
दोहपर करीब डेढ़ बजे हम विधान सभा पहुंचे तो पत्रकारों की एक पांत चूड़ा-दही और खिचड़ी खाकर उठने की तैयारी में थी। विधान सभा भवन के आंगन में दो पंक्तियों में 24 टेबुल लगे हुए थे और हर टेबुल के साथ चार कुर्सियां लगी हुई थीं। कुछ टेबुल को छोड़ कर लगभग सभी टेबुलों के साथ लगी हुई कुर्सियां भरी हुई थीं।
मेरे सामने इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।एक पांत उठी और हाथ धोकर प्रस्थान करने लगी। हम जब बैठे तो अकेला व्यक्ति। थोड़ी देर बैठने के बाद विधान सभा के एक अधिकारी ने कैंटिन में चलने का आग्रह किया। कैंटिन में कुछ और पत्रकार बैठे थे। थोड़ी देर में कैंटिन में कई और पत्रकार जुट गये।
विधान सभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा ने 9 जनवरी को पत्रकारों के लिए सम्मान समारोह के साथ ‘सकराती भोज’ का भी आयोजन किया था। संक्रांत के मौके पर विभिन्न पार्टियों की ओर से पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए भोज का इंतजाम किया जाता रहा है।
इस बार का विधान सभा चुनाव परिणाम ‘विधवा सुहागन’ की तरह है। न जीत की खुशी, न हार का गम। जीतने वाला हार का दर्द झेल रहा है और हारने वाला जीत का जश्न मना रहा है। इसलिए पार्टियों की ओर से संक्रांत के मौके पर होने वाले भोज की कोई सुगबुगाहट कहीं नहीं है।
भोज पर राजनीतिक माहौल शांत था कि शुक्रवार को पत्रकारों को विधान सभा की ओर से फोन आने लगा। बताया गया कि विधान सभा अध्यक्ष की ओर से पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इस मौके पर दही-चूड़ा और खिचड़ी भोज का आयोजन किया जायेगा। समय दोहपर एक बजे निर्धारित था। हम करीब डेढ़ बजे पहुंचे। पत्रकारों की पांत उठ रही थी।
उधर, कैंटिन में हमारी थाली में चूड़ा के साथ दही, भूरा, तिलकूट, सब्जी सज चुकी थी। इसके बाद खिचड़ी के साथ दही का दौर भी चला। बिहार विधान सभा के पहले भाजपाई अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा ने पत्रकारों को भोज पर आमंत्रित किया था। गोवार की थाली में भूमिहार का दही। दही दियारे का होता तो टेस्ट और बढ़ जाता।
स्पीकर भूमिहार और कैंटिन वाले विभाग के मंत्री जीवेश मिश्रा भी भूमिहार। संसदीय कार्य मंत्री विजय चौधरी भी भूमिहार। ‘भूमिहारी’ का यह संयोग कभी-कभी ही मिलता है।पत्रकारों के लिए भोज की चर्चा आयी तो सुशील मोदी का ‘मीडिया भोज’ खासा चर्चित रहा है। वे कई वर्षों से लगातार मीडिया के लिए सकराती भोज का आयोजन करते रहे हैं।
इनको देख कर कई अन्य नेताओं ने भी सत्ता की उम्मीद में मीडिया भोज आयोजित किया, लेकिन नाउम्मीदी के बाद बंद हो गया। स्पीकर विजय सिन्हा मीडिया भोज के ‘प्रणेता’ सुशील मोदी का विकल्प बन रहे हैं या नयी परंपरा शुरू रहे हैं, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।
























