

लखनऊ। विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कुछ माह पूर्व तत्कालीन राज्यसभा सभापति जगदीश धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की असफल कोशिश के बाद अब वही दल लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को निशाना बना रहे हैं। संसद के निचले सदन में चल रहे गतिरोध के बीच यह नया विवाद तेज हो गया है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने का पूरा समय न मिलने और उनकी टिप्पणियों पर सख्ती के कारण विपक्ष नाराज है। सूत्र बताते हैं कि ओम बिरला नियमों का सख्ती से पालन कर रहे हैं, जिससे कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल असंतुष्ट हैं। कई दल इस प्रस्ताव पर सहमति जता चुके हैं, हालांकि आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। सदन सोमवार को भी दोपहर तक स्थगित रहा।
इतिहास में लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के कुछ दुर्लभ उदाहरण हैं। पहला ऐसा प्रयास 1954 में हुआ जब लोकसभा के प्रथम सभापति गणेश वासुदेव मावलंकर के खिलाफ बिहार के सोशलिस्ट नेता विग्नेश्वर मिसिर ने प्रस्ताव पेश किया। दो घंटे की बहस के बाद यह खारिज हो गया। जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में यह घटना हुई, जब सभापति पर सदन में पक्षपात के आरोप लगे थे।
तीसरा प्रमुख उदाहरण 1985 का है। उस समय बलराम जाखड़ लोकसभा सभापति थे, जो 1980 से 1989 तक पद पर रहे। विपक्ष ने उनके खिलाफ प्रस्ताव लाया, लेकिन बहुमत के अभाव में यह पारित नहीं हो सका। इन तीनों मामलों में प्रस्ताव असफल रहे क्योंकि सत्ता पक्ष को बहुमत था। भारतीय संसदीय इतिहास में कुल 27 अविश्वास प्रस्ताव सरकार के खिलाफ आ चुके हैं, लेकिन स्पीकर के खिलाफ केवल ये तीन बार प्रयास हुए। सभी विफल रहे। लोकसभा नियमावली के अनुसार स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर से महासचिव को दिया जाता है। सभापति स्वयं प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का अधिकार रखते हैं। विपक्षी दलों को एकजुट रहना होगा, लेकिन आंतरिक मतभेद इसे कमजोर कर सकते हैं।
वर्तमान संदर्भ में ओम बिरला 2019 से लोकसभा सभापति हैं। वे दूसरी बार 2024 में चुने गए। भाजपा उन्हें निष्पक्ष मानती है, जबकि विपक्ष सदन में विपक्षी आवाज दबाने का आरोप लगाता है। राहुल गांधी को राष्ट्रपति अभिभाषण बहस में बोलने का समय मिला था, लेकिन उनकी टिप्पणियां नियमों के विरुद्ध पाई गईं। बिरला ने सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए कार्रवाई की। विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहा है। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्य दल समर्थन की बात कर रहे हैं।
भाजपा नेता इसे विपक्ष का हताशापूर्ण कदम बता रहे हैं। वे कहते हैं कि स्पीकर ने सदन को सुचारू रूप से चलाने का प्रयास किया। विपक्ष को बहस के बजाय हंगामा पसंद है। ओम बिरला ने विपक्ष को पर्याप्त अवसर दिए। अब प्रस्ताव लाकर वे अपनी हार स्वीकार कर रहे हैं। विपक्षी नेता असदुद्दीन ओवैसी, महुआ मोइत्रा जैसे नाम इस मुद्दे पर मुखर हैं। लेकिन बहुमत के आगे यह प्रयास व्यर्थ जाएगा। संसद को रचनात्मक बहस की जरूरत है। अविश्वास प्रस्ताव से मुद्दे हल नहीं होंगे।























