Wednesday, January 21, 2026
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शिवराज सरकार सर्वोच्च न्यायालय में अपने पारित संकल्प को पूरा क्यों नहीं कर सकी….?

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चौ0 लौटनराम निषाद

मध्य प्रदेश राज्य पंचायत व नगरीय निकाय चुनाव को लेकर शीर्ष अदालत द्वारा 10 मई को पारित आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मोहन भागवत के एजेंडे को लागू किया है।10 मई 2022 मध्य प्रदेश पंचायत वी नगरीय निकाय में ओबीसी को 27 प्रतिशत कोटा देने पर रोक का अंतरिम निर्णय दिए जाने पर भारतीय ओबीसी महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ. लौटनराम निषाद ने पूरी तरह पिछड़ा वर्ग विरोधी करार दिया है। देश की शीर्ष अदालत द्वारा पारित उस आदेश के जिसमें बिना आरक्षण के प्रदेश में पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव हेतु 15 दिनों में अधिसूचना जारी किये जाने की बात कही है, को लेकर शिवराज सरकार पर तीखा हमला किया है। उन्होंने कहा कि मप्र विधानसभा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब इस बात की घोषणा की थी कि यह चुनाव बिना आरक्षण के नहीं होंगे, सरकार न्यायालय में मजबूती से अपना पक्ष रखेगी, तब क्या कारण है कि शीर्ष अदालत में सरकार अपने उस संकल्प को पूरा क्यों नहीं कर सकी ?


निषाद ने कहा कि अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि शिवराज सिंह चौहान सरकार और स्वयं मुख्यमंत्री जो अन्य पिछड़ा वर्ग(किरार) से ताल्लुक रखते हैं, वे इस वर्ग के न केवल घोर विरोधी हैं, बल्कि यह उन्होंने साबित भी कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि ओबीसी वर्ग की सच्ची हितैषी तो कांग्रेस पार्टी है, जिसके पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने इस वर्ग के उत्थान के लिए रामजी महाजन आयोग गठित किया था, दिग्विजयसिंह ने 14 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की जिसे बढ़ाकर कमलनाथ सरकार ने 27 प्रतिशत किया। इसके ठीक विपरीत भाजपा शासित राज्य के तीन मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती(लोधी), स्वर्गीय बाबूलाल गौर(अहीर) और शिवराजसिंह चौहान(किरार) जो स्वयं इसी वर्ग से संबंधित हैं, ने ओबीसी की बड़ी आबादी के साथ न केवल छल और अन्याय किया है, बल्कि संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के उस गुप्त एजेंडे को भी षड्यंत्रपूर्वक लागू करवा दिया है, जिसमें विगत वर्षों उन्होंने आरक्षण समाप्ति की बात कहीं थी।

लौटनराम निषाद ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से पूछना चाहा है कि यदि उक्त आरोप गलत है तो वे बतायें कि अन्य पिछड़ा वर्ग को लेकर उनकी सरकार की घोर लापरवाही का कारण क्या है, जिसकी वजह से राज्य के एक बड़े तबके को अपने वाजिब अधिकारों से षड्यंत्र के माध्यम से जानबूझकर वंचित होना ओबीसी,15.6 प्रतिशत एससी, 20.1प्रतिशत एसटी व 4.21 प्रतिशत सवर्ण जातियां हैं। एससी को 15 प्रतिशत, एसटी को 20 प्रतिशत समानुपातिक आरक्षण कोटा है और 4.21 प्रतिशत सवर्ण जातियों को शीर्ष अदालत के निर्णय के विरुद्ध वी संविधान की व्यवस्था से परे जाते हुए ईडब्ल्यूएस का आरक्षण कोटा सभी स्तरों पर लागू कर दिया गया। मध्य प्रदेश में 50.09 प्रतिशत आबादी वाले पिछड़े वर्ग को 14 प्रतिशत आरक्षण संविधान वी नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है। सवर्ण जातियों को 8 लाख की वार्षिक आय पर गरीब वी आर्थिक रूप से कमजोर मानते हुए ईडब्ल्यूएस के नाम से 48 घंटे के अंदर 10 प्रतिशत कोटा दे दिया गया। जबकि संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है।इस मामले में न्यायालय भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया।जबकि ओबीसी के मामले में हमेशा न्यायालय का हथौड़ा चल जाता है।विगत कुछ वर्षों से न्यायालय के जो निर्णय आ रहे हैं,उससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक हो जा रहा है। [/Responsivevoice]