राजनीति के चाणक्य शिवपाल सिंह यादव

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शिवपाल यादव: सत्ता,संघर्ष और स्वाभिमान की राजनीति
शिवपाल यादव: सत्ता,संघर्ष और स्वाभिमान की राजनीति
वागीश यादव

राजनीति के चाणक्य शिवपाल सिंह यादव उत्तर प्रदेश की राजनीति में उस अनुभवी रणनीतिकार का नाम हैं, जो शोर नहीं मचाते बल्कि चाल चलते हैं। समाजवादी आंदोलन को गांव-गांव तक खड़ा करने में उनकी संगठनात्मक क्षमता, सत्ता के उतार-चढ़ाव में संतुलन साधने की कला और समय से पहले हालात भांप लेने की राजनीतिक समझ उन्हें अलग पहचान देती है। संघर्ष, अपमान और उपेक्षा के दौर से गुजरते हुए भी शिवपाल सिंह यादव ने धैर्य नहीं खोया, बल्कि हर बार नई रणनीति के साथ लौटे। यही वजह है कि वे भले ही मंच की राजनीति में कम दिखें, लेकिन उत्तर प्रदेश की सत्ता की बिसात पर उनकी हर चाल दूर तक असर छोड़ती है।

शिवपाल यादव आज समाजवादी आंदोलन की जीवित स्मृति हैं। संगठनात्मक राजनीति के स्कूल हैं और उस पीढ़ी के नेता हैं जो सत्ता से ज्यादा संघर्ष में तपे। उनका जीवन बताता है कि राजनीति में हर लड़ाई मंच पर नहीं लड़ी जाती, कुछ लड़ाइयाँ चुप रहकर भी जीती जाती हैं। शिवपाल यादव ने केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि स्वाभिमान के लिए राजनीति करते हैं। राजनीति में सम्मान भी उतना ही जरूरी है जितनी सत्ता। उनका कहना है कि अनुभव को नजरअंदाज करना आसान नहीं होता।शिवपाल यादव की कहानी युवा पीढ़ी को यह सिखाती है कि- राजनीति केवल जीतने का खेल नहीं, टिके रहने की कला भी है। वे नायक हैं या नहीं, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में वे एक अपरिहार्य अध्याय हैं। जिसे नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक विश्लेषण के लिए अधूरापन होगा। राजनीति के चाणक्य शिवपाल सिंह यादव

शिवपाल सिंह यादव का जीवन केवल राजनीतिक पदों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष की गाथा है जिसमें छाया में रहकर सत्ता गढ़ी जाती है और रोशनी किसी और के हिस्से जाती है। इटावा के सैफई गांव से निकला यह नेता सुविधा नहीं, संगठन और टकराव की राजनीति से गढ़ा गया। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो मंच पर कम, लेकिन मंच के पीछे सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं। शिवपाल सिंह यादव उन्हीं नेताओं में से एक हैं। वे न तो अचानक उभरे, न ही सत्ता उन्हें विरासत में सहजता से मिली। उनका राजनीतिक जीवन संघर्ष, संगठन, टकराव और आत्मसम्मान की लंबी यात्रा है। शिवपाल यादव की राजनीति केवल पदों की कहानी नहीं, बल्कि उस जमीनी नेता की गाथा है जिसने साइकिल चलाने वाले कार्यकर्ता से लेकर सत्ता के सबसे मजबूत स्तंभ बनने तक का सफर तय किया।

16 जनवरी 1955 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई गांव में जन्मे शिवपाल यादव, समाजवादी विचारधारा की प्रयोगशाला कहे जाने वाले परिवार से आते हैं। लेकिन यह भ्रम होगा कि उन्हें सब कुछ थाली में परोस कर मिला। जब उनके बड़े भाई मुलायम सिंह यादव राजनीति में संघर्ष कर रहे थे, तब शिवपाल यादव संगठन खड़ा करने में जुटे थे। छात्र राजनीति से लेकर पंचायत स्तर तक, उन्होंने हर मोर्चे पर जमीन तैयार की। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर कोई नेता है जिसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया और सबसे कम श्रेय दिया गया, तो वह नाम है—शिवपाल सिंह यादव। वे नायक नहीं बनाए गए, लेकिन हर निर्णायक मोड़ पर उन्हीं से काम लिया गया। जब पार्टी को संगठन चाहिए था—शिवपाल थे। जब सरकार को सख्ती चाहिए थी तो शिवपाल यादव थे। और जब सत्ता को उत्तराधिकारी चाहिए था—तब शिवपाल यादव को किनारे कर दिया गया।

संगठन के शिल्पकार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी समाजवादियों का जिक्र किया जाएगा,तब-तब शिवपाल सिंह यादव को भी याद किए जाएगा। स्व. मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल यादव ने भी राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल किया है। कभी स्व.मुलायम सिंह यादव (नेताजी) की सुरक्षा संभालने वाले शिवपाल सिंह यादव को समाजवादी पार्टी को शिखर पर पहुंचाने का श्रेय दिया जाता है। शिवपाल यादव को उत्तर प्रदेश की राजनीति का चाणक्य भी कहा जाता है। उन्होंने सपा को आगे ले जाने के लिए काफी मेहनत की है।

समाजवादी पार्टी के भीतर शिवपाल यादव को लंबे समय तक “संगठन का वास्तुकार” कहा गया। शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी के भीतर संगठन के शिल्पकार रहे हैं। जिला इकाइयों से लेकर बूथ स्तर तक जिस ढांचे ने पार्टी को चुनाव जिताए, उसकी नींव उन्होंने रखी। उम्मीदवारों की सामाजिक गणित, कार्यकर्ताओं की निष्ठा और सत्ता-संतुलन की समझ—यह सब शिवपाल की राजनीतिक पूंजी रही। वे जानते थे— किस जिले में कौन मजबूत है। किस जातीय समीकरण से चुनाव जीता जा सकता है। कौन कार्यकर्ता निष्ठावान है और कौन अवसरवादी। जब-जब पार्टी संकट में आई, शिवपाल यादव संगठन के जरिए उसे संभालते रहे।यही कारण है कि सत्ता के नए केंद्रों के लिए वे हमेशा असहज रहे, क्योंकि संगठन बनाने वाला नेता सत्ता का सबसे बड़ा दावेदार भी होता है।

शिवपाल सिंह यादव ने कभी नेताजी की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभलकर उनकी राजनीतिक राह आसान बनाई थी। असल में 1967 में जब नेताजी ने जसवंतनगर से विधासभा चुनाव जीता, तो मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक विरोधियों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी। ऐसे में विरोधियों ने मुलायम सिंह पर कई बार जानलेवा हमला भी कराया। इसका जिक्र शिवपाल सिंह यादव ने अपनी किताब लोहिया के लेनिन ने भी किया है। शिवपाल यादव ने लिखा है कि ‘नेता जी जब भी इटावा आते, मैं अपने साथियों के साथ खड़ा रहता। हम लोगों को काफी सतर्क रहना पड़ता, कई रातें जगाना पड़ता था। चुनाव में भले ही नेताजी लड़ते थे लेकिन उसके पीछे की रणनीति शिवपाल सिंह यादव की ही होती थी। चुनाव के दौरान मधु लिमये, बाबू कपिलदेव, चौधरी चरण सिंह, जनेश्वर मिश्र जैसे बड़े नेताओं के फोन आने और उनकी सभा करवाने की जिम्मेदारी भी शिवपाल यादव के कंधे पर होती थी।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष स्व.रामशरण दास का स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा था। लिहाजा शिवपाल सिंह यादव को 01 नवंबर 2007 को मेरठ अधिवेशन में सपा का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया। रामशरण दास के निधन के बाद वह 6 जनवरी 2009 को समाजवादी पार्टी के पूर्णकालिक प्रदेश अध्यक्ष बने। इस दौरान उन्होंने सपा को शिखर तक पहुंचाया। वह मई 2009 तक प्रदेश अध्यक्ष रहे। शिवपाल सिंह यादव बसपा की मायावती सरकार में नेता विरोधी दल की भूमिका में भी रहे थे।

समाजवादी पार्टी की असली मशीनरी लंबे समय तक शिवपाल यादव के हाथ में रही। मुलायम सिंह यादव मंच पर थे,अखिलेश यादव पोस्टर पर लेकिन जमीन पर चुनाव जिताने वाला ढांचा शिवपाल ने खड़ा किया। यह राजनीति का कड़वा सच है कि—जो संगठन बनाता है, वही सबसे पहले असुविधाजनक बनता है। जो दिखते कम हैं, लेकिन असर सबसे ज़्यादा रखते हैं। रणनीति में चाणक्य,संघर्ष में योद्धा,राजनीति का सबसे सधा हुआ खिलाड़ी उत्तर प्रदेश की राजनीति में यदि किसी नेता को रणनीति, संगठन और सत्ता-संतुलन की गहरी समझ के लिए जाना जाता है, तो वह नाम है शिवपाल सिंह यादव। वर्षों तक समाजवादी आंदोलन की जड़ों को मजबूत करने वाले शिवपाल, भले ही सुर्खियों से दूर रहे हों, लेकिन हर बड़े राजनीतिक मोड़ पर उनकी भूमिका निर्णायक रही है। राजनीति के चाणक्य शिवपाल सिंह यादव