सनातन: जो समय से परे और अविनाशी है..!

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सनातन: जो समय से परे और अविनाशी है..!
सनातन: जो समय से परे और अविनाशी है..!

अजीत सिंह

सनातन केवल एक पंथ नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही वह जीवन-पद्धति है, जो त्याग, तप और परंपरा के सतत प्रवाह से आज भी जीवित है। आज जब मल्टीनेशनल कंपनियों, हाई पैकेज और आधुनिक संसाधनों की चर्चा होती है, तब हमें उन पिछली पीढ़ियों को याद करना चाहिए। जिन्होंने छोटी-छोटी आमदनी, खेती-किसानी की बचत और सीमित साधनों के बावजूद मंदिर, शिवालय और देवस्थान खड़े किए। वे मंदिर भले ही भव्य न हों, सेल्फी प्वाइंट न हों, लेकिन उनकी नींव में आस्था, विश्वास और भविष्य की चिंता समाई हुई थी।

सनातन अमिट है हमारा धर्म अविनाशी है ये जो सनातन अविरल अविनाशी है उसके पीछे हमारी परंपराएं हैं, अपनी पिछली पीढ़ी का शुक्रिया अदा करें जिन्होंने इसको जीवित रखने के लिए अथक प्रयास सतत जारी रखा। पहले मल्टीनेशनल कंपनी और हाई पैकेज में काम करने वाले लोग नहीं होते थे। उस समय वो छोटी-छोटी आमदनी से खेती किसानी से थोड़ा बहुत बचा के मंदिर और शिवाले बनाएं हो सकता है। बहुत दर्शनीय ना हो सेल्फी प्वाइंट न हों पर खुद कच्चे मकानों में रहकर ईश्वर का स्थान पक्का ही बनाया उसके पीछे मंशा यही थी कि कुछ पीढ़ी तक चले। गांव में पुराने दो-चार मंदिर आपको हर जगह मिल जाएंगे उन माताओं बहनों का शुक्रिया अदा करें जिन्होंने पीपल और नीम में अनवरत जल चढ़ाना जारी रखा। इन देव वृक्षों का सरंक्षण हो सका सोमवार गुरुवार मंगलवार को व्रत रखने वालो ने इस विधा को सदियों से जारी रखा है धन्यवाद करें। वेद पाठी पुरोहितों ब्राह्मणों का जिन्होंने बहुत कम शुल्क में सत्यनारायण की कथा अनवरत सुनाते चले आ रहे हैं। सनातन: जो समय से परे और अविनाशी है..!

पूजा हवन आरती के लिए किसी खास शिक्षा की जरूरत नहीं पड़ेगी आपको फटे पुराने लाल कपड़े मे संजो कर रखी गई कथा की प्रतियां आज भी पीढ़ी दर ट्रांसफर हो रही है। पीतल के सिंहासन पर विराजमान शालिग्राम कितने वर्ष के हैं इसका अंदाजा किसी को नहीं है। आज भी गांव के मंदिरों में शनिवार मंगलवार का सुंदरकांड का पाठ अनवरत होता है। ढोल मजीरा हारमोनियम के संगत से संगीत में सुंदरकांड का पाठ हमेशा से होता आ रहा है । उसमें ढोल गवार शुद्र पशु नारी वाली चौपाई कब आई और कब निकल गई किसी ने इतनी विवेचना नहीं करी जो अब हो रही है। जिन्होंने सुंदरकांड का पूरा पाठ ढंग से एक बार भी नहीं किया होगा वो इसपर बहस कर रहे हैं।

सदियों से चले आ रहे हैं उन कलाकारों का शुक्रिया अदा करिए जिन्होंने राम- लक्ष्मण सीता दशरथ रावण बाणासुर और बजरंगबली का पाठ करके हमारी आप की रामलीला जिंदा रखी। उनके पात्रों को जीवित रखा। उन कलाकारों के पास क्या पूंजी है आज कुछ भी तो नहीं है वो कोई सेलेब्रिटी नहीं होते थे दिन में अपना काम करते थे रात को रामलीला करने वाले भी हमने देखे है ।पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होता यह सनातनी रंग आज भी चला रहा है। शादी ब्याह के गीत सब भगवान के नाम पर ही था। गांव किसी के जन्म पर शोहर में भी भगवान के नाम वाला गाया जाता था। माघ मेला में महीने भर का कल्पवास करने वाले लोग किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित नहीं है वो केवल विशुद्ध शत-प्रतिशत सनातनी रहे हैं। उनको इस परंपरा से लगाव रहा गंगा यमुना सरस्वती के संगम से लगाव रहा है बंधवा के हनुमान जी उनको अपने लगते हैं। आज लोग साधन संपन्न हो गए हैं पहले तांगा टेंपो या पैदल ही मिलो चल कर लोग देव स्थान जाते थे। यह परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होती रही हैं।

यह सब अलिखित है कहीं कुछ लिखा नहीं है हमने अपने बाप दादा से सुना। उन्होंने अपने पूर्व की‌ पीढ़ी से सुना होगा। इन्ही दंत कथाओं पर बना ये विशाल साम्राज्य हमारी सनातनी पूंजी है। इसको कोई नष्ट नहीं कर पाया हर गांव में मंदिर हर घर मे राम हर शिवाला में शिव हर पत्थर में भगवान पेड़ों में भगवान जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जान सब की आराधना सब की पूजा हर व्यक्ति के नाम में देवताओं के नाम का कुछ अंश। मुगल थक गए विदेशी आक्रांता थक गए कुछ नहीं बिगड़ा सब वही का वंही है। इसी मर्म को समझने के लिए बनारस की गलियों में अंग्रेज आज भी भरमाया हुआ घूमता है माघ मेला के रेती पर बना तंबुओं का शहर उसे विश्व मे और कहीं देखने को नहीं मिलता। वृंदावन की गलियों में तिलक चंदन लगाए आज भी राधे-राधे करता है। कुछ तो खास है इसमें ये सब दो चार सौ साल से नही युग युगांतर से है और जारी रहेगा। ये सब अनादि काल से है और रहेगा…

सनातन धर्म किसी एक काल, वर्ग या सुविधा पर आधारित नहीं रहा है। इसकी शक्ति उसके सतत प्रवाह, त्याग, और सामूहिक आस्था में निहित है। जिन पीढ़ियों के पास संसाधन नहीं थे, उन्होंने भी अपने सीमित साधनों से ईश्वर का स्थान पक्का किया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ आस्था से जुड़ी रहें। माताओं-बहनों की दैनिक पूजा, व्रत और देववृक्षों का संरक्षण; वेदपाठी पुरोहितों की सरल, सुलभ और निष्कलुष सेवा—यही सनातन की जीवंत परंपरा है। यह परंपरा बताती है कि धर्म दिखावे से नहीं, आचरण से जीवित रहता है। आज की पीढ़ी का दायित्व है कि वह इस विरासत को केवल स्मरण न करे, बल्कि उसे संरक्षित, सम्मानित और संवर्धित भी करे। सनातन इसलिए अविनाशी है क्योंकि वह समय के साथ चलता है, पर अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ता। ये सब अनादि काल से है और रहेगा… सनातन: जो समय से परे और अविनाशी है..!