

ईरानी बहनें तोड़ रही बुर्का की जंजीरे,भारत में बढ़ रही है कट्टरता। ईरान में महिलाएँ सामाजिक और धार्मिक बंदिशों के ख़िलाफ़ खुलकर आवाज़ उठा रही हैं, जिसे दुनिया आज़ादी की लड़ाई के रूप में देख रही है। वहीं भारत में समानांतर रूप से धार्मिक पहचान और कट्टरता पर बहस तेज़ होती जा रही है। यह विरोधाभास एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या समाज परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए तैयार है, या परंपराएँ बदलाव की राह रोक रही हैं? आजादी की आवाज़ बनाम पहचान की दीवार
ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं का साहसी विद्रोह पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर रहा है, जहां कुरान के नाम पर थोपी गई बुर्का और नकाब जैसी परंपराओं के खिलाफ सड़कों पर आवाज़ उठ रही है। खामेनेई की तानाशाही वाली सरकार के सामने ईरानी महिलाएं बिना नारे लगाए, बिना हिंसा किए, बस सिर से दुपट्टा उतारकर सड़कों पर उतर आई हैं, जो महसा अमीनी की हिरासत में मौत के बाद 2022 से चला आ रहा आंदोलन अब 2025-2026 में और तेज हो गया है। यह बगावत न केवल ईरान तक सीमित है, बल्कि अरब और अन्य मुस्लिम देशों में भी बुर्का हटाने की हवा चल रही है, जबकि बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत जैसे स्थानों पर इसके पक्ष में कट्टरता बढ़ रही है। यह और बात है कि इन देशों के मुसलमानों को अरब जगत मुस्लिम मानने को ही नहीं तैयार होता है।
गौरतलब हो, ईरान को पूरी तरह इस्लामिक राष्ट्र कहा जाता है, जहां 1979 की क्रांति के बाद अयातुल्लाह खुमैनी ने कुरान आधारित शासन स्थापित किया और महिलाओं पर सख्त हिजाब अनिवार्य कर दिया। नैतिक पुलिस द्वारा सड़कों पर गश्त कर महिलाओं को पकड़ना और सजा देना आम हो गया, लेकिन 2022 में 22 वर्षीय महसा अमीनी की हिरासत में संदिग्ध मौत ने चिंगारी जला दी। उसके बाद लाखों महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर दुपट्टा जलाया, बाल कटवाए और नारे लगाए, जिससे पूरे देश में आंदोलन फैल गया। हालिया समाचारों के अनुसार, दिसंबर 2025 में तेहरान और अन्य शहरों में महिलाएं खुलेआम बिना दुपट्टे के घूम रही हैं, जो सरकार को डरा रहा है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने विवादास्पद हिजाब कानून को स्थगित कर दिया, लेकिन सर्वोच्च नेता खामेनेई के दबाव में सैन्य बल तैनात हैं। प्रदर्शनों में कम से कम छह मौतें हो चुकी हैं और दर्जनों गिरफ्तारियां हुई हैं, फिर भी महिलाओं का खामोश विरोध जारी है।
बहरहाल, यह आंदोलन सिर्फ ईरान का नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर इस्लाम के नाम पर थोपी गई कट्टरता के खिलाफ जागृति का प्रतीक है। अरब प्रायद्वीप से इस्लाम फैला, लेकिन अब सऊदी अरब जैसे देशों में महिलाओं को पहले से अधिक स्वतंत्रता मिल रही है, जहां अब पूर्ण बुर्का अनिवार्य नहीं। मध्य एशिया के मुस्लिम बहुल देशों में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। कजाकिस्तान, जहां 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, ने 2025 में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का-नकाब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जुर्माना 10 हजार से एक लाख रुपये तक। ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान ने पहले ही चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर रोक लगा रखी है, ताकि धार्मिक कट्टरपंथ न फैले। कुल 16 से अधिक देशों ने बुर्का या नकाब पर कानूनी पाबंदी लगा दी है। यूरोपीय देशों में स्विट्जरलैंड ने 2021 के जनमत संग्रह में 51.21 प्रतिशत वोटों से 2025 में इसे लागू किया, जबकि फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड, बुल्गारिया, इटली और जर्मनी ने सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने पर जुर्माना या जेल की सजा निर्धारित की। बेल्जियम में मात्र 300 महिलाएं ही बुर्का पहनती थीं, फिर भी 10 लाख मुसलमानों के बीच इसे प्रतिबंधित किया गया।
इसके विपरीत, दक्षिण एशिया में स्थिति उलटी है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत में, जहां इस्लाम स्थानीय रूप से फैला, वहां कट्टरता बढ़ रही है। भारत के बिहार में हाल ही में नियुक्ति पत्र वितरण के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का दुपट्टा हटाने पर विवाद हुआ, जिसके बाद पाकिस्तान तक से विरोध के सुर उठे। बीजेपी नेता हरिभूषण ठाकुर ने कहा कि बुर्का पसंद है तो पाकिस्तान या बांग्लादेश चले जाएं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में महिलाएं दुपट्टा या बुर्का पहनने को धार्मिक अधिकार बताकर प्रदर्शन कर रही हैं, जबकि वहां के सर्वेक्षणों में 60-70 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं इसे स्वैच्छिक बताती हैं, लेकिन कट्टर समूह दबाव बनाते हैं। भारत में कर्नाटक हिजाब विवाद के बाद स्कूल-कॉलेजों में बहस चली, जहां मुस्लिम छात्राओं ने पहनने पर जोर दिया। यह विरोधाभास दर्शाता है कि जहां मूल इस्लामिक केंद्रों में महिलाएं आजादी चाह रही हैं, वहीं यहां आयातित कट्टरता बुर्का को मजबूरी बना रही है।
सऊदी अरब में भी महिलाएं ड्राइविंग और बिना नकाब के घूमने की मांग कर रही हैं। लेकिन दक्षिण एशिया में तस्वीर उलट है। यहां बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत में मुस्लिम महिलाएं उसी हिजाब या बुर्का को धार्मिक फर्ज बताकर प्रदर्शन कर रही हैं। पाकिस्तान में हाल ही में लाहौर और कराची की सड़कों पर महिलाओं ने जुलूस निकाले। वे कह रही हैं कि स्कूलों में हिजाब पहनना उनका संवैधानिक अधिकार है। वहां के सर्वे बताते हैं कि साठ से सत्तर प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं इसे अपनी मर्जी से पहनती हैं। लेकिन कट्टर गुट दबाव बनाते हैं। पड़ोसियों की नजरें, मौलवियों की फतवे और सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग से कई लड़कियां मजबूर हो जाती हैं। बांग्लादेश में ढाका विश्वविद्यालय के परिसरों में छात्राओं ने हिजाब अनिवार्य करने की मांग की। वहां भी तहरीक-ए-तालिबान जैसे संगठन पीछे हैं। महिलाएं कहती हैं कि बिना हिजाब के पढ़ाई नहीं करेंगी। लेकिन गुप्त सर्वेक्षणों में पता चलता है कि आधी से ज्यादा लड़कियां इसे बोझ मानती हैं। फिर भी भीड़ का दबाव उन्हें चुप करा देता है।
भारत में कर्नाटक का हिजाब विवाद तो चरम पर पहुंच गया। उदुपी के कॉलेजों में मुस्लिम छात्राओं ने कक्षा में घुसने से इनकार कर दिया। वे दुपट्टा या हिजाब के बिना परीक्षा नहीं देंगे, ऐसा हंगामा किया। प्रदर्शनकारियों के पीछे जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठन थे। कोर्ट ने फैसला दिया कि यूनिफॉर्म का पालन जरूरी है, लेकिन बहस थम नहीं रही। मंड्या, बीदर जैसे जिलों में स्कूलों के बाहर जुलूस हुए। छात्राओं के माता-पिता भी सड़क पर उतरे। वे चिल्ला रहे थे- हमारी बेटियों का धर्म सुरक्षित रखो। लेकिन सच्चाई यह है कि ग्रामीण इलाकों में कई लड़कियां डर से हिजाब पहनती हैं। पड़ोस के हिंदू-मुस्लिम तनाव में इसे ढाल बना लिया जाता है।
उक्त देशों में यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। जहां दुनिया महिलाओं को सशक्त बना रही है, वहां दक्षिण एशिया में कट्टरता उन्हें पुराने जंजीरों में जकड़ रही। सर्वे बताते हैं कि ज्यादातर महिलाएं स्वतंत्रता चाहती हैं। लेकिन अल्पसंख्यक कट्टर गुट बहुमत को दबा रहे हैं। क्या यह धार्मिकता है या राजनीति? नेताओं को चाहिए कि वे तथ्यों पर ध्यान दें। महिलाओं को चुनाव दें- पहनें या न पहनें। तब सच्ची तस्वीर सामने आएगी। अन्यथा यह आयातित आग स्थानीय संस्कृति को भस्म कर देगी। दक्षिण एशिया की महिलाओं को मूल आजादी मिलनी चाहिए, न कि मजबूरी।
बात ईरान में आए बदलाव की कि जाए तो इसके पीछे गहन कारण हैं। ईरान जैसे देशों में आर्थिक संकट, मुद्रास्फीति और बेरोजगारी ने महिलाओं को जागृत किया, जहां प्रदर्शनों में आजीविका की मांगें भी जुड़ गईं। मुस्लिम बहुल देशों में राष्ट्रीय सुरक्षा को बहाना बनाकर बुर्का प्रतिबंध बढ़ा, क्योंकि चेहरा ढका होना अपराध को आसान बनाता है। वैश्विक स्तर पर 16 देशों के प्रतिबंध से संदेश साफ है कि बुर्का महिलाओं के उत्पीड़न का प्रतीक माना जा रहा। दक्षिण एशिया में कट्टरता का कारण विदेशी धन-सहायता और राजनीतिक उन्माद है, जहां बांग्लादेश-पाकिस्तान में मदरसों से प्रेरित युवतियां बुर्का को पहचान बना रही हैं। ईरानी महिलाओं की बगावत ने दुनिया को दिखाया कि इस्लाम के नाम पर थोपी गई परंपराएं टूट रही हैं। यदि यह लहर फैली, तो कट्टरता वाले क्षेत्रों में भी परिवर्तन अपरिहार्य होगा। आंकड़ों से सिद्ध है कि जहां प्रतिबंध लगे, वहां महिलाओं की भागीदारी 20-30 प्रतिशत बढ़ी है। यह संघर्ष स्वतंत्रता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आजादी की आवाज़ बनाम पहचान की दीवार

























