

आस्था का सच्चा स्वरूप क्या है? क्या सिर्फ़ पूजा करना, या जीवन की रक्षा करना? हम अक्सर भूल जाते हैं कि हर धर्म, हर परंपरा का मूल उद्देश्य है — जीवन को बचाना, न कि नष्ट करना। आस्था का सच्चा स्वरूप क्या..?
जल जीवन है। लेकिन अगर वही जल हमारी आस्था के नाम पर अपवित्र हो जाए, तो यह सिर्फ़ पर्यावरण का नहीं, हमारी आत्मा का संकट बन जाता है।” क्या आपने कभी नहरों की आवाज़ सुनी है? वो नहरें… जो खेतों को सींचती हैं, जो गाँवों को जीवन देती हैं, जो पशु-पक्षियों की प्यास बुझाती हैं। आज वही नहरें चुपचाप कराह रही हैं… और हम हैं कि पूजा, परंपरा और आस्था के नाम पर उन्हें और ज़्यादा घायल करते जा रहे हैं।
“नहरें सिर्फ़ पानी का बहाव नहीं हैं। वे हैं— किसानों के खेतों की हरियाली, पशुओं की प्यास, गाँवों की संस्कृति और सभ्यता की धमनियाँ। इन्हीं नहरों से किसान खेतों में सोनाला करता है ,ग्रामीण अर्थव्यवस्था चलती है, और हमारा भोजन सुरक्षित रहता है।लेकिन आज यही जीवनरेखाएँ हमारी असावधानी और अंधी परंपराओं के कारण दम तोड़ रही हैं।”
पूजा के बाद क्या होता है? मूर्तियाँ… फूल… कपड़े… प्लास्टिक… नारियल… अगरबत्ती… यहाँ तक कि मृत पालतू पशु भी नहरों में प्रवाहित कर दिए जाते हैं। जो कर्म श्रद्धा के नाम पर किए जाते हैं, वही आज प्रकृति के विरुद्ध अपराध बन चुके हैं। क्या भगवान प्लास्टिक में वास करते हैं? क्या श्रद्धा का अर्थ प्रदूषण फैलाना है?”
जब जीवनदायिनी जलधारा में प्लास्टिक, रसायन और जैविक कचरा घुलता है, तो वही जल विष बन जाता है। यह विष खेतों में जाता है, मिट्टी को बीमार करता है, फसलों की गुणवत्ता गिराता है, और अंततः हमारे भोजन में पहुँचता है। नहरों का दूषित पानी पशु-पक्षियों को बीमार करता है। जलजनित रोग, त्वचा रोग, पाचन संबंधी समस्याएँ तेज़ी से बढ़ रही हैं। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं— जल प्रदूषण एक मौन आपदा है।”
धर्म का अर्थ है प्रकृति की रक्षा। अगर भगवान सर्वव्यापी हैं, तो वे नदियों, नहरों, पेड़ों और जीवों में भी हैं। फिर उनकी पूजा के नाम पर इन्हें दूषित करना कैसी आस्था?पूजा सामग्री को नहरों में बहाना धर्म नहीं—अधर्म है। सच्ची श्रद्धा वही है जो जीवन को बचाए। आस्था का सच्चा स्वरूप क्या..?
























