Saturday, February 28, 2026
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होली: सिर्फ रंग नहीं, रिश्तों की डोर

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होली: सिर्फ रंग नहीं, रिश्तों की डोर
होली: सिर्फ रंग नहीं, रिश्तों की डोर
डॉ.सत्यवान सौरभ
       एक समय था जब होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, दिलों को जोड़ने का जरिया हुआ करती थी। गली-मोहल्लों में हंसी की गूंज, आंगन में पकवानों की खुशबू और रिश्तों में घुली मिठास—सब मिलकर होली को खास बनाते थे। फीके पड़ते रंग, टूटते रिश्ते,जब होली सिर्फ़ त्योहार नहीं,अपनापन हुआ करती थी।  लेकिन आज के दौर में वही रंग कुछ फीके से लगने लगे हैं। रिश्तों में दूरी, औपचारिकता और व्यस्त जीवनशैली ने उस अपनापन को कहीं पीछे छोड़ दिया है। सवाल यह है कि क्या सचमुच होली बदल गई है, या हम बदल गए हैं?
कभी होली केवल रंगों का नहीं, रिश्तों का उत्सव हुआ करती थी। फाल्गुन आते ही मोहल्लों में गीत गूँजते थे, बच्चे टोली बनाकर रंग खेलते थे और बड़े दिल खोलकर गले मिलते थे। आज वही होली औपचारिक संदेशों और सीमित दायरों में सिमट गई है। तकनीक और बदलती सामाजिक परिस्थितियों ने सुविधाएँ तो बढ़ाईं, लेकिन अपनापन कहीं पीछे छूट गया। परंपराएँ, लोकगीत और सामूहिक उल्लास धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
होली भारतीय समाज का ऐसा पर्व रहा है, जो केवल रंगों तक सीमित नहीं था। यह मनुष्यों के बीच की दूरी मिटाने, वर्षों की कड़वाहट धो डालने और रिश्तों में नई ताजगी भरने का अवसर हुआ करता था। फाल्गुन का महीना आते ही वातावरण में एक अलग-सी उमंग घुल जाती थी। हवा में गुलाल की गंध, गलियों में बच्चों की किलकारियाँ और घर-घर से उठती लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ जीवन को उत्सव में बदल देती थीं।
पर आज की होली, बीते समय की होली से काफ़ी अलग दिखाई देती है। समय के साथ समाज बदला है, तकनीक बढ़ी है, सुविधाएँ आई हैं—लेकिन इन्हीं बदलावों के बीच कहीं न कहीं रिश्तों की ऊष्मा ठंडी पड़ गई है। रंग अब भी हैं, पर वे दिलों तक नहीं पहुँच पाते। एक समय था जब होली का मतलब केवल एक दिन का उत्सव नहीं होता था। वसंत पंचमी से ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। मंदिरों में फाग गूँजने लगता था, चौपालों पर ढप-चंग की थाप सुनाई देती थी और गाँव-मोहल्लों में रसिया गाने वालों की टोलियाँ निकल पड़ती थीं। यह सामूहिकता ही होली की आत्मा थी।
बच्चे मोहल्लों में समूह बनाकर होली का दान इकट्ठा करते थे। किसी ने मना भी कर दिया, तो बुरा नहीं मानते थे—हँसते-हँसाते आगे बढ़ जाते थे। रंग लगाना अपराध नहीं, अपनापन जताने का तरीका था। कोई डाँट भी दे, तो उसे होली की मस्ती समझकर भुला दिया जाता था। आज वही बच्चे मोबाइल की स्क्रीन में सिमट गए हैं, और मोहल्ले संवादहीन हो चले हैं।
होली का सबसे सुंदर पक्ष यह था कि उस दिन सामाजिक भेद-भाव धुंधले पड़ जाते थे। अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, अपना-पराया—सब एक ही रंग में रंगे नज़र आते थे। दुश्मन भी गले मिल लेते थे। “बुरा न मानो, होली है” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति थी कि आज दिल खोलकर जिया जाएगा।
आज वही वाक्य मज़ाक बनकर रह गया है। लोग रंगों से ज़्यादा सीमाएँ बचाने में व्यस्त हैं। कहीं कोई अनहोनी न हो जाए, कहीं कोई विवाद न खड़ा हो जाए—इस डर ने होली की सहजता छीन ली है। पहले घर-घर पकवान बनते थे। गुजिया, दही-बड़े, मालपुए और ठंडाई की खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती थी। पड़ोसियों की बहू-बेटियाँ भी अपने ही घर की सदस्य मानी जाती थीं। मेहमानों का स्वागत खुले दिल से होता था। आज उत्सव घर की चार दीवारों तक सिमट गए हैं। एक औपचारिक “होली मुबारक” या “हैप्पी होली” का संदेश रिश्तों की गर्मजोशी का स्थान ले चुका है।
समाज में बढ़ती असुरक्षा और अविश्वास ने पारिवारिक व्यवहार को भी बदल दिया है। पहले लड़कियाँ होली के दिनों में सहेलियों और रिश्तेदारों के यहाँ देर तक रुक जाती थीं। हँसी-मज़ाक और गीत-संगीत के बीच समय कैसे बीत जाता था, पता ही नहीं चलता था। आज वही बातें चिंता का कारण बन जाती हैं। रिश्तों पर संदेह की परतें चढ़ गई हैं।
परंपराएँ भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। कभी घरों में टेसू और पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे। महिलाएँ लोकगीत गाते हुए रंग घोलती थीं और बच्चे उत्सुकता से इंतज़ार करते थे। छोटी-छोटी लड़कियाँ गाय के गोबर से वलुडिया बनाती थीं, उन पर मालाएँ सजाती थीं। ये केवल रस्में नहीं थीं, बल्कि सामूहिक श्रम और रचनात्मकता के प्रतीक थे।
आज बाज़ार से खरीदे गए रासायनिक रंगों ने उन परंपराओं की जगह ले ली है। सुविधा बढ़ी है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव घटा है। लोकगीत अब कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित रह गए हैं। फाग और रसिया की धुनें, जो कभी फाल्गुन भर गूँजती थीं, अब दुर्लभ हो गई हैं।
होली के बाद की वह शांति भी कभी सुकून देती थी। पानी की बौछारों और हँसी की आवाज़ों के बाद जो ठहराव आता था, वह थकान नहीं, तृप्ति लेकर आता था। आज उत्सव कुछ घंटों में समाप्त हो जाता है और उसके साथ ही समाज फिर अपनी-अपनी बंद दुनिया में लौट जाता है। हाल के वर्षों में सामाजिक तनाव और विभाजन ने होली जैसे उत्सवों को और भी सीमित कर दिया है। कई परिवार इस दिन घर से बाहर निकलने से बचते हैं। जबकि त्योहारों का मूल उद्देश्य ही लोगों को जोड़ना, डर और नकारात्मकता से बाहर निकालना होता है। होली केवल रंगों का पर्व नहीं है; यह क्षमा का पर्व है, मेल-मिलाप का पर्व है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य होने का अर्थ केवल अपने लिए जीना नहीं, बल्कि दूसरों के साथ हँसना और जुड़ना भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम होली को फिर से उसके मूल अर्थ में देखें। शोर-शराबे और औपचारिकताओं से हटकर, रिश्तों को समय दें। बच्चों को मोहल्लों में खेलने दें, बड़ों को एक-दूसरे से मिलने का अवसर दें और परंपराओं को केवल स्मृति न बनने दें। त्योहार हमें उम्मीद देते हैं। वे अकेलेपन को तोड़ते हैं और जीवन की थकान के बीच कुछ पल की राहत देते हैं। अगर हम इन्हें केवल रस्म बना देंगे, तो समाज और अधिक सूना हो जाएगा। होली के रंग तभी गहरे होंगे, जब दिलों में अपनापन होगा। वरना रंग हाथों से तो उतर जाएँगे, लेकिन रिश्तों पर जमी धूल और गहरी होती चली जाएगी।
शायद अब समय है कि हम रुककर सोचें—
क्या हम फिर से वह होली लौटा सकते हैं,
जहाँ रंगों से पहले रिश्ते खिलते थे?
होली आई है, चलो दिलों की दूरी मिटाएँ।
रूठों को मनाएँ, बिछड़ों को फिर से गले लगाएँ।
इस बार सिर्फ चेहरों पर नहीं, रिश्तों पर रंग लगाएँ।
पुरानी नाराज़गी को एक मुट्ठी गुलाल संग उड़ाएँ।
औपचारिक संदेश नहीं, सच्ची मुस्कान बाँट आएँ।
अपनेपन की खुशबू हर आंगन तक पहुँचाएँ।
मन के कोनों में जमी शिकायतें धो डालें।
आओ इस होली रिश्तों को फिर से रंग डालें।