

“मनुष्य” जल-जन-जमीन-जगत-जंतु-जानवरों का बना भस्मासुर। मनुष्य विकास की दौड़ में वही मनुष्य आज जल, जन, जमीन, जगत और जंतु–जानवरों के लिए भस्मासुर बनता जा रहा है। जिस प्रकृति ने उसे जीवन दिया, उसी प्रकृति का वह सबसे बड़ा शोषक बन बैठा है। नदियाँ सूख रही हैं, जंगल कट रहे हैं, जीव-जंतु विलुप्ति की कगार पर हैं और धरती कराह रही है। सवाल यह है—क्या मनुष्य अपनी विनाशक प्रवृत्ति पर समय रहते लगाम लगाएगा, या विकास के नाम पर सब कुछ भस्म कर देगा..?
आज मानव-समाज प्रगति के नाम पर प्रकृति का ऐसा विनाश कर रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए विनाशकारी परिणाम छोड़ रहा है। जंगल, पहाड़ और खनिज-ये पृथ्वी के मूल स्तंभ हैं, जिनके अस्तित्व पर मनुष्य की स्वार्थी नजर ने भारी दोहन किया है। परिणामस्वरूप जानवर अपनी प्राकृतिक आवास खो रहे हैं, अस्तित्व संघर्ष कर रहे हैं और कई प्रजातियाँ धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर जा रही हैं।
विश्व स्तर पर जंगलों का विनाश निरंतर बढ़ रहा है। उष्णकटिबंधीय जंगलों का न सिर्फ़ बड़े पैमाने पर कटान हो रहा है, बल्कि उनके पर्यावरणीय कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। 2023 में अकेले लगभग 37 लाख हेक्टेयर उष्णकटिबंधीय जंगल नष्ट हो गए-जो आकार में लगभग भूटान के बराबर है। विश्व की कुल भूमि का लगभग 31% हिस्सा जंगलों से ढका हुआ है, लेकिन पिछले दशकों में हमने लगभग 178 मिलियन हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र गंवा दिया है- लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर प्रतिवर्ष। इस विनाश से रहने योग्य आवास, जैव वैविध्य और जलवायु संतुलन प्रभावित हो रहे हैं।
भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। 2015 से 2020 तक भारत ने लगभग 6,68,400 हेक्टेयर जंगल खो दिया-यह आंकड़ा दुनिया में ब्राज़ील के बाद दूसरा सबसे बड़ा है। खनिज और धातुओं के बढ़ते दोहन के कारण जंगलों को नष्ट करने की प्रक्रिया और तेज़ हो गई है। 2001 से 2020 के बीच वैश्विक स्तर पर खनन से लगभग 1.4 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हुआ-जो लगभग डेनमार्क के एक-तिहाई क्षेत्र के बराबर है।
इनमें से लगभग 450,000 हेक्टेयर प्राथमिक उष्णकटिबंधीय वर्षावन में, लगभग 150,000 हेक्टेयर संरक्षित क्षेत्रों में और लगभग 260,000 हेक्टेयर आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों की जमीन पर था।वन्यजीव और जैव विविधता इन जंगलों पर निर्भर हैं-वहीं जंगल कटने से उनकी संख्याएँ तीव्रता से गिर रही हैं। वैश्विक स्तर पर लगभग 50,000 प्रजातियाँ प्रतिवर्ष विलुप्ति के कगार पर पहुँच रही हैं, और अनुमान है कि अगर यह गति जारी रही तो लगभग 28,000 से अधिक प्रजातियाँ आने वाले 25 वर्षों में विलुप्त हो सकती हैं। भारत में भी औपचारिक वैज्ञानिक जाँच से पता चला है कि जंगली प्रक्षेत्रीय वन व जन्तुओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों में लगभग 25% घट गई है, जिसका मुख्य कारण जंगलों का सिकुड़ना और मानव-वन्यजीव संघर्ष है।
इस विनाश की प्रक्रिया में इंसान स्वयं ही अपने लालच के लिए जंगलों और संसाधनों का दोहन करता है-पेड़ काटता है, पहाड़ खोदता है, खनिज निकालता है। लेकिन यह सब प्राकृतिक संतुलन को बुरी तरह बिगाड़ रहा है। वन्यजीव अपने रहवास खोते हैं, भोजन के लिए संघर्ष करते हैं, और धीरे-धीरे मानव बस्तियों की ओर आते हुए संघर्ष की स्थिति में फँस जाते हैं-जिससे उनके जीवन पर और भी बड़ा ख़तरा पैदा होता है। आज की तस्वीर स्पष्ट है-हम जिस धरती को अपनी माँ कहते हैं, उसी को अपने स्वार्थ की भेंट चढ़ा रहे हैं। जंगलों का विनाश, खनिजों की निकासी और जानवरों का बेघर होना केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि मानवता और सभ्यता के अस्तित्व पर एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। आज पृथ्वी पर सबसे बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन या प्राकृतिक आपदाएँ नहीं, बल्कि मनुष्य की वह मानसिकता है जिसने उसे संवेदनहीन और स्वार्थांध बना दिया है। यह विडंबना ही है कि स्वयं को सबसे बुद्धिमान प्राणी मानने वाला मनुष्य आज ऐसा व्यवहार कर रहा है, जो पशुता को भी पीछे छोड़ देता है।

जंगल कटे..चीख़ उठी धरती, पहाड़ों ने आँसू बहाए।
बेघर हो गए मूक प्राणी,उनकी विपदा कौन सुन पाए।
उनके घरों को तुने लिया हड़प,लानत है तुझे लोभी मानुष।
जब पशु रोए इस धरा पर, शर्मसार हुआ होना तेरा मानव।
वैज्ञानिक तथ्य स्पष्ट हैं- इस धरती पर मनुष्य से पहले जानवरों का अस्तित्व था। जंगल, पर्वत, नदियाँ और खुले आकाश पर उनका पहला अधिकार था। मनुष्य बाद में आया, किंतु आते ही उसने स्वयं को स्वामी और अन्य सभी जीवों को मात्र संसाधन मान लिया। यही सोच आज इस ग्रह को विनाश की ओर ले जा रही है।
विकास और प्रगति के नाम पर जंगलों का अंधाधुंध कटान किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप जानवरों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं और वे भोजन व आश्रय की तलाश में मानव बस्तियों की ओर आने को विवश हैं। विडंबना यह है कि जिस संकट को मनुष्य ने स्वयं जन्म दिया, उसी के लिए वह जानवरों को दोषी ठहराने लगता है। कभी उन्हें ‘खतरा’ कहा जाता है, तो कभी ‘आतंकी’। आज हाथी रेल पटरियों पर मारे जा रहे हैं, पक्षी मोबाइल टावरों और प्रदूषण का शिकार बन रहे हैं, समुद्री जीव प्लास्टिक निगलने को मजबूर हैं। जानवर अपने ही घर में बेघर और असहाय बना दिए गए हैं। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि नैतिक पतन का स्पष्ट प्रमाण है।
मनुष्य और जानवर के व्यवहार की तुलना की जाए तो अंतर और भी स्पष्ट हो जाता है। जानवर अपनी आवश्यकता भर शिकार करता है, जबकि मनुष्य लालच और संग्रह के लिए प्रकृति का दोहन करता है। जानवर संतुलन बनाए रखता है, मनुष्य उसे नष्ट करता है। फिर भी मनुष्य स्वयं को सभ्य और जानवर को असभ्य कहता है-यह आत्ममुग्धता ही सबसे बड़ा खतरा है।
भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षियों को केवल जीव नहीं, बल्कि सहचर और पूज्य के रूप में देखा गया है। नंदी, गरुड़, नाग और वानर जैसे प्रतीक इस बात के साक्ष्य हैं कि हमारी परंपरा सहअस्तित्व पर आधारित रही है। किंतु आधुनिक मनुष्य ने सुविधा और उपभोग को ही अपना धर्म बना लिया है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करें। सच्चा विकास वही है जिसमें मनुष्य के साथ-साथ अन्य जीवों का भी जीवन सुरक्षित रहे। करुणा कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सर्वोच्च बुद्धिमत्ता है। यदि मनुष्य ने समय रहते अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियाँ यह कहने को विवश होंगी कि पृथ्वी पर सबसे खतरनाक प्राणी कोई और नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य था।
समस्या केवल प्रकृति विनाश का नहीं, बल्कि चेतना का भी है-जब तक हम प्रकृति को अपना नहीं मानेंगे, यह विनाश जारी रहेगा और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इसके गंभीर परिणाम भुगतेंगी। विकास का अर्थ विनाश नहीं हो सकता। करुणा ही वास्तविक बुद्धिमत्ता है। जब तक मनुष्य जानवरों को अपने बराबर का जीवन नहीं मानेगा, तब तक वह स्वयं भी पूर्ण मनुष्य नहीं बन पाएगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपने भीतर झाँके और यह प्रश्न पूछे-क्या मैं सचमुच मनुष्य हूँ, या केवल एक ऐसा जानवर जिसने बोलना और निर्माण करना सीख लिया है, पर संवेदना खो दी है?जिस दिन मनुष्य जानवरों के दर्द को अपना दर्द समझेगा, उसी दिन वह पुनः मनुष्य कहलाने योग्य होगा। अन्यथा इतिहास यही लिखेगा कि पृथ्वी पर सबसे खतरनाक जीव कोई और नहीं, बल्कि मनुष्य स्वयं था। “मनुष्य”जल-जन-जमीन-जगत-जंतु-जानवरों का बना भस्मासुर






















