखा। प्रारंभ में आशा जी ने इसे अस्वीकार किया, किंतु अंततः यह संबंध जीवन और संगीत-दोनों में अमर सिद्ध हुआ। इस जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को अनेक कालजयी गीत दिए। इसके अतिरिक्त, संगीतकार ओ. पी. नैयर के साथ उनकी जोड़ी भी अत्यंत लोकप्रिय रही; नैयर साहब उनकी आवाज़ की ‘अदा’ और ‘नमक’ के इतने प्रशंसक थे कि उन्होंने कभी लता मंगेशकर से गीत नहीं गवाए।

उल्लेखनीय है कि आशा भोसले को फिल्म उमराव जान (1981) की ग़ज़लों के लिए अपना पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ, जिससे यह सिद्ध हो गया कि वे केवल चंचल या कैबरे गीतों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि गंभीर और शास्त्रीय विधाओं में भी उतनी ही समर्थ थीं। इतना ही नहीं, वर्ष 2000 में उन्हें प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और वर्ष 2008 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उन्होंने एस. डी. बर्मन, ए. आर. रहमान और किशोर कुमार जैसे महान कलाकारों के साथ अनगिनत लोकप्रिय गीत दिए। 62 वर्ष की आयु में फिल्म रंगीला के ‘तन्हा तन्हा’ और ‘रंगीला रे’ जैसे गीतों ने यह सिद्ध कर दिया कि उनकी आवाज़ में युवाओं जैसी ऊर्जा आजीवन बनी रही। ‘आओ हुजूर तुमको’ (फिल्म किस्मत) जैसे गीतों में उनका सहज, बिना रिहर्सल का भाव-संयोजन आज भी मिसाल माना जाता है।

हाल फिलहाल,यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि गायन के अतिरिक्त उन्होंने अभिनय(एक्टिंग) में भी रुचि दिखाई और 2013 में फिल्म माई से मुख्य अभिनेत्री के रूप में पदार्पण किया। वे उत्कृष्ट पाक-शैली की शौकीन थीं; उनका कहना था कि यदि वे गायिका न होतीं, तो एक बेहतरीन कुक बनतीं। कहते हैं कि उनके हाथ का ‘कढ़ाई गोश्त’ और ‘मछली’ किशोर कुमार और आर. डी. बर्मन जैसे दिग्गजों के बीच बेहद लोकप्रिय था। उनके नाम से ‘आशा’ज’ रेस्टोरेंट श्रृंखला दुबई, कुवैत, बहरीन और यूनाइटेड किंगडम में प्रसिद्ध रही, जो उनकी व्यावसायिक समझ का भी प्रमाण है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ब्रेट ली के साथ उन्होंने-‘यू आर द वन फोर मी’ गीत गाया। वर्ष 2005 में-‘ यू हैव स्टोलन माई हर्ट’ एल्बम क्रोनोस क्वार्टेट के साथ रिकॉर्ड किया, जो ग्रैमी पुरस्कारों के लिए नामांकित हुआ।

यहां यह उल्लेखनीय है कि वे ग्रैमी के लिए नामांकित होने वाली अग्रणी भारतीय गायिकाओं में शामिल रहीं। उन्होंने अंग्रेज़ी, रूसी, मलय और चेक जैसी विदेशी भाषाओं में भी गीत गाए, जिनमें उनका उच्चारण अत्यंत सटीक था। साथ ही, वे मिमिक्री कला में भी निपुण थीं। उनका व्यक्तिगत जीवन भी गहरे दुखों से गुज़रा। वर्ष 2012 में उनकी बेटी वर्षा और 2015 में पुत्र हेमंत का निधन हुआ, जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने चेहरे की मुस्कान और संगीत के प्रति समर्पण को कम नहीं होने दिया। 80 वर्ष की आयु के बाद भी वे मंच पर सक्रिय रहीं, जो उनके अदम्य उत्साह और जीवटता का प्रमाण है। उनका सिग्नेचर लुक-सफेद साड़ी और मोतियों का हार-उनकी सादगी, गरिमा और विशिष्ट पहचान का प्रतीक बन गया।

निस्संदेह, आशा भोसले का जीवन केवल एक महान गायिका की जीवनी नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस, प्रयोगधर्मिता और आत्मविश्वास की प्रेरक गाथा है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि वे किसी की परछाईं नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान गढ़ने वाली अद्वितीय कलाकार थीं। ‘पिया तू अब तो आजा’ जैसे चंचल गीतों से लेकर शास्त्रीय ग़ज़लों तक, उनकी आवाज़ ने हर भाव को अमर बना दिया। उनकी सुरमयी विरासत सदैव संगीत प्रेमियों के हृदय में गूंजती रहेगी और आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित व प्रोत्साहित करती रहेगी।