

क्या अब विश्वविद्यालयों में आरोप ही अपराध बन चुका है?
क्या आज का सवर्ण छात्र सिर्फ़ सवर्ण होने की वजह से संदेह के कटघरे में खड़ा है?
यूजीसी की नई गाइडलाइन ने उच्च शिक्षा को न्याय का मंच बनाया है… या फिर डर और दमन का अखाड़ा? क्या अब विश्वविद्यालयों में आरोप ही अपराध..?
यूजीसी की नई गाइडलाइन: सवर्ण छात्रों को संदेह के कटघरे में खड़ा करती व्यवस्था
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में जारी की गई नई गाइडलाइन ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और सुरक्षा के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था को जन्म दिया है, जिसने सवर्ण वर्ग के छात्रों को असहज,आशंकित और असुरक्षित बना दिया है। विशेष रूप से वह प्रावधान, जिसमें ओबीसी, अनुसूचित जाति/जनजाति एवं दिव्यांग वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव, मारपीट या जाति आधारित व्यवहार के मामलों में सवर्ण छात्र को सीधे दोषी की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाता है, गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
आरोप ही अपराध बनता जा रहा है
यूजीसी की नई गाइडलाइन के अनुसार यदि किसी सवर्ण छात्र पर यह आरोप लगता है कि उसने किसी ओबीसी, अनुसूचित जाति या दिव्यांग छात्र के साथ भेदभाव किया है, तो संस्थान स्तर पर कठोर कार्रवाई का प्रावधान है। समस्या यह नहीं कि भेदभाव के विरुद्ध सख़्ती की जा रही है, समस्या यह है कि यहाँ जांच से पहले ही मानसिक रूप से दोषी मान लेने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह न्याय के उस मूल सिद्धांत के विपरीत है, जिसमें दोष सिद्ध होने तक व्यक्ति निर्दोष माना जाता है।
क्या सवर्ण होना ही संदिग्ध होना है..?
आज का सवर्ण छात्र यह महसूस कर रहा है कि वह किसी भी शैक्षणिक परिसर में कदम रखते ही संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। एक छोटी-सी बहस, सामान्य विवाद या व्यक्तिगत टकराव भी यदि जाति के चश्मे से देखा गया, तो उसका परिणाम सवर्ण छात्र के लिए निलंबन, एफआईआर या शैक्षणिक भविष्य पर संकट के रूप में सामने आ सकता है। यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि भय का वातावरण भी बनाती है।
समान कानून,असमान व्यवहार
यूजीसी की गाइडलाइन में यह स्पष्ट असंतुलन दिखाई देता है कि एक वर्ग को संरक्षण देने के नाम पर दूसरे वर्ग को कठोर निगरानी और दंड के दायरे में डाल दिया गया है। यदि वास्तव में उद्देश्य न्याय है, तो नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। केवल सामाजिक पहचान के आधार पर किसी छात्र को संभावित अपराधी मान लेना शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर आघात है।
शिक्षा का वातावरण या दमन का मंच..?
शैक्षणिक संस्थान संवाद, विचार और सह-अस्तित्व के केंद्र होते हैं, न कि डर और संदेह के। नई गाइडलाइन के बाद सवर्ण छात्रों में यह डर गहराता जा रहा है कि कहीं कोई असत्य या अतिरंजित आरोप उनके पूरे भविष्य को नष्ट न कर दे। यह स्थिति शिक्षा के मूल उद्देश्य—ज्ञान, समरसता और राष्ट्र निर्माण—को कमजोर करती है।
विरोध इसलिए ज़रूरी है
सवर्ण वर्ग का विरोध किसी भी वंचित या आरक्षित वर्ग के अधिकारों के खिलाफ नहीं है। यह विरोध एकतरफा और असंतुलित नीति के खिलाफ है, जहाँ दंड की तलवार केवल एक वर्ग के सिर पर लटकती दिखाई देती है। यदि भेदभाव होता है, तो उस पर कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए, लेकिन निष्पक्ष जांच और समान न्याय के साथ। यूजीसी की नई गाइडलाइन में तत्काल पुनर्विचार की आवश्यकता है। शिक्षा व्यवस्था को सामाजिक न्याय का माध्यम बनाते हुए भी न्यायपूर्ण बनाए रखना अनिवार्य है। किसी भी वर्ग—चाहे वह सवर्ण हो या वंचित—को बिना निष्पक्ष प्रक्रिया के दोषी ठहराना लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है। सवर्ण छात्रों की आशंकाएं वास्तविक हैं, और उन्हें अनदेखा करना भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।

























