साज़िश है मोहन भागवत का बयान-लौटनराम निषाद

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साज़िश है मोहन भागवत का बयान-लौटनराम निषाद

मोहन भागवत का कथन सत्य: वर्ण-जाति व्यवस्था ईश्वर ने नहीं ब्राह्मणों ने बनाई है। शुद्रवाद की आवाज़ को कमजोर करने की साज़िश है मोहन भागवत का बयान।


लखनऊ। यह सच है कि इस देश में ईश्वर की आड़ लेकर ब्राह्मणों ने धर्म और धर्मग्रंथों के नाम पर वर्णव्यवस्था,जाति व्यवस्था व सामाजिक स्तरीकरण आदि सारी गंदगी फैलायी है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हिंदू धर्म के स्वघोषित सबसे बड़े पैरोकार और संरक्षक हैं, उनकी बात को सच मानते हुए उन धर्म ग्रंथों से हिंदुओं को पिंड छुड़ा लेना चाहिए जो धूर्त ब्राह्मणों ने ईश्वर के नाम पर रची है।भारतीय ओबीसी महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ.लौटनराम निषाद ने मोहन भागवत के कथन को शत प्रतिशत सत्य बताते हुए कहा कि यह बयान शूद्रवाद की आवाज़ को कमजोर करने की बहुत बड़ी संघीय साज़िश है

लौटनराम निषाद
लौटनराम निषाद


निषाद ने कहा कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था का वर्चस्व कायम करने के लिए सबसे पहले चार वेद आते हैं, जिन्हें धूर्त ब्राह्मणों ने ईश्वर की वाणी कहा है। इन्हीं वेदों में ब्रह्मा के मुंह से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जांघ से वैश्य और पैरों से शूद्र की पैदाइश बताई गई है।धर्म की दुकान चलाने वालों के अनुसार ब्रह्मा ईश्वर हैं। वे कभी अपने अलग-अलग अंगों से इंसान नहीं पैदा कर सकते हैं। यह ब्राह्मणों की बहुत ही अश्लील और गंदी कल्पना हैं।ऐसी कल्पना करके ब्राह्मणों ने ईश्वर को भी अश्लील और गंदे रूप में प्रस्तुत किया है।ब्राह्मणों ने अठारह पुराणों में ईश्वर और देवी- देवताओं से बहुत सारे नीच, गंदे और अश्लील काम कराए हैं।कोई भी ईश्वर ऐसा काम नहीं कर सकता है। इन पुराणों में सारी गंदगी धूर्त व मक्कार किस्म के ब्राह्मणों ने फैलाई है।स्मृतियों (मनुस्मृति,विष्णु स्मृति,व्यासस्मृति, नारदस्मृति ) की रचना करते हुए भी ब्राह्मणों ने ईश्वर का सहारा लिया है। वर्ण-जाति और ब्राह्मणों के श्रेष्ठता के पक्ष में सारी नीचता, अश्लीलता और गंदगी की हदें पार कर दी हैं।

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निषाद ने कहा कि ब्राह्मणों ने कृष्ण के नाम पर गीता रचकर, उनके मुंह से वर्ण-जाति व्यवस्था की तारीफ काराई है और अपनी श्रेष्ठता को स्थापित किया है।अगर “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् गुणकर्म विभागश:” को श्रीकृष्ण की ही वाणी माना जाय तो वर्तमान में जन्मना वर्ण व जाति को क्यों माना जा रहा?कोई तथाकथित शूद्र शंकराचार्य, पीठाधीश्वर,महन्त, जगतगुरु क्यों नहीं? “जन्मना जयते शूद्र:संस्कारात् द्विज उच्यते,वेदाध्यायी भवेत विप्र ब्रह्म जानेति ब्राह्मण” को आधार क्यों नहीं माना जा रहा?उन्होंने मोहन भागवत से सवाल किया है कि अभी तक आरएसएस का सरसंघचालक कोई ओबीसी,एससी, एसटी को नहीं बन पाया?


निषाद ने कहा कि जातिवाद की जड़ को मजबूत करने के लिए तुलसीदास दूबे ने रामचरित मानस में राम (ईश्वर) से बहुत सारी नीचतापूर्ण बातें कहलवाईं और उनसे बहुत सारे नीचतापूर्ण और गंदे काम करवाए। जैसे तुलसी ने उन्हें ब्राह्मणों का चरण धुला पानी पिला दिया। तुलसी ने उनसे 12 साल की उम्र में ही एक स्त्री और उसके परिवार वालों की हत्या करा दिया।ऐसे बहुत सारे अन्य काम इस देश में ईश्वर और धर्म के नाम पर ब्राह्मणों ने बहुत सारी गंदगी फैलाई है और बहुत सारे धर्मग्रंथों की रचना की है, जिनमें ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठ और अन्य लोगों को नीच ठहराया गया है।मनुस्मृति में तो जातिवाद की हदें पार कर दी गयी हैं।

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