

लखनऊ। राजस्थान की राजनीति इन दिनों एक ऐसे प्रस्तावित कानून के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसने सत्ता, विपक्ष, समाज और प्रशासन सभी को आमने-सामने ला खड़ा किया है। राज्य सरकार द्वारा पेश किया गया डिस्टर्ब्ड एरिया बिल 2026 सिर्फ एक विधायी पहल नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सामाजिक ताने-बाने, संपत्ति के अधिकार और राज्य की कानून-व्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार का दावा है कि यह कानून सांप्रदायिक तनाव, जबरन पलायन और जनसंख्या असंतुलन जैसी समस्याओं से निपटने के लिए जरूरी है, जबकि विरोधियों को इसमें भय, दुरुपयोग और राजनीतिक मंशा की आशंका दिख रही है।
राज्य में पिछले कुछ वर्षों से ऐसे इलाकों की चर्चा होती रही है, जहां सामुदायिक तनाव के बाद एक वर्ग के लोगों को अपने घर, दुकान या जमीन औने-पौने दामों पर बेचकर इलाका छोड़ना पड़ा। सरकार का कहना है कि दबाव, धमकी या सामाजिक असुरक्षा के माहौल में होने वाले ऐसे सौदे न सिर्फ पीड़ित परिवारों को कमजोर करते हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र में असंतुलन पैदा कर देते हैं। प्रस्तावित कानून इसी प्रक्रिया पर लगाम कसने की बात करता है। इसके तहत राज्य सरकार को अधिकार होगा कि वह किसी भी इलाके को सीमित अवधि के लिए अशांत क्षेत्र घोषित कर सके और वहां संपत्ति के लेन-देन को सख्त नियमों से बांध सके।
सरकार की मंशा यह बताई जा रही है कि अशांत घोषित इलाके में कोई भी अचल संपत्ति बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के खरीदी या बेची नहीं जा सकेगी। यह अनुमति तभी मिलेगी जब यह साबित हो कि सौदा पूरी सहमति से, बाजार मूल्य पर और बिना किसी दबाव के हो रहा है। साथ ही किरायेदारों को बेदखली से सुरक्षा देने की भी बात कही गई है। सरकार का तर्क है कि इससे उन परिवारों को राहत मिलेगी, जो वर्षों से किसी इलाके में रहते आए हैं लेकिन अचानक बदले हालात के कारण खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।
बिल में जिस अवधारणा पर सबसे ज्यादा बहस हो रही है, वह है अनुचित जमावड़ा। कानून के मसौदे के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में किसी एक समुदाय का ऐसा संकेंद्रण होता है, जो दबाव, मजबूरी या गलत मंशा के कारण हुआ हो और जिससे सामाजिक सौहार्द या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो, तो उस क्षेत्र को अशांत घोषित किया जा सकता है। सरकार का कहना है कि यह प्रावधान भविष्य की आशंकाओं को देखते हुए रखा गया है, ताकि हालात बिगड़ने से पहले ही हस्तक्षेप किया जा सके।
राजस्थान की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी सरकार इसे एक एहतियाती कदम बता रही है। उसका तर्क है कि कई इलाकों में जनसंख्या के असंतुलन ने सांप्रदायिक तनाव को जन्म दिया है और मौजूदा कानून ऐसे मामलों से निपटने में नाकाफी साबित हुए हैं। कानून मंत्री जोगाराम पटेल पहले ही यह कह चुके हैं कि कुछ क्षेत्रों में हिंसा और दंगे की घटनाओं के बाद पुराने बाशिंदों को मजबूरी में अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी। सरकार का मानना है कि यदि इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
विपक्षी कांग्रेस इस बिल को सत्ता का दुरुपयोग बताकर विरोध कर रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है कि यह कानून डर का माहौल पैदा करेगा और प्रशासन को मनमानी का हथियार दे देगा। उनका आरोप है कि सरकार विकास और रोजगार जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे कानून ला रही है, जिनसे समाज में अविश्वास बढ़ेगा। विपक्ष का यह भी कहना है कि किसी इलाके को अशांत घोषित करने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी और इसका इस्तेमाल राजनीतिक या सामुदायिक आधार पर किया जा सकता है।
राज्य सरकार इस आलोचना को खारिज करते हुए कहती है कि कानून में स्पष्ट समय-सीमा तय की गई है। किसी भी क्षेत्र को अधिकतम तीन साल या अधिसूचना में तय अवधि तक ही अशांत रखा जा सकेगा। इसके अलावा शिकायत मिलने पर एक विशेष जांच दल का गठन अनिवार्य होगा, जिसमें प्रशासन, पुलिस और स्थानीय निकाय के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे। सरकार का दावा है कि इससे एकतरफा फैसलों की गुंजाइश कम होगी।इस तरह के कानूनों का इतिहास देखा जाए तो यह प्रयोग नया नहीं है। देश में सबसे पहले 1983 में पंजाब में अशांत क्षेत्र से जुड़ा कानून बना था, जब वहां उग्रवाद अपने चरम पर था।
इसके बाद 1991 से गुजरात में भी ऐसा कानून लागू किया गया, जिसे समय-समय पर संशोधित किया गया। हाल के वर्षों में असम सरकार ने भी अलग-अलग समुदायों के बीच जमीन की खरीद-बिक्री को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए थे। हालांकि 2016 में केंद्र सरकार ने यह कहते हुए पंजाब को इस श्रेणी से बाहर कर दिया था कि वहां हालात सामान्य हो चुके हैं। उस समय केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने स्पष्ट किया था कि पंजाब अब अशांत क्षेत्र नहीं है और वहां सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम जैसी व्यवस्थाओं की जरूरत नहीं रही।
राजस्थान के संदर्भ में सरकार कुछ खास इलाकों का उदाहरण देती है, जहां वर्षों से रहने वाले परिवारों के पलायन की बातें सामने आई हैं। जयपुर से कुछ दूरी पर स्थित कल्याणी मालपुरा और आसपास के इलाकों के किस्से अक्सर चर्चा में रहते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अचानक बदले सामाजिक समीकरणों के कारण डर का माहौल बना और कई परिवारों ने सुरक्षित भविष्य के लिए इलाका छोड़ना बेहतर समझा। सरकार इसी तरह की परिस्थितियों को रोकने के लिए कानून को जरूरी बता रही है।
कानून के सख्त प्रावधान भी बहस का कारण हैं। यदि कोई व्यक्ति अशांत क्षेत्र में नियमों के खिलाफ संपत्ति का लेन-देन करता है, तो उसे तीन से पांच साल तक की जेल और भारी जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। सभी अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती रखने का प्रस्ताव है। सरकार का कहना है कि बिना कड़ी सजा के ऐसे मामलों में रोक लगाना मुश्किल है, जबकि आलोचकों को डर है कि इससे आम नागरिकों को परेशान किया जा सकता है।
कानून का एक संवेदनशील पहलू यह भी है कि इसके दायरे में पुराने सौदे भी आ सकते हैं। यदि किसी संपत्ति का हस्तांतरण अमान्य घोषित होता है, तो विक्रेता को खरीदार को तय समय के भीतर पूरी रकम लौटानी होगी। समर्थकों का कहना है कि यह प्रावधान उन लोगों को न्याय देगा, जो दबाव में आकर अपनी संपत्ति बेचने को मजबूर हुए। विरोधियों को आशंका है कि इससे वर्षों पुराने विवाद फिर से खुल सकते हैं। राजस्थान में यह बहस अब सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं रही।
वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रशासनिक विशेषज्ञ भी इसे अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। कुछ का मानना है कि यदि समस्या गंभीर है और मौजूदा कानून नाकाम हो रहे हैं, तो सख्त कदम जरूरी हो सकते हैं। वहीं यह भी चेतावनी दी जा रही है कि किसी भी नए कानून का दुरुपयोग न हो, वरना उसका असर समाज में अविश्वास और टकराव के रूप में सामने आ सकता है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह बिल कानून बनकर किस दिशा में जाता है और राजस्थान के सामाजिक परिदृश्य को किस तरह प्रभावित करता है।






















