
बढ़ती वैश्विक गर्मी, जलती धरती, और बिगड़ी बायोलॉजिकल क्लॉक। आधुनिकरण के नाम पर अंधाधुंध वनों की कटाई से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। बढ़ती वैश्विक गर्मी से बिगड़ी बायोलॉजिकल क्लॉक-रीना त्रिपाठी
अजय सिंह
लखनऊ। आज मनुष्य विज्ञान की ताकत के भरोसे चांद तारों पर पहुंच कर ऊंचाई की पराकाष्ठा और समुद्र की तलहटी में पहुंचकर गहराई की पराकाष्ठा नापने में तो सफल हो गया है परंतु विज्ञान और मनुष्य दोनों प्रकृति से हार रहे है। बढ़ता वैश्विक तापमान सर्वजन हिताय संरक्षण समिति की महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष रीना त्रिपाठी नें कहा कि आज जहां चारों ओर चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि हम विज्ञान का प्रयोग करके सुख सुविधाएं तो बढ़ा ले रहे हैं परंतु उसके नकारात्मक प्रभाव मानवता के लिए खतरा साबित हो रहे हैं। पूरी पृथ्वी के विभिन्न देशों सहित भारत में भी रोज ही हम पृथ्वी के औसत तापमान में धीरे-धीरे वृद्धि की घटना को देख रहे है। यह बढ़ता तापमान मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण ही है,जो वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों को छोड़ते है।
रीना त्रिपाठी नें कहा कि सर्वविदित है पृथ्वी के वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसें (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड) मौजूद हैं जो सूर्य से आने वाली गर्मी को रोक लेती हैं, जिससे पृथ्वी ग्रह जीवन के लिए पर्याप्त गर्म रहता है।मानवीय गतिविधियां, जैसे जीवाश्म ईंधनों का जलाना, वनों की कटाई, तथा औद्योगिक प्रक्रियाएं, वायुमंडल में बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों को छोड़ती हैं, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव तीव्र होता है तथा ग्लोबल वार्मिंग होती है और पृथ्वी जरूरत से कई गुना ज्यादा गर्म हो जाती है।
आज बहुत आम भाषा में हम सब अपने घरों में फ्रिज, एसी ओवन इत्यादि उपकरणों का प्रयोग कर रहे हैं जिससे जाने अनजाने हम वातावरण को ग्रीन हाउस गैसों के रूप में गर्मी वापस कर रहे हैं।आज मार्च के महीने में ही सूर्य की तपिश् कितनी बढ़ गई है की हीट स्ट्रोक जून की जगह अभी महसूस होने लगा है। यदि विकास की दौड़ में हम अनुशासित नहीं हुई तो ग्रीन हाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन भयंकर ग्लोबल वार्मिंग के रूप में मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरा साबित होगी। आज ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (शमन) को कम करना और जलवायु परिवर्तन के अपरिहार्य प्रभावों के अनुकूल होना आवश्यक है।
उन्होंने आगे कहा कि इसके लिए जरूरी है कि हम जहां बहुत जरूरी हो, वही ऐसे अत्याधुनिक उपकरणों का प्रयोग करें, निश्चित रूप से मुश्किल जरूर है बिना एसी के ऑफिस ,बिना एसी बसों के और कारों के परिवहन आज की बढ़ती गर्मी में शायद नामुमकिन होता जा रहा है। हां पर यह जरूर हो सकता है कि जब बहुत आवश्यकता हो तो हम सामूहिक रूप से उपकरणों का उपयोग करें ताकि बढ़ी हुई गर्मी में ठंडक का लाभ ज्यादा से ज्यादा लोगों को मिल सके और वातावरण में हम गर्म गैसों और हानिकारक चीजों को कम उत्सर्जित कर सकें।
इलेक्ट्रॉनिक और औद्योगीकरण के युग में ग्लोबल वार्मिंग से बचने का एक ही उपाय है कि हम नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण करें ,ऊर्जा दक्षता में सुधार, तथा टिकाऊ भूमि प्रबंधन प्रथाओं को बढ़ाया जाए ।जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए रणनीति विकसित करना, जैसे बाढ़ सुरक्षा का निर्माण, जल प्रबंधन में सुधार, तथा सूखा प्रतिरोधी फसलें विकसित करने की महती आवश्यकता है।यदि विकास के रथ का पहिया कुछ थम के ना चला तो वह दिन दूर नहीं जब वैश्विक तापमान में वृद्धि से विभिन्न प्रकार के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि चरम मौसम घटनाएँ,गर्म लहरोंके थपेड़े, सूखे, बाढ़ और तूफानों की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि लगातार दिख रही है। ग्लेशियरमें तपन बढ़ने से समुद्र तल से वृद्धि ,तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियर और बर्फ की चादरें लगातार पिघल रही हैं जिससे समुद्र का स्तर बढ़ जाता है, जिससे तटीय समुदायों के लिए खतरा पैदा हो जाता है। पारिस्थितिकी तंत्र में लगातार परिवर्तन देखने को मिल रहा हैं, पौधों और पशुओं के आवास में बदलाव से प्रजातियों के विलुप्त होने की संभावना बढ़ जाती है। मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव भी बढ़ते तापमान और ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव देखने को मिल रहा है गर्मी से संबंधित बीमारियों, संक्रामक रोगों के फैलने और खाद्य असुरक्षा का खतरा बढ़ जाता है। बढ़ती वैश्विक गर्मी से बिगड़ी बायोलॉजिकल क्लॉक-रीना त्रिपाठी

ग्लोबल वार्मिंग के तहत उत्सर्जित होने वाली मुख्य गैस से जो औद्योगिकरण और आधुनिकरण की देन है की उत्सर्जन के प्रति यदि चिंतित नहीं हुआ गया तो कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) और मीथेन (CH4) जैसी ग्रीनहाउस गैसों (GHG) के उत्सर्जन के कारण पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में दीर्घकालिक खामियां जी हम मनुष्यों को देखने को मिलेंगे, साथ ही विभिन्न प्रकार की नई बीमारियां अवसाद चिंता और हीट स्ट्रोक के कारण पृथ्वी में उपस्थित जीव जंतुओं के अस्तित्व के लिए भारी खतरा निर्मित करेंगे।
अंतरिक्ष में जाने वाली ऊष्मा ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव से वापस नहीं जा पाती और वह लगातार पृथ्वी के वातावरण को गर्म करने लगती है जैसे कि प्रेशर कुकर कहीं ऐसा ना हो हम भी पृथ्वी के इस वातावरण में अनजाने में एक ऐसे प्रेशर कुकर के अंदर उबालने के लिए बेबस हो जाए जिसे हमने ही अपनी निजी जिंदगी की सुविधाओं हेतु बनाया था। इन गैसों कीपृथ्वी में बढ़ी हुई सांद्रता गर्मी और तपन को स्थित करती है और यह मनुष्य के जीनिक संरचना को भी भविष्य प्रभावित करने की ताकत रखती है।
उनके अनुसार सदी के उत्तरार्द्ध से ग्रह की सतह का औसत तापमान लगभग 1°C बढ़ गया है, पिछले दशक में अब तक के कई सबसे गर्म वर्ष दर्ज़ किये गए हैं, वर्ष 2023-2024 में भी तापमान में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है।मई 2023 से अप्रैल 2024 तक की अवधि अभी तक दर्ज़ की गई सबसे गर्म 12 महीने की अवधि थी, जिसमें वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.61°C अधिक था और एक बार पुनः इसमें वृद्धि लगातार जारी है।
रीना ने कहा भारत की तापमान वृद्धि वैश्विक औसत से कम है।वर्ष 1900 के बाद से भारत के तापमान में 0.7 °C, जबकि वैश्विक तापमान में 1.59°C की वृद्धि हुई।ग्लोबल वार्मिंग वैश्विक तापमान में वृद्धि और हीटवेव की आवृत्ति का कारण बन रहा है।भारत में हीटवेव आमतौर पर मार्च से जून तक आती हैं और कुछ असाधारण परिस्थितियों में जुलाई तक भी जारी रहती हैं। परंतु इस वर्ष अत्यधिक गर्मी और स्टोक मार्च से ही महसूस की जाने लगी है। देश के उत्तरी भागों में प्रतिवर्ष औसतन पाँच-छह बार हीटवेव आती हैं।
जंगलों में रहने वाले जानवर भी गर्मी और पानी की कमी से मृत प्राय होते जा रहे हैं। जैव विविधता में विभिन्न पायदान में पाए जाने वाले जीव जंतु खत्म होने के कगार में आ गए हैं।
भारत में हीटवेव अधिक गंभीर होती जा रही है, यहाँ तक कि यह फरवरी में भी जारी रहती है, जबकि सर्दियों का महीना ऐसा होता है जिसके लिये हीटवेव की सीमा निर्धारित नहीं की गई है। रीना त्रिपाठी ने कहा कि पृथ्वी के सतह पर औसतन तापमान का बढ़ना,ग्लोबल वार्मिंग मुख्य रूप से मानव प्रेरक कारकों के कारण होता है। आधुनिकरण के नाम पर अंधाधुंध वनों की कटाई हो रही है, सड़क को चौड़ा करने के नाम पर बरसों पुराने पेड़ों को काट दिया जाता है।
पृथ्वी का जलस्तर निरंतर गिरता जा रहा है। बड़ी ऊंची बिल्डिंग ,चौड़ी होती सड़के, आसमान में उड़ते हवाई जहाज गर्मी के मौसम में भी ठंडा घर औरकमरे, ऐसी युक्त गाड़ियां इत्यादि आमजन की सुविधा कहीं पृथ्वी के अस्तित्व को खतरे में तो नहीं डाल देगी। कहीं हमारा विकास पृथ्वी के अस्तित्व और जीव जंतुओं के लिए विनाशकारी तो नहीं हो रहा। जैसा की सर्वविदित है और बच्चों के पाठ्यक्रम में भी पढ़ाया जाता है कि औद्योगीकरण में ग्रीन हाउस गैसों का अनियंत्रित उत्सर्जन तथा जीवाश्म ईंधन का जलना ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण होता है। हमने जो ग्रीन हाउस गैस वायुमंडल में बनाई उसने सूर्य की गर्मी को वापस जाने से रोक दिया है इस प्रकार बनने वाले प्रभाव जिसे “ग्रीन हाउस गैस प्रभाव” के नाम से जाना जाता है।
अनियंत्रित और तीव्र गति से होती उत्सर्जित गैसे और इनसे उत्पन्न प्रभाव के फलस्वरूप पृथ्वी के सतह पर तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी के बढ़ते तापमान के फलस्वरूप पर्यावरण प्रभावित होता है अतः इस पर ध्यान देना आवश्यक है। नीति निर्माता सरकारों को इस बात पर ध्यान रखना चाहिए और ऊर्जा के सदुपयोग ,नियंत्रित उपयोग और भविष्य के लिए सुरक्षित सीमित उपयोग हेतु कड़े नियम कानून बनाने चाहिए।
शहरों में किसी-किसी घर में प्रत्येक कमरे में उतनी ही एसी जितने लोग हैं ,उतनी ही गाड़ियां बड़े-बड़े मॉल में सेंट्रलाइज्ड एसी बड़े-बड़े दफ्तरों में बड़े एयर कंडीशन लगे हुए हैं जिसे उत्सर्जित होने वाली गैस है हमारी आज की सुविधाओं के लिए नितांत आवश्यक होती जा रही हैं तो वही कल के अंधेरे भविष्य की खाई में धकेलने के लिए पर्याप्त है। अक्सर हम कुछ वर्षों से लोगों के बीच अनिद्रा डिप्रेशन,कम उम्र के बच्चों में हार्ट अटैक,लिवर किडनी फेलियर जैसी समस्या देख रहे हैं और इन सब का सीधा कारण बढ़ते तापमान के कारण मनुष्य के बायोलॉजिकल क्लॉक का डिस्टर्ब होना मनुष्य के संवेदनशील अंगों का प्रतिक्रिया देना ही है।
अतः हम सब मनुष्यों को पृथ्वी के अस्तित्व की रक्षा हेतु एकजुट होना होगा औद्योगिकरण वैश्वीकरण के इस युग में वापस प्रकृति की ओर लौटते हुए मशीनीकरण और सुविधा युक्त जीवन शैली में कुछ लगाम लगानी होगी,आप खुद मनन करें पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में आपका क्या योगदान है और यदि है तो उसे किस प्रकार रोका जा सकता है क्योंकि यह पृथ्वी हम सब की है और आपका जीवन इस पृथ्वी के लिए बहुत ही मूल्यवान है। बढ़ती वैश्विक गर्मी से बिगड़ी बायोलॉजिकल क्लॉक-रीना त्रिपाठी