Saturday, January 17, 2026
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मतभेद के बाद भी चल रही है गहलोत सरकार…!

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विचारों में मतभेद के बाद भी राजस्थान में चल रही है अशोक गहलोत की सरकार।पांच बार के विधायक रामनारायण मीणा अब विधानसभा के उपाध्यक्ष भी नहीं बनेंगे। चुनाव हारे हुए नेताओं को मिल गया है कैबिनेट मंत्री का दर्जा।

एस0 पी0 मित्तल

राजस्थान के न्यूज़ चैनल पर दो मार्च को रात 8 बजे प्रसारित हुए लाइव डिबेट प्रोग्राम में पत्रकारों के नाते मैंने भी भाग लिया। मेरे साथ राजस्थान विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और मौजूदा समय में पांच बार के कांग्रेसी विधायक रामनारायण मीणा तथा राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और भाजपा की वरिष्ठ नेता सुमन शर्मा भी रही। डिबेट का मुद्दा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सलाहकार और कांग्रेस सरकार को समर्थन देने वाले निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा का अपनी ही सरकार की नीतियों का कोसने वाला बयान रहा। असल में दो मार्च को विधानसभा में इंदिरा गांधी मातृत्व पोषण योजना पर बहस के दौरान विधायक संयम लोढ़ा ने इस योजना को जनसंख्या वृद्धि करने वाला बताया। सीएम गहलोत ने अपने बजट भाषण में घोषणा की थी कि अब प्रदेशभर में दूसरी संतान को जन्म देने वाली मां को 6 हजार रुपए का अनुदान मिलेगा। संयम लोढ़ा का कहना था कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए जहां एक ही संतान की नीति पर जोर दिया जा रहा है, वहीं सरकार अब दूसरी संतान के लिए प्रोत्साहित कर रही है। जनसंख्या नियंत्रण और वृद्धि पर अलग से बहस हो सकती है, लेकिन सवाल उठता है कि कांग्रेस सरकार को समर्थन देने के बाद भी संयम लोढ़ा का सरकार की नीतियों की आलोचना क्यों करते हैं?

इससे पहले भी संविदा कर्मियों को नियमित करने के मुद्दे पर लोढ़ा ने विधानसभा में गहलोत सरकार की आलोचना की। सीएम गहलोत द्वारा सलाहकार बनाने का भी लोढ़ा ने मजाक उड़ाया। उनका कहना है कि सलाहकार पद की नियुक्ति का कोई आदेश नहीं है। जी न्यूज की बहस में कांग्रेस विधायक रामनारायण मीणा ने संयम लोढ़ा के ताजा बयान को उचित नहीं माना, लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री का सलाहकार होने के नाते संयम लोढ़ा को जिम्मेदारी का अहसास करवाया। मेरा कहना रहा कि सीएम गहलोत विचारों का मतभेद रखने वाले संयम लोढ़ा को तो सलाहकार बनाते हैं, लेकिन पांच बार के विधायक मीणा को कोई पद नहीं देते। मीणा विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रहे हैं, कम से कम उन्हें उपाध्यक्ष ही बना दिया जाए। बहस में मेरे कथन पर विधायक मीणा ने आभार जताया, लेकिन साथ ही कहा कि अब मैं विधानसभा का उपाध्यक्ष नहीं बनूंगा। मीणा जब उपाध्यक्ष पद लेने से इंकार कर रहे थे, तब उनके चेहरे पर नाराजगी झलक रही थी।

असल में विधानसभा का उपाध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा मिलता है, जबकि सीएम गहलोत ने गत विधानसभा का चुनाव हारे नेता ब्रजकिशोर शर्मा, चंद्रभान और रामेश्वर डूडी को बोर्डों का अध्यक्ष बना कर कैबिनेट का दर्जा दे दिया है। कई विधायकों के पिता, पुत्र पत्नी को बोर्डों में नियुक्ति दी है, लेकिन पांच बार के विधायक रामनारायण मीणा की अभी तक कोई सुध नहीं ली है। इतनी राजनीतिक उपेक्षा किए जाने के बाद भी मीणा टीवी चैनलों की डिबेट में कांग्रेस का पक्ष मजबूती के साथ रखते हैं। पता नहीं मीणा पर मुख्यमंत्री की नजर कब पड़ेगी? अलबत्ता मीणा को इस बात की तो पीड़ा है ही कि जनजाति के विधायक की लगातार उपेक्षा हो रही है। मीणा ने कभी भी मुख्यमंत्री की भी आलोचना नहीं की। इतनी वरिष्ठता के बाद भी मीणा को मंत्री नहीं बनाए जाने को लेकर कांग्रेस में भी चर्चा हो रही है।