Tuesday, February 24, 2026
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धर्म के जाल में फसी राजनीति…

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जंग के पहले विपक्ष ने मानी हार...?
जंग के पहले विपक्ष ने मानी हार...?


धर्म के जाल में फसी राजनीति ज्वलंत मुद्दों से कर रहीं परहेज।अहमियत इस बात की है कि मुद्दे कौन से होगे इस बार लोकसभा के चुनाव में… ?

विनोद यादव
विनोद यादव

राजनीति का धर्म होना चाहिए न की धर्म की राजनीति आज मुद्दों की राजनीति हो या चाहे राजनीति का मुद्दा हो,आमजन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होता ही है।अहमियत इस बात की है कि मुद्दे कौन से होगे इस बार लोकसभा के चुनाव में….? क्या शिक्षा ,चिकित्सा ,बढ़ती महगाई , बेरोजगारी और निजीकरण का मुद्दा होगा या सिर्फ मंदिर ,मस्जिद और जातिवाद का…? चुनाव में जिन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए उसको छोड़कर धार्मिक कट्टरता के साथ विपक्ष को नस्तोनाबूत करने का मुद्दा जो सत्ता पक्ष के द्वारा लगातार चल या खेला जा रहा हैं। उस पर भी आम जनता अपनी नजर लगाए हुए हैं शायद सत्ता में बैठे लोगों को इस बात का गुमान रहता हैं कि जनता के टैक्स के पैसे से सदन में बैठकर मलाई खाने वाले सफेदपोश नेता उसको देख नहीं रहें हैं ये उनकी भूल हैं।

शायद उन्हें नहीं पता जनता सब जानती हैं झूठा भाषण और फ्री के राशन में बेशक उलझी हो लेकिन अपने जुनूनी मुद्दों को भलीभांति जानती हैं। आज जो चर्चा हो रहीं है वह असल में किन बातों पर हो रहीं उसे कोई नेता नहीं बताना चाहता । चाहें एनडीए हो या विपक्षियों द्वारा दिया गया नया गठबंधन नाम इंडिया हो। हमने पिछले कुछ वर्षों से देखा कि राजनीति की परिभाषा बदल सी गई है। स्वार्थ की राजनीति, जातिगत राजनीति, धर्म की राजनीति, भीड़ की राजनीति,नारेबाजी, बयान बाजी,जुम्लेबाजी ,फर्जी चौकदारी , अपने चहेतों को देखते हुए लाभ पहुचाने की राजनीति चली आ रहीं हैं ।

आज ये सब मुद्दे जो असल राजनीति से परे हैं और प्रभाव में आए हैं उसका जन सरोकार से कोई लाभ होने वाला नहीं हैं । जनकल्याण के नाम पर बस इतना काम करवा दिया जाता है कि अगले चुनाव में वोट मांगते समय काम गिनवा सकें। बाते करते हैं लाख टका की काम एक भी नहीं शायद सभी लोगों का पेट मंदिरों से जैसे भरने वाला हो सत्तर साल में जो नहीं हुआ ओ अब हो रहा हैं। न गरीब हवाई चप्पल छोडकर हवाई जहाज में पहुचा न विकास गोदी से उतरकर नव साल बेमिसाल में खेला और न ही स्मार्ट सिटी बनी न बुलेट ट्रेन दौडी खैर जुबानी ट्रेने हर चुनाव के भाषणों में मंचों से जरूर दौड़ जाती हैं पांच रुपये का मिलने वाला प्लेटफार्म टिकट शायद इसीलिए 50 रुपए का हो गया। मजे की बात यह है कि जनता तालियां बजाकर उनके कारनामों का स्वागत भी करती है।

धर्म और नैतिकता पर मैकियावेली के विचार

मैकियावेली ने राजनीति को धर्म और नैतिकता से अलग किया। आधुनिक युग का आरंभ करने वाले पुनर्जागरण के प्रतिनिधि के रूप में वही सबसे पहला विचारक था, जिसने ऐसा किया। हम लोग धर्म और नैतिकता के संबंध में उसके विचारों को देखते हुए यह समझने का प्रयास करेंगे कि किस तरह धर्म और नैतिकता राजनीति से अलग और पृथक बताई गई है। मैक्यावेली ने धर्म को राज्य की लक्ष्य सिद्धि के एक साधन के रूप में स्वीकार किया है, उसके अनुसार धर्म राज्य से श्रेष्ठ नहीं, बल्कि राज्य के नियंत्रण के अधीन है। उसने चर्च को राज्य का अंग कहा और शासन को यह सलाह दी कि वरदान को माध्यम बनाकर अपनी संगठन और नियंत्रण शक्ति में वृद्धि कर सकता है। उसने विचार व्यक्त किया है कि शासक को धार्मिक सिद्धांतों और विश्वास हम के सत्यासत्य से प्रयोजन नहीं रखना चाहिए। सांसो के धार्मिक सिद्धांतों का प्रचार करके सभी व्यक्तियों को एकता सूत्र में बांध सकता है। धर्म एक साधन मात्र है साथ ही नहीं।

अक्सर संपूर्ण व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर खेल सुविधा और उत्तम चिकित्सा सेवा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे भुला दिए जाते हैं। असल में हाशिए पर रहने वाला समाज दलित ,पिछड़ा एंव आदिवासी तबका एंव गांव देहात क्षेत्र की आम जनता को इन मूलभूत आवश्यकताओं की बहुत जरूरत है। मूलभूत ढांचे में सुधारात्मक व उपचारात्मक विश्लेषण की नितांत आवश्यकता है।लेकिन कार्पोरेट घरानों की मीडिया और इन नेताओं ने कभी जनता के प्रति न भरोसा जता पाया और न ही थोड़ी हिम्मत जुटा पायी सिर्फ छल और परपंच कर झूठे भाषणों का प्रलोभन दिखा कर जनता को ठगने का काम किए और कर रहें हैं।अगर सकारात्मक बदलाव की सोच होती तो देश का पैसा लेकर विदेश भगने वाले भगोडो़ को सरकार वापस लाती और जनता के लिए रोजगार के अवसर के द्वार खोलती लेकिन ऐसा करे कौन।

इसलिए जरूरी हैं आम जनता को भी मौजूदा चुनाव में पार्टियों का घोषणा पत्र हाथ में लेकर रखें और फसली नेताओं से बिंदुवार सवाल करें तभी अपने मताधिकार का असली मूल्य पायेगी। अहिंसा के पुजारी गांधी जी कहा करते थे सच उन्हें राजनीति में घसीट लाया ,बैरिस्टर गांधी से तन में लिपटी एक धोती में गांधी के स्वरूप को जब लोगों ने देखा तब लोगों का भरोसा कायम हुआ की करोड़ों का सूट पहनने वाला व्यक्ति न जनता का हितैषी हैं न देश एंव समाज का शायद आज प्रसांगिक भी हैं। हम धर्म ,जाति ,अवसरवादिता और झूठ की राजनीति करते करते हम गांधी से कितनी दूर निकल आये है शायद आज के सफेदपोश नहीं समझ पा रहें हैं।आश्चर्य होता है कि इस देश में मुद्दों पर आधारित नैतिक मूल्यों वाली राजनीति कभी हो पाएगी या नहीं ।

क्या We the people of India कभी मुख्य धारा में आएगा…? संविधान की प्रस्तावना और मूल अधिकार कभी मूर्त रूप ले सकेंगे। आखिर हम बढ़ किस ओर रहे है जबतक हम ये सभी सवाल खुद से नहीं करेगें शायद ही उसकी जबाबदेही कोई बने और जबाब दे। जब से चुनावी राजनीति को समझने की थोड़ी बहुत समझ विकसित हुई है, तब से लेकर आजतक जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें से सबसे बेहतर बीता बिहार का विधानसभ रहा है। जो जाति, धर्म और साम्प्रदायिकता से हटकर पूरी तरह से रोजगार और शिक्षा के मुद्दों पर लड़ा जा रहा था जो कि भारतीय राजनीति के लिए एक शुभ संकेत थें। खैर जहां तक लगता हैं कि राजनैतिक दल उन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ते हैं जिन मुद्दों को जनता पसन्द करती है क्योंकि उन्हें वोट जनता से लेना है न कि अपने कार्यकर्ताओं से।

अब यह जनता पर निर्भर करता है कि वो राजनीतिक पार्टियों द्वारा संचालित हिंदू – मुस्लिम के मुद्दों पर उलझ जाते हैं या अपनी हित के मुद्दों पर राजनैतिक पार्टियों पर आने को विवश करते हैं। इस चुनाव में कोई भी पार्टी जीते,यह जीत एक संविधान पसंद जनता की होगी जो नफरत की राजनीति को नकारते हुए संविधान बचाओ लडाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान देगे ,शायद यह जीत लोकतंत्र की ताकत को बढ़ाने वाली होगी। यदि किये गये वादों पर जरा भी बनने वाली नयी सरकार खरी उतरेगी तो यह उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। इस वादे को पूरा कराने के लिए जनता को भी सजग रहना होगा जब भी लगे कि सरकार अपने वादे से मुकर रही है उसी समय कड़ा विरोध प्रदर्शन करके सरकार के दिल में यह दहशत पैदा करना होगा कि दोबारा सत्ता में आने का एक ही रास्ता बचा रहें जो जनता के साथ जुम्लेबाजी करेगा वह कुर्सी पर बैठने का कोई हकदार नहीं होगा शायद यह लोकतंत्र की खूबसूरती भी हैं।

धर्म की सत्ता और राजसत्ता के चरित्र को बेनकाब करने वाले और मानवता के महान पक्षपोषक राहुल सांकृत्यायन के विचार वर्तमान राजनीति के लिए उल्लेखनीय रहेगें, जब धर्म निरपेक्ष राष्ट्र की राष्ट्रीय राजनीति में अमानवीय धर्म केन्द्रीय भूमिका निभाने लगे, साम्प्रदायिक शक्तियां नंगी नाचने लगे, फासीवादी शक्तियां लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा भंग करने लगे, विपक्ष गूंगा और निष्क्रिय हो जाये, तो ऐसी स्थिति राष्ट्र के लिए अंधकार युग है ।जब संसद में बेरोजगारी, शिक्षा, चिकित्सा, किसानों की आत्महत्या, देश के संसाधनों की नीलामी- जैसे ज्वलंत मुद्दों पर बहस न हो, तो संसद औचित्यहीन हो जाता है।