
डॉ.सत्यवान सौरभ
नन्हे बच्चे मैदान आए,खेलने का मन बनाए।
हाथ में बैट, गेंद भी लाल,खेल लगे सबको कमाल।
अंकल पास खड़े मुस्काएँ,“शाबाश!” कहकर हौसला बढ़ाएँ।
खेल-खेल में सीखें हम,मिलकर आगे बढ़ते हम।
हार-जीत की चिंता छोड़,दोस्ती से जुड़े हर मोड़।
हँसता-खेलता बचपन प्यारा,सबसे सुंदर जग में सारा।























