प्राचीन काल से ही मनुष्य प्रकृति का बहुत ऋणि हैं। प्रकृति ने उसे अनाज,जल,अग्नि और रहने का स्थान आदि दिया है। प्राचीन समय में मनुष्य पेड़ों पर रहता था।फल,कन्द मूल आदि खाते थे।वह पेड़ की पत्तियों और छाल से शरीर को ढका करता था लकड़ियों को जला कर अपने शरीर को गर्मी देता रहा होगा।उसे कुछ लाभदायक पेड़ मिले होंगे तो कुछ कुछ जहरीले पेड़ अवश्य मिले होगे। इस तरह एक तरफ,अवश्यकता पूर्ति ने उसके जीवन मैं उमंग और उत्साह भर दिया और दूसरी तरफ नुकसान देनें वाले पेड़ों से उनके अंदर भय पैदा भी किया होगा। मनुष्यों ने पेड़ों के प्रति देवीदेवताओं का विश्वास उत्पन्न किया l पेड़ पौधे मानव का चिर साथी रहा हैं ऋग्वेद में अनेक मंत्रों में पेड़ों का उल्लेख हुआ है। जहां पेड़ों की स्तुति की गयी है।अवध में वृक्ष पूजन
अथर्ववेद 2/31 32 33 के विषय में अनेक सूक्त प्राप्त है जिससे यह प्राप्त होता हैं कि जहां वट,पीपल आदि वृक्ष होते हैं।वहाँ से व्याधियाँ दूर होती हैं। वट और पीपल वृक्ष इसलिए सदैव हरे भरे रहते हैं क्योंकि उन्हें ईश्वरीय शक्ति प्राप्त होती हैं।आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के अरण्य कांड में विविध वृक्षों और पुष्पों का वर्णन किया है।अवध के लोगों का नहीं वरन प्रत्येक लोक मानव का विश्वास चला आ रहा है कि कि पेड़ ,पौधों में देवी देवताओं का निवास होता है। भगवान श्री कृष्ण ने भी कहा है कि पीपल के पेड़ में मैं निवास करता हूँ।अवध के लोगों में यह लोक विश्वास है कि महा लक्ष्मी आँवले में और दुर्गा जी नीम में निवास करती हैं। पीपल को पवित्र माना जाता है। पीपल के मूल में सृष्टि कर्ता भगवान ब्रह्मा का तने में भगवान विष्णु का,शाखाओं में संहार कर्ता,एकादश रूद्रों का निवास होता हैं ।,पीपल की अराधना से शनि देवता की कुदृष्टि भी शान्त हो जाती है।पीपल,आम,पलाश की लकड़ियों का हवन पूजन में प्रयोग किया जाता है।
लोक विश्वास में केवल पत्थर को ही नहीं वरन वृक्ष भी ग्राम देवता का रूप धारण कर पूजे जाते हैं।अवध के गाँवों में भी वृक्षों का ग्राम देवता में एक महत्वपूर्ण स्थान है।यह भी माना जाता है कि जहां नीम,पीपल,श्रीफल,आँवला,पाकडी ये पाँच पेड़ होते हैं। वहाँ देवताओं का निवास होता हैं। वृक्षों की पूजा महिलाओं में बहुत प्रचलित हैं। वट पूजा से तो सभी परिचित होंगे।ज्येष्ठ की अमावस्या को बरगद की पूजा, सावित्री,सत्यवान की कथा के आधार पर अखंड सौभाग्य के लिए किया जाता है। एक बारहमासी गीत की कुछ पंक्तियों…..
ज्येष्ठ बरसात होय,वट पूजन निकरी सब कोय।वट सावित्री की पूजन के दिन जब महिलायें वट वृक्ष की परिक्रमा करती है।अवध में वट में वासुदेव का निवास में विश्वास करती हुयीं वे गाती है
आई बरगदाही बरगद पुजावे,काटे काचे ही सूत हरदी रंगावौ। बट बाबा फेरे लगवउ आई, बरगदाही बरगद पुजावे। एक फेरा माँगो मैं माँगे के सेन्दुरवा,दूजे माँ चुरिया भर बाँह। तीजें मैं माँगो लाली चुनरिय,चौथे माँ बिछिया जुड़ाव। छठवें में माँगो बाबा गोदी बलकवा,दूध पूत कोखि जुड़ाया । छठवें बाबा नैहर,ससुरा,सातवें मा बाढ़े सुहाग। आई बरगदाही बरगद पुजावे
पीपल बहुत पवित्र वृक्ष माना जाता है। इसको काटना उचित नहीं समझा जाता है। अवध में बहुत से पर्व इस वृक्ष के साथ जुड़े हैं। पीपल में लक्ष्मी निवास माना जाता है। और सोमवती अमावस्या के दिन पूजा होती है और तने पर धारा लपेटा जाता है। किसी अन्य अवसर पर सिन्दूर लगाकर पूजन होता हैं। कहीं-कहींमहिलाएं सन्तान प्राप्ति एवं अखंड सोहाग केलिएके लिए भी पीपल के वृक्ष का व्रत और पूजन करती है और भेंट चढ़ाती है।एक गीत प्रस्तुत है…..
हमारे पिपरिया के हरे-हरे पात,ध्वजा फहराये रहे।ध्वजा…. सोने कै थाला माँ भोजन परोसेउंव,जेवें छैंया मां सब देवथनियां। ध्वजा…. पाँच पचीसी क बीरा लगायेंगे,रचै छैंया म,सब सब देवथनिया।ध्वजा…. फूला नेवारी क सेजा बछायेंउं छैयां म सोवैं सब देथनियां।ध्वजा….
अवध में वृक्ष पूजन
यही नहीं मृतात्मा की तृप्ति के लिए इस विश्वास के साथ कि,उन्हें पानी पीने के लिए मिलता रहे,निश्चित स्थान पर पीपल के पेड़ पर एक पानी का पात्र लटकाया जाता है जिसे घंट कहते हैं।अवध क्षेत्र में तुलसी के बिरवा का भी बहुत महत्व है। प्राय: यह पूजा हर घर में होती हैं।नहा धोकर तुलसी के पौधे पर सभी जल अवश्य चढ़ाते हैं।कार्तिक मास में कार्तिक पूर्णिमा के दिन तुलसी की पूजा की जाती हैं।और तुलसी विवाह बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। पूजा,आरती के साथ गीत गा या जाता है…..
तू ठाकुर की सदा पियारी, तुलसी आरती करौं तिहारी । तुलसी महरानी नमौ-नमौ, विस्नू की रानी नमौ-नमौ। माटी कै चउरा प गोबर लिपाव सेंदुर,सथिया धराये। आरति करें कपूर की बाती,फूल बतासा चढ़ाय । तुलसी…
इस क्षेत्र में जब स्त्री के पुत्र के आगमन का समय निकटतम होता है,तब स्त्रियों सोहर गीत के माध्यम से बारह मास का वर्णन करती है और बच्चे के आगमन की प्रार्थना किसी विशेष माह में करती है। ताकि उसके धार्मिक अनुष्ठानों में बाधा न पड़े। यह विशेष अनुष्ठान तुलसी की पूजा ही है।
ये रतनारे होरिलवा कार्तिक जिन जन्मेंउ। सब सखि पूजैं रे तुलसिया, हम पूजन कैसै जाई।
एक गीत में एक गृहस्थ के घर की व्याख्या की गई है, जिसके आँगन में तुलसी के बिरवा की विशेषता है ।
द्वारेन द्वारे बरूवा फिरै बिखरी पूछै बवाड की हो। द्वारेन उनके है कुइंयां भीति चित्र उरेही हो। आँगन तुलसी क बिरवा वेदन झनकारीं है हो।समवन बैठे बाबा तुम्हारे बैठे पुरवै जनेउवा हो।
एक गीत में एक भक्त भगवान की पूजा की तैयारी में हैं और यह इच्छा रखता है कि आँगन में तुलसी का बिरवा अवश्य लगे।चन्दन क पेड़ तुलसी का बिरवा दोनों लग जांय मोरे अंगना।तुलसी की प्रशंसा में अनेक गीत गाए गये हैं।भक्त अपने आँगन में तुलसी फली फूली देख कर प्रसन्न होता है यथा छोटी मोटी तुलसी गछिया लम्बी-लम्बी पतियां फरे,फूले तुलसी सुहावन रे।
अवध क्षेत्र में कार्तिक माह में नौमी के दिन,आंवला नौमी के अवसर पर,आँवले के पेड़ की बड़े धूमधाम से पूजा होती हैं। आँवले के पेड़ के नीचे खाना बनाया जाता है और खाया भी जाता है। यह मान्यता है कि जब पेड़ के नीचे खाना बनाया जाता है तब चूल्हे से लकड़ी के जलने से धुवाँ भी निकलता तब उसके धुंवे से पेड़ में लगे नुक़सान देने वाले कीड़े मकोड़े मर जाते है। और फल बड़े -बड़े निकलते हैं। पहले पर्यावरण का नाम लिए बिना पेड़ों ,पौधों की सुरक्षा की जाती थी।उनसे स्वास्थ्य लाभ उठाया जाता था। पीपल,नीम,आँवला,वरगद चंदन आदि के बृक्ष बहुतायत में देखने को मिलते थे। स्वस्थ समाज के लिए पेड़ पौधों को लगाने की हमें अपने लोक विश्वास और साहित्य की ओर ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है। अवध में वृक्ष पूजन
मुख्य सचिव ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के फेज-2 के अंतर्गत 06 स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय की अद्यतन प्रगति एवं ट्रामा व इमरजेन्सी मेडिकल सुविधाओं...