

अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने हिंदुत्व में फूट की कोशिश हिंदुत्व की राजनीति लंबे समय से एक संगठित सामाजिक-सांस्कृतिक आधार पर टिकी रही है। ऐसे में किसी भी मतभेद को ‘फूट’ के रूप में पेश किया जाना अपने आप में राजनीतिक अर्थ रखता है। अब देखना यह है कि यह विवाद अस्थायी बयानबाजी है या फिर व्यापक राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया बयानों और गतिविधियों को लेकर सियासी गलियारों में हलचल तेज है। सवाल उठ रहा है कि क्या उनके नाम के बहाने हिंदुत्व की विचारधारा के भीतर दरार दिखाने की कोशिश हो रही है, या यह केवल वैचारिक मतभेदों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है? धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक विमर्श के बीच की रेखा जब धुंधली होती है, तब बहस केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यापक वैचारिक एकता और रणनीति पर भी असर डालती है।
यहीं से यह मामला राजनीति की जमीन पर उतर आता है। समाजवादी पार्टी खुलकर शंकराचार्य के समर्थन में सामने आई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस एफआईआर को सरकार की नीयत से जोड़ते हुए योगी सरकार पर तीखा हमला बोला। अखिलेश यादव का कहना है कि जो सरकार खुद को सनातन धर्म की रक्षक बताती है, वही आज धर्म के सबसे प्रतिष्ठित पदों में से एक पर बैठे शंकराचार्य को झूठे आरोपों में घसीट रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की विदेश यात्राओं का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब प्रदेश में इतना संवेदनशील मामला सामने आया है, तब सरकार की प्राथमिकता क्या है।अखिलेश यादव ने इस विवाद को केवल धार्मिक या कानूनी मुद्दा मानने से इनकार किया।
उन्होंने इसे पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि मौजूदा सरकार की नीतियों से समाज के बड़े हिस्से में नाराजगी बढ़ रही है। सपा के आंतरिक सर्वे के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में यूपी के ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी की दर करीब 12 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 10 प्रतिशत के आसपास है। महंगाई के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है। खाद्य पदार्थों की कीमतों में पिछले तीन साल में औसतन 25 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सपा का तर्क है कि जब जनता पहले से इन समस्याओं से जूझ रही है, तब ऐसे विवाद सरकार के खिलाफ माहौल को और तेज कर रहे हैं।
सरकार और उसके समर्थक इस पूरे मामले को कानून के राज से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि एफआईआर अदालत के आदेश पर दर्ज हुई है और पुलिस केवल न्यायिक निर्देशों का पालन कर रही है। भाजपा समर्थकों का तर्क है कि कानून सबके लिए समान है और धार्मिक पद या सामाजिक हैसियत किसी को कानून से ऊपर नहीं रख सकती। हालांकि यह भी सच है कि सरकार की ओर से अब तक कोई विस्तृत राजनीतिक बयान सामने नहीं आया है, जिसे विपक्ष अपने पक्ष में भुना रहा है।धार्मिक और सामाजिक स्तर पर भी यह मामला गहरे असर छोड़ रहा है।
संत समाज का एक वर्ग शंकराचार्य के समर्थन में सामने आया है और इसे सनातन परंपरा पर हमला बता रहा है। उनका कहना है कि ऐसे आरोपों से न सिर्फ एक व्यक्ति, बल्कि पूरी संत परंपरा की छवि धूमिल होती है। वहीं कुछ धार्मिक संगठनों का मत है कि आरोप गंभीर हैं और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आंकड़ों के अनुसार, यूपी में दर्ज पॉक्सो मामलों में करीब 9 से 10 प्रतिशत मामलों में आरोपी सामाजिक रूप से प्रभावशाली या धार्मिक संस्थाओं से जुड़े पाए गए हैं, जिससे ऐसे मामलों में विवाद और राजनीतिक दबाव बढ़ जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में धर्म आधारित मुद्दे हमेशा चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में धार्मिक ध्रुवीकरण ने बड़ी भूमिका निभाई थी। अब जबकि 2027 का विधानसभा चुनाव दूर नहीं है, ऐसे विवादों का असर धीरे-धीरे जमीन पर दिखने लगेगा। सपा इसे सत्ता की कथित दमनकारी नीति और संतों के अपमान के रूप में पेश कर रही है, जबकि भाजपा इसे न्यायिक प्रक्रिया बताकर अपने ऊपर लगे राजनीतिक आरोपों से बचने की कोशिश कर रही है।
फिलहाल जांच शुरुआती दौर में है और कानूनी प्रक्रिया को पूरा होने में लंबा समय लग सकता है। लेकिन इतना तय है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर दर्ज एफआईआर अब सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई नहीं रह गई है। यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म, सत्ता और जनभावनाओं के टकराव का बड़ा प्रतीक बन चुकी है। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी और नए तथ्य सामने आएंगे, वैसे-वैसे इस विवाद का राजनीतिक तापमान और बढ़ेगा, और इसका असर सूबे की राजनीति पर लंबे समय तक महसूस किया जाएगा।






















