Thursday, February 12, 2026
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मुद्दों से भटकी पत्रकारिता,चाटूकारिता में मसगूल

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ध्रुवीकरण का उदय और पत्रकारिता पर इसका प्रभाव
ध्रुवीकरण का उदय और पत्रकारिता पर इसका प्रभाव

विनोद यादव
विनोद यादव

वर्तमान समय में स्वतंत्र पत्रकारिता बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है, जहां पर हुकमारान एवं कुछ शासकीय अधिकारी अच्छे एवं सच्चे पत्रकारों के दमन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं, पत्रकारों को सच्चाई उजागर करने की इनाम स्वरूप उन्हें षडयंत्र पूर्वक फर्जी केस में फंसा कर जेल भेजना बेहद आम हो चला है। सबसे पीड़ादायक बात तो यह है कि सब कुछ जान कर भी चौक चौराहों पर पत्रकारों को दलाल, पक्षकार गोदी मीडिया इत्यादि अनेक अपत्तिजनक शब्दों से नवाज ने वाली आम जनता अपने घरों में दुबक कर शांत बैठी रहती है किंतु पत्रकारों के साथ हो रहे अत्याचार, अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं करती ,सड़कों पर नहीं
दिखती हैं अब आप बताइए इन कठिन परिस्थितियों में कोई निष्पक्ष पत्रकार क्यों और कैसे अपने मार्ग पर तटस्थ रह सकता है।

खैर सत्ता के सामने शाष्टांग दंडवत लेती पत्रकारिता को समर्पित पूरा नहीं कह सकते आज भी तमाम कलमकार अपने जज्बात को लेकर लिख पढ़ रहें हैं और कुछ न कुछ नया करने का प्रयास कर रहें हैं मसलन जो पत्रकार साल के 365 दिन दूसरे लोगों से सवाल पूछते हैं। दूसरों लोगों की कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं । दूसरे लोगों के काम का हिसाब मांगते हैं। साल के किसी एक दिन उन लोगों को भी अपने काम का हिसाब देना पड़ेगा। उन लोगों को भी साल के एक दिन दूसरे के सवाल का जवाब देना पड़ेगा। अपनी कार्यशैली को समझाना पड़ेगा ।और गलत होने पर सुधार कर सच के साथ आना पड़ेगा ।पत्रकारिता जो हमेशा सबसे सवाल पूछती है, उसको भी एक दिन जवाबदेह होना पड़ेगा इस लिए हमारी जबाबदेही और बढ़ जाती हैं कि हम वर्तमान दौर में पत्रकारिता की दशा और दिशा को समझते हुए अपनी लेखनी को और प्रसांगिक करें ताकी सच को सच और झूठ को झूठ लिखने बोलने और सवाल पूछने में हमारी आंखे खुद के सामने झुकी हुई न महसूस करें ।


पत्रकारिता का व्यवसाय न हमें करना हैं न हम करना चाहते हैं पत्रकारिता हमारी शौक हैं हमारा पेशा हैं जो हमारें अंदर की जीजीविषा को और जागृत करता हैं हम बिक कर छपने वाली जमात में खुद को नहीं रखना चाहतें शायद यहीं वजह हैं जो किसी समय में बहुत ही ऊंचा समझा जाता था , वह आज बहुत ही गंदा हो चुका है । यही कारण है कि भारत की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं । सरदार भगत सिंह ने 1928 में उस समय की मीडिया के बारे में जो बयान दिया वह आज के दौर में पूरी तरह से सटीक बैठती है। मीडिया और पत्रकार अपने जमीर को तब भी बेचते थे, और आज भी बेच रहे हैं । फर्क बस इतना है कि तब यह पत्रकार सत्ता की दलाली चोरी छुपे करते थे, लोगों के सामने नहीं आते थे । अब के दौर में यह पत्रकार सीधे-सीधे लोगों के सामने आकर छाती ठोक कर सत्ता पक्ष की गुलामी कर रहे हैं। और सत्ता की तरफ से विपक्ष से सवाल पूछ रहे हैं । जो पावर में है, जो सारी चीजों के लिए जिम्मेदार है , उनसे एक बार भी सवाल पूछने की ना तो इनमें कूवत है , ना तो इनका साहस है । इन पत्रकारों ने देश को बर्बाद करने में बहुत ही अहम योगदान दिया है ।

देश में सांप्रदायिक दंगों से लेकर के झूठा अफवाह हर जगह गोदी मीडिया और दलाल पत्रकारिता ने देश को बर्बादी और तबाही के रास्ते पर भेजा हैं देश के संविधान और देश के लोकतंत्र के मुख्य चार स्तंभ माने गए हैं, कहा जाता है कि इन्हीं चार स्तंभों पर देश का लोकतंत्र टिका हुआ है । पहला न्यायपालिका , दूसरा कार्यपालिका , तीसरा विधायिका , और चौथा पत्रकारिता ।न्यायपालिका का हाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट के जज आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताते हैं कि “सुप्रीम कोर्ट की हालत खराब है ।” कार्यपालिका की हालत यह है कि कोई भी अधिकारी बिना घूस लिए, एक ढेला तक उठाने की जहमत नहीं करता ।विधायिका की हालत यह है कि दिन रात साथ बैठकर चाय पीने वाले , पकौड़े खाने वाले नेता संसद में एक दूसरे के ऊपर कुर्सिया उछालते हैं, गाली गलोज करते हैं, पेपर फेंकते हैं बाहर निकलने पर फिर एक साथ फोटो खिंचवाते हुए दांत चियार देते हैं। मुद्दों से भटकी पत्रकारिता चाटूकारिता में मसगूल


टीवी चैनल तो टीवी चैनल, अब तो सत्ता के प्रति अपनी वफादारी साबित करने में शहरों के छोटे छोटे पत्रकार भी रेस में लगे हुए हैं। वह पत्रकार जो शायद हाईस्कूल या इंटर पास नहीं हुए । कहीं नौकरी नहीं मिली। तो लोगों से इधर उधर से चंदा मांगकर खबरें जुटा जुटा कर पत्रकारिता के बिजनेस में उतर पड़े ।और इसे पूरी तरह से धंधा बना दिया । इन पत्रकारों के पास ना तो इनका कोई एजेंडा है ना तो कोई इनका उद्देश्य । यह सिर्फ चाटुकारिता और विपक्ष को कटघरे में खड़े करने के लिए ही पैदा हुए हैं ।पत्रकारिता की इतनी बुरी हालत समझ से परे है ।दिन रात टीवी पर अखबारों में फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद और फ़र्ज़ी धर्म के नाम जहर परोसा जा रहा है। कुछ कथित धर्मभक्त और राष्ट्रभक्त देश के नाम पर भगवान के नाम शहीदों के नाम पर सेना के नाम पर दिन रात लोगो के मन मे नफरत और असहिष्णुता का चरस बो रहे है। और इस चरस को देश के लोगों में दिन रात अखबारों और टीवी के माध्यम से लोगों को खिलाया पिलाया जा रहा है । धर्म को बचाने की एक अंधी रेस शुरू कर दी गई है । जिसमें लोग बिना देखे कभी भगवान को बचाने तो कभी मंदिर बनाने के लिए दौड़ रहे हैं । और एक दूसरे का गला काट रहे हैं।और जब सभी मुद्दों पर सरकार फेल होने लगी तो सहारा ले लिया युद्ध का और दलाल मीडिया का ।न्यूज़ रूम को एक वार रूम में बदल रखा है। वह लगातार देश की जनता की भावनाओं को युद्ध के लिए ना सिर्फ भड़का रहे हैं बल्कि नफरती और उन्मादी बनाने के प्रयास में हैं।

मुद्दों से भटकी पत्रकारिता चाटूकारिता में मसगूल


पिछले एक दो दसकों में मीडिया ने झूठ और अधकचरेपन के नए कीर्तिमान रच डाले हैं, उसने दिखाया है कि वह कितना ग़ैर ज़िम्मेदार हो सकता है और ऐसा करते हुए उसे किसी तरह की शर्म भी नहीं आती, एकतरफ़ा और फर्ज़ी कवरेज की उसने नई मिसालें स्थापित की हैं, उसने उन पत्रकारों को शर्मसार किया है जो पत्रकारिता को एक पवित्र पेशा समझते हैं और उसके लिए कुछ छोड़ा ही नहीं ओ भी उसी लाईन में गिने जाने लगे हैं। आज हम पत्रकारों की जो हालत है उसके लिए सिर्फ हमें ही जिम्मेदार हैं । हम वह हैं जब तक हमें खाने की , रहने की बेसिक चीजें नहीं मिलती तब तक हम हल्ला मचाते रहते हैं। लेकिन जैसे ही हममें से कुछ लोगों को खाने पीने की बेसिक चीजें मिलने लगती हैं, रहने की और सुरक्षा की बेसिक सुविधाएं मिलने लगती हैं, हम अन्य लोगों की इन सुविधाओं के बारे में भूलकर हिंदू-मुस्लिम करने पर उतर आते हैं।

हम अब इतने सेन्सलेस हो चुके है कि हम अपनी चीजों को अपनी तकलीफों को भूलकर , दूसरों की तकलीफ में अपनी खुशी खोजते हैं। इसका उदाहरण यहां से लिया जा सकता है कि , नोटबंदी के दौरान अक्सर लोगों को यही कहते सुना गया कि हम थोड़ी तकलीफ तो झेल लेंगे, लेकिन इससे काला धन रखने वालों का पैसा बर्बाद हो जाएगा ।हमें एक बात समझ में नहीं आती कि उनका पैसा बर्बाद होने से हमें क्या फायदा ?अगर उनका पैसा सरकार के खाते में जमा हो, और वह पैसा देश के विकास के कामों में सही सही उपयोग में लाया जाए , तो हमें खुशी हो सकती है। उनके नोट फेंक देने से, उनके नोट जला देने से हमें क्या फायदा होगा यह मुझे आज तक समझ में नहीं आया ? लेकिन हम फिर भी खुश हैं क्योंकि हमें यह दिखाया गया कि देखो दूसरों को तकलीफ हो रही है । अगर हमारे विकसित होने का मतलब देश में हिंदू-मुस्लिम करना ही है , तो फिर हमें अविकसित ही रहना चाहिए ।

क्योंकि तब कम से कम लोग प्यार से रहेंगे, और अपनी मूलभूत सुविधाओं की तलाश में भटकते रहेंगे। नहीं तो जैसे ही मूलभूत सुविधाएं मिलेंगी हम फिर से टीवी खोलेंगे, न्यूज़ चैनल लगाएंगे और हिंदू मुस्लिम करना शुरू करेंगे। और हम भी हिंदू-मुस्लिम करने वाले पत्रकारों के फैन बन जायेगे । लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ अर्थात मीडिया संस्थानों को यह अभियान उनके पास उपलब्ध सभी प्लेटफॉर्म पर जैसे- प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, रेडियो, डिजिटल, ई-न्यूज पोर्टल, वेबसाइट के साथ-साथ सोशल मीडिया जैसे- फेसबुक और ट्विटर पर देखने को तो मिलता हैं लेकिन वर्तमान दौर की पत्रकारिता और स्थिति की जबतक हम खुद आकलन नहीं करेगे हम भी उसी लाईन में खुद को खडा़ पायेगें इसलिए आज जरुरत हैं सच को सच कहने की और मुख्यधारा में खुल कर लिखने की तभी हम खुद की निष्पक्षता को साबित कर सकते हैं । मुद्दों से भटकी पत्रकारिता चाटूकारिता में मसगूल