भारत में पानी की प्यास अब सिर्फ नदियों, तालाबों और बारिश पर निर्भर प्राकृतिक संकट की कहानी नहीं रह गई है। यह एक ऐसी सच्चाई बन चुकी है, जहां सार्वजनिक जल आपूर्ति व्यवस्था की कमजोरियां लोगों को बोतलबंद पानी पर निर्भर होने के लिए मजबूर कर रही हैं। शहरों से लेकर कस्बों तक, साफ और सुरक्षित पेयजल का अधिकार धीरे-धीरे एक उत्पाद में बदलता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या यह केवल संसाधनों की कमी है, या फिर नीतिगत विफलताओं और प्रशासनिक उदासीनता का परिणाम? भारत की बढ़ती ‘बोतलबंद संस्कृति’ दरअसल हमारे जल प्रशासन की गहरी चुनौतियों की ओर इशारा करती है।बोतलबंद पानी का भारत: सार्वजनिक जल प्रशासन की गहरी विफलता। भारत में पानी की प्यास केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि नीतिगत भी है।जल संकट की जड़ में शासन की विफलता या संसाधनों का दुरुपयोग?
भारत में बोतलबंद पानी पर बढ़ती निर्भरता केवल उपभोक्ता व्यवहार में आए बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक जल प्रशासन में व्याप्त गहरी और बहुस्तरीय प्रणालीगत समस्याओं की ओर भी स्पष्ट संकेत करती है। कभी जो नल का पानी नागरिकों के लिए बुनियादी अधिकार और राज्य की जिम्मेदारी माना जाता था, वही आज अविश्वास, असुरक्षा और असमानता का प्रतीक बनता जा रहा है। शहरों से लेकर कस्बों और यहां तक कि ग्रामीण इलाकों में भी लोग पीने के लिए प्लास्टिक की बोतलों पर निर्भर होते जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक बोझ बढ़ाती है, बल्कि पर्यावरण, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक शासन की अवधारणा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
आधुनिक भारत में जल संकट को अक्सर वर्षा की कमी, जलवायु परिवर्तन या बढ़ती जनसंख्या से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि ये सभी कारक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बोतलबंद पानी की लोकप्रियता का मूल कारण इनसे कहीं अधिक गहरा है। असल समस्या यह है कि नागरिकों का भरोसा सार्वजनिक जल आपूर्ति प्रणालियों से लगातार टूटता जा रहा है। नलों से आने वाले पानी की गुणवत्ता पर संदेह, नियमित आपूर्ति का अभाव, और पारदर्शिता की कमी ने लोगों को वैकल्पिक स्रोतों की ओर धकेल दिया है। जब राज्य अपनी बुनियादी जिम्मेदारी निभाने में असफल होता है, तब बाजार उस खाली स्थान को भर देता है—अक्सर मुनाफे की शर्तों पर।
शहरी भारत में बोतलबंद पानी का उपयोग तेजी से बढ़ा है। महानगरों में तो यह लगभग जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। कार्यालयों, स्कूलों, अस्पतालों और यहां तक कि सरकारी दफ्तरों में भी बड़े जार और बोतलें आम दृश्य हैं। यह स्थिति विडंबनापूर्ण है, क्योंकि इन्हीं शहरों में सबसे विकसित जल अवसंरचना होने का दावा किया जाता है। यदि इतनी सुविधाओं के बावजूद नागरिक सुरक्षित नल का पानी नहीं पी सकते, तो यह प्रशासनिक विफलता का सीधा प्रमाण है। पाइपलाइन की जर्जर हालत, सीवेज और पेयजल लाइनों का आपस में मिलना, तथा नियमित परीक्षण की कमी—ये सभी समस्याएँ वर्षों से ज्ञात हैं, लेकिन समाधान आधे-अधूरे ही रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अलग होते हुए भी उतनी ही चिंताजनक है। वहां बोतलबंद पानी का उपयोग अपेक्षाकृत कम है, लेकिन जैसे-जैसे ग्रामीण बाजारों तक निजी कंपनियों की पहुंच बढ़ रही है, यह निर्भरता वहां भी बढ़ने लगी है। कई इलाकों में भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक या आयरन की अधिकता के कारण लोग स्थानीय जल स्रोतों से डरने लगे हैं। राज्य द्वारा उपलब्ध कराए गए सामुदायिक नल या हैंडपंप अक्सर या तो खराब रहते हैं या फिर उनका पानी पीने योग्य नहीं होता। ऐसे में जिनके पास आर्थिक क्षमता है, वे बोतलबंद पानी खरीद लेते हैं, जबकि गरीब तबके दूषित पानी पीने को मजबूर रहते हैं। यह स्थिति जल के क्षेत्र में गहरी असमानता को जन्म देती है।
हर घर जल का सपना बनाम हकीकत में बोतलबंद निर्भरता
बोतलबंद पानी उद्योग का विस्तार अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। एक ओर यह उद्योग “शुद्धता” और “सुरक्षा” का वादा करता है, वहीं दूसरी ओर इसके नियमन में गंभीर खामियां हैं। कई बार यह पाया गया है कि बाजार में उपलब्ध बोतलबंद पानी भी गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरता। इसके बावजूद उपभोक्ता इसे नल के पानी से अधिक सुरक्षित मानते हैं। यह धारणा स्वयं में सार्वजनिक जल संस्थानों की साख पर सवाल है। यदि राज्य द्वारा प्रमाणित और नियंत्रित जल आपूर्ति प्रणाली पर नागरिक भरोसा नहीं करते, तो यह लोकतांत्रिक शासन की विश्वसनीयता के लिए भी खतरे की घंटी है।
पर्यावरणीय दृष्टि से बोतलबंद पानी पर निर्भरता अत्यंत विनाशकारी है। प्लास्टिक की बोतलें कचरे के पहाड़ में बदल रही हैं। पुनर्चक्रण की दर बेहद कम है और अधिकांश प्लास्टिक अंततः नदियों, झीलों और समुद्रों में पहुंच जाता है। इसके अलावा, बोतलबंद पानी के उत्पादन में भी भारी मात्रा में जल और ऊर्जा की खपत होती है। यानी जिस संसाधन की कमी की बात की जा रही है, उसी का अत्यधिक दोहन करके एक कृत्रिम समाधान प्रस्तुत किया जा रहा है। यह विरोधाभास नीति निर्माताओं की अल्पकालिक सोच को उजागर करता है।
सार्वजनिक जल प्रशासन की समस्याएँ केवल तकनीकी नहीं हैं; वे संस्थागत और राजनीतिक भी हैं। जल प्रबंधन से जुड़े विभाग अक्सर संसाधनों की कमी, कुशल मानवबल के अभाव और आपसी समन्वय की समस्या से जूझते हैं। इसके अलावा, जल आपूर्ति जैसी बुनियादी सेवा को राजनीतिक प्राथमिकता भी अक्सर नहीं मिलती। चुनावी घोषणाओं में बड़े बांध, नदियों को जोड़ने की परियोजनाएं या स्मार्ट शहरों की बातें तो होती हैं, लेकिन रोजमर्रा की जल आपूर्ति को सुधारने पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप, छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण समस्याएं वर्षों तक अनसुलझी रहती हैं।
निजीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति भी इस संकट को गहरा कर रही है। जब सार्वजनिक प्रणालियाँ कमजोर होती हैं, तो समाधान के रूप में निजी कंपनियों को आगे लाया जाता है। हालांकि कुछ मामलों में इससे दक्षता बढ़ी है, लेकिन अक्सर इसका लाभ केवल उन लोगों को मिलता है जो भुगतान कर सकते हैं। पानी जैसे आवश्यक संसाधन का बाजार आधारित वितरण सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। बोतलबंद पानी इस निजीकरण का सबसे स्पष्ट उदाहरण है, जहां स्वच्छ पानी एक मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक उपभोक्ता वस्तु बन जाता है।
इस पूरी स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बोतलबंद पानी पर निर्भरता धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है। लोग इसे समस्या के लक्षण के बजाय समाधान के रूप में देखने लगे हैं। इससे सार्वजनिक दबाव कम होता है और प्रशासनिक सुधार की मांग कमजोर पड़ जाती है। जब नागरिक स्वयं वैकल्पिक व्यवस्था कर लेते हैं, तो राज्य पर जवाबदेही का दबाव घट जाता है। यह चुपचाप स्वीकार की गई असफलता भविष्य में और बड़े संकटों को जन्म दे सकती है।
आवश्यकता इस बात की है कि जल को फिर से सार्वजनिक भलाई के रूप में स्थापित किया जाए। इसके लिए सबसे पहले नल के पानी की गुणवत्ता और नियमितता सुनिश्चित करनी होगी। पारदर्शी जल परीक्षण, परिणामों की सार्वजनिक उपलब्धता और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था नागरिकों का भरोसा बहाल कर सकती है। साथ ही, जल अवसंरचना में निवेश को प्राथमिकता देनी होगी—चाहे वह पाइपलाइन की मरम्मत हो, सीवेज प्रबंधन हो या जल शोधन संयंत्रों का आधुनिकीकरण।
इसके साथ-साथ जन जागरूकता भी महत्वपूर्ण है। लोगों को यह समझना होगा कि बोतलबंद पानी दीर्घकालिक समाधान नहीं है। पर्यावरणीय और सामाजिक लागतों के बारे में जानकारी बढ़ाकर उपभोक्ता व्यवहार को बदला जा सकता है। स्कूलों, सामुदायिक संगठनों और स्थानीय निकायों की भूमिका इसमें अहम हो सकती है।
अंततः, बोतलबंद पानी पर बढ़ती निर्भरता एक चेतावनी है। यह बताती है कि यदि सार्वजनिक जल प्रशासन को मजबूत नहीं किया गया, तो पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता भी गहरी असमानता और संकट का कारण बन सकती है। यह समय है कि राज्य, समाज और नागरिक मिलकर इस प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करें और पानी को फिर से भरोसे, समानता और सार्वजनिक जिम्मेदारी के दायरे में वापस लाएं। केवल तभी भारत अपनी बढ़ती प्यास को न्यायपूर्ण और टिकाऊ तरीके से बुझा सकेगा।
डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी
कहावत सही है कि राजनीति में कोई सगा नहीं और नैतिकता नाम की कोई चीज नहीं होतीकुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल के मुद्दे पर एक आंदोलन चला था जिस ने तबकी कांग्रेस सरकार को घुटने पर ला दिया था उस आंदोलन से लोकपाल का क्या हुआ, ये कोई नहीं जानता लेकिन उस आंदोलन की कोख से एक राजनीतिक दल का उदय हुआ जिसका नाम आम आदमी पार्टी पड़ा जिसमें आम आदमी कहाँ है, कोई नहीं जानता। राजनीति में नैतिकता नाम की चीज नहीं होती
इस आम आदमी पार्टी ने शीला दीक्षित की सरकार को दिल्ली के विधानसभा चुनाव में धूल चटा दी और उस समय से लेकर अब तक दिल्ली की सत्ता पर काबिज़ है। ईमानदारी का दम भरने वाली पार्टी के शीर्ष नेता भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल चले गए और उनमें से उनका मुख्यमंत्री भी शामिल था। सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल को जमानत देते समय जो शर्तें रखीं, वो किसी तड़ी पार आदमी के लिए लागू होती है। जो मुख्यमंत्री सचिवालय नहीं जाएगा ,वह मुख्यमंत्री के रूप में काम कैसे करेगा। इसीलिए अरविंद केजरीवाल को मजबूरी में इस्तीफा देना पड़ा। अरविंद केजरीवाल में जरा भी ग़ैरत होती तो उसे जेल जाने के साथ ही इस्तीफा देना चाहिए था। दरअसल हमारे संविधान में यह स्पष्ट नहीं है कि किसी भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को जेल जाने की स्थिति में अपने पद से त्यागपत्र देना चाहिए कि नहीं। हमारे संविधान निर्माताओं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आने वाले समय देश में ऐसी स्थिति भी आ सकती है कि एक मुख्यमंत्री को भी जेल जाना पड़ सकता है वरना संविधान में इसका प्रावधान जरूर रहता। अभी भी संविधान में संशोधन करके इसका प्रावधान अवश्य कर देना चाहिए क्योंकि अब इस तरह के मामले आते ही रहेंगे। ईडी को इस बात का सबूत भले मिले या ना मिले लेकिन इतना तय है कि शराब घोटाले में आम आदमी पार्टी को रिश्वत जरूर मिली है।
दरसअल भारत की जनता भी अब भ्रष्टाचार की आदी हो चुकी है।जब आप बिजली और पानी फ्री देने के मुद्दे पर पार्टी को वोट देकर चुनाव जीता सकते हैं तो आप फिर कैसे किसी से ईमानदारी की अपेक्षा रख सकते हैं। अरविंद केजरीवाल जब एनजीओ चलाते थे उसी समय उनको विदेशों से फंड मिलता था और उसी के कारण उसने नौकरी से इस्तीफा भी दिया था। आज देश में जितने भी एनजीओ हैं, उसमें से 90 प्रतिशत लोगों के चंदे से चलते हैं और इसको चलाने वाले दूसरों के पैसे पर मौज करते हैं । उनको सामाजिक कार्यों से कोई लेना देना नही रहता । शुरू से ही लोगों पर झूठे इल्जाम लगाना और कोर्ट के फटकार के बाद माफ़ी मांग लेना केजरीवाल की फ़ितरत रही। सोनिया गांधी से लेकर लालू प्रसाद यादव पर इल्जाम लगाता रहा और जरूरत पड़ी तो उनकी गोद में जा बैठा। मौजूदा राजनीतिक पटल पर सबसे बड़ा अवसर वादी और धूर्त व्यक्ति है। इसने मजबूरी में आतिशी को मुख्यमंत्री बनाया क्योंकि उसे एक कठपुतली मुख्यमंत्री चाहिये था वरना कोई भी दूसरा व्यक्ति चम्पई सोरेन या जीतन राम मांझी हो सकता था।इसने कहीं से कोई त्याग नहीं किया है।कुर्सी के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाता रहा लेकिन जब इसने देखा कि अब मुख्यमंत्री की कुर्सी नसीब नहीं हो सकती तो मुख्यमंत्री की कुर्सी से त्यागपत्र दिया।1
आज भारत की राजनीति में नैतिकता नाम की कोई चीज नही बच गयी है।वैसे भी राजनीति में किसी तरह की नैतिकता हो भी नहीं सकती है । देश में हर राजनीतिक दल अपनी सत्ता के लिए कुछ भी करने को तैयार बैठा है वरना अजित पवार जैसे व्यक्ति का बीजेपी से हाथ मिलाना नामुमकिन था। जो प्रधानमंत्री अजित पवार को भ्रस्टाचारी बताते रहे, वहीं अजित पवार के साथ सरकार बनाने में कतई संकोच नहीं किया।...
त्रिनाथ शर्मा
लखनऊ। AIDAA Lucknow City Branch द्वारा एयरवे मैनेजमेंट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं सिमुलेशन की भूमिका विषय पर एक महत्वपूर्ण सीएमई (Continuing Medical...
अथक,अनवरत और अदम्य ऊर्जा की प्रेरक तस्वीर। सिंगापुर और जापान दौरे में जीवंत कर्मयोग का उदाहरण बने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। चार दिवसीय विदेश यात्रा...