Tuesday, January 20, 2026
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लोकतंत्र के कटघरे में शिक्षा..!

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संयम:चरित्र की कसौटी और सफलता की शर्त..!
राजू यादव

जहाँ पढ़ा खड़ा है और अनपढ़ सत्ता में बैठा है, वहीं लोकतंत्र में शिक्षा का अपमान होता है। जब पढ़ा-लिखा व्यक्ति सम्मान की प्रतीक्षा में खड़ा हो और बिना योग्यता सत्ता पर बैठा व्यक्ति निर्णय ले रहा हो,तब सवाल सिर्फ व्यक्ति का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होता है। लोकतंत्र में सत्ता का आधार जनादेश होता है, लेकिन क्या योग्यता और शिक्षा की कोई भूमिका नहीं रह गई? यह लेख उसी व्यवस्था पर सवाल उठाता है जहाँ शिक्षा, मेहनत और योग्यता लगातार अपमानित हो रही हैं। लोकतंत्र के कटघरे में शिक्षा..!

किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी शिक्षा‑व्यवस्था और उस शिक्षा को मिलने वाले सम्मान से होती है। शिक्षा केवल डिग्रियों का संग्रह नहीं, बल्कि विवेक, अनुशासन, संवैधानिक समझ और सार्वजनिक जिम्मेदारी का संस्कार है। सवाल यह है कि क्या भारत जैसा लोकतंत्र सचमुच इस शिक्षा का सम्मान कर रहा है, या सत्ता के गलियारों में पढ़े‑लिखे लोग केवल आदेश पालन की मुद्रा में खड़े रहने के लिए ही नियत कर दिए गए हैं।  

भारत में लाखों युवा वर्षों तक कठिन तैयारी, असफलता और संघर्ष के बाद सिविल सेवाओं तक पहुँचते हैं। वे संविधान,प्रशासन,अर्थव्यवस्था,समाजशास्त्र और नीति‑निर्माण के गंभीर अध्ययन के बाद आईएएस, आईपीएस या अन्य सेवाओं में आते हैं। चयन के बाद भी लंबा प्रशिक्षण, फील्ड पोस्टिंग और निरंतर जवाबदेही उनका हिस्सा होती है। दूसरी ओर कई बार वही अफसर ऐसे जनप्रतिनिधियों के सामने हाथ बाँध कर खड़े दिखते हैं, जिनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और प्रशासनिक समझ बेहद सीमित होती है। यही वह दृश्य है, जहाँ व्यंग्य नहीं, व्यवस्था की सच्चाई बोलती है—अनपढ़ बैठे हैं, पढ़ा खड़ा है।  

एक सिविल सेवक बनने की यात्रा वर्षों की साधना है। परीक्षा केवल तथ्यों का नहीं, सोचने की क्षमता, विश्लेषण, नैतिकता और दबाव में निर्णय लेने की क्षमता का परीक्षण करती है। सेवा में आने के बाद भी हर फाइल, हर आदेश, हर हस्ताक्षर भविष्य की जांच‑परख की कसौटी पर खरा उतरना होता है। इसके उलट, राजनीति में प्रवेश के लिए न किसी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शर्त है, न नीति या प्रशासन का औपचारिक प्रशिक्षण अनिवार्य है। जनसमर्थन लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन जब वही जनसमर्थन पूरे तंत्र में योग्यता के अभाव को ढकने का आवरण बन जाए, तब समस्या शुरू होती है।  

लोकतंत्र का अर्थ जनता का शासन है, लेकिन लोकतंत्र कभी भी अज्ञान का उत्सव नहीं रहा। सफल लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक नेतृत्व और पेशेवर प्रशासन, दोनों को महत्व दिया गया है। वहाँ निर्णय लेने के मंच पर भावनाएँ नहीं, तथ्यों और तर्क की भी जगह होती है। हमारे यहाँ स्थिति यह बनती जा रही है कि बहस में शोर अधिक है, अध्ययन कम। आरोप‑प्रत्यारोप की गर्मी अधिक है, आंकड़ों‑तथ्यों की रोशनी कम। ऐसे माहौल में अफसरशाही, जो ज्ञान और प्रक्रिया की प्रतिनिधि है, केवल आदेश मानने वाली मशीन तक सीमित कर दी जाती है। यही मानसिकता उस दृश्य को जन्म देती है—कुर्ता बैठा है, वर्दी खड़ी है।  

स्वतंत्र भारत की कल्पना में खादी और खाकी एक‑दूसरे के पूरक माने गए थे। खादी जनमत, राजनीति और नीति‑निर्माण का प्रतीक थी, खाकी कानून, व्यवस्था और निष्पक्ष क्रियान्वयन की। दोनों के बीच सम्मान आधारित रिश्ते से ही सुशासन की नींव रखी जानी थी। आज स्थिति यह है कि खादी कई बार संख्या‑बल और पद की शक्ति के सहारे अपनी बात थोपती दिखती है, और खाकी स्थानांतरण, प्रतिशोध या झूठे आरोपों के डर से विवेकपूर्ण सलाह देने से कतराने लगती है। अफसर यह सोचने लगे हैं कि “सही क्या है” से ज़्यादा महत्वपूर्ण “ऊपर क्या चाहते हैं” है। यह मानसिकता न केवल प्रशासनिक नैतिकता को कमजोर करती है, बल्कि कानून के राज पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।  

इस वातावरण का सीधा असर समाज में शिक्षा की छवि पर पड़ता है। जब युवाओं को बार‑बार यह दृश्य दिखता है कि जिसने वर्षों पढ़ाई की, प्रतियोगी परीक्षाएँ पास कीं, प्रशिक्षण लिया, वही अंत में केवल खड़ा है; और जिसने बिना किसी तैयारी के राजनीति की सीढ़ी चढ़ ली, वही बैठ कर अंतिम निर्णय ले रहा है, तो स्वाभाविक रूप से निराशा जन्म लेती है। संदेश साफ़ होता है—शिक्षा से सत्ता नहीं मिलती, ज्ञान से निर्णय नहीं होते और मेहनत से सम्मान सुनिश्चित नहीं। धीरे‑धीरे शिक्षा समाज को दिशा देने का माध्यम नहीं, केवल नौकरी पाने का जरिया बनकर रह जाती है।  

विडंबना यह भी है कि जब नीतियाँ असफल होती हैं, योजनाएँ धरातल पर नहीं उतरतीं या भ्रष्टाचार सामने आता है, तो सबसे पहले निशाने पर भी अफसर ही होते हैं। वास्तविकता यह है कि अधिकतर बड़े फैसले राजनीतिक स्तर पर लिए जाते हैं, अफसर उस नीति के क्रियान्वयनकर्ता होते हैं। फिर भी असफलता की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के सिर पर डाल दी जाती है। यह दोहरा अन्याय है—निर्णय में भागीदारी सीमित, लेकिन जवाबदेही पूरी। परिणाम यह होता है कि ईमानदार और साफ‑गोई से काम करने वाले अधिकारी हतोत्साहित होते हैं और “चुप रहना, जो कहा जाए वही करना” सुरक्षित विकल्प बन जाता है।  

जब भी यह सवाल उठाया जाता है कि क्या नीति‑निर्माण के लिए न्यूनतम शिक्षा और प्रशासनिक समझ आवश्यक होनी चाहिए, तब तुरंत तर्क दिया जाता है कि “क्या आप जनप्रतिनिधियों की वैधता पर सवाल उठा रहे हैं?” साफ़ होना चाहिए कि सवाल वैधता का नहीं, क्षमता का है। जनप्रतिनिधि जनता के वोट से आते हैं, यह उनकी लोकतांत्रिक वैधता है और इसका सम्मान जरूरी है। लेकिन क्या जनादेश अपने आप में हर क्षेत्र की विशेषज्ञता का प्रमाणपत्र है? क्या करोड़ों लोगों पर असर डालने वाले निर्णय केवल राजनीतिक चतुराई, जातीय समीकरण या चुनावी लाभ‑हानि को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए?  

सवाल सीधा है—यदि डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, यहां तक कि एक साधारण क्लर्क की नौकरी के लिए भी योग्यता और परीक्षा जरूरी है, तो एक बड़े मंत्रालय का नेतृत्व बिना किसी प्रशिक्षण और न्यूनतम बौद्धिक तैयारी के कैसे सम्भव माना जा सकता है? लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि “जो चुन कर आए, वह सब जानता ही होगा”; लोकतंत्र का अर्थ यह है कि चुना हुआ नेतृत्व विशेषज्ञों, प्रशासनिक अनुभव और संवैधानिक मूल्यों की मदद से निर्णय ले।  

समाधान अफसरों को सर्वोच्च बना देने में नहीं है, न ही जनप्रतिनिधियों को कमतर साबित करने में। समाधान संतुलन में है। जनप्रतिनिधि नीति की दिशा तय करें, प्राथमिकताएँ निर्धारित करें; अफसर उस दिशा को संवैधानिक ढांचे और प्रशासनिक व्यावहारिकता के अनुरूप आकार दें। इसके लिए कुछ कदम आवश्यक हैं—जनप्रतिनिधियों के लिए अनिवार्य संवैधानिक और प्रशासनिक प्रशिक्षण, नए विधायकों और मंत्रियों के लिए व्यवस्थित ओरिएंटेशन प्रोग्राम, समितियों में विशेषज्ञों और शोध संस्थानों की सक्रिय भागीदारी, तथा अफसरशाही को ऐसी पेशेवर स्वतंत्रता, जहाँ वह भय नहीं, विवेक के साथ सलाह दे सके।  

सबसे ज़रूरी यह स्वीकार करना है कि शिक्षा को केवल परीक्षा‑कक्ष तक सीमित नहीं रखा जा सकता; उसे निर्णय‑कक्ष तक भी पहुँचाना होगा। लोकतंत्र में सवाल पूछना, योग्यता की बात करना या शिक्षा का सम्मान मांगना, लोकतंत्र‑विरोधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र‑समर्थ कदम हैं। जनता का जनादेश सर्वोच्च है, लेकिन वही जनादेश यह भी चाहता है कि निर्णय सोच‑समझ कर, तथ्यों और तर्क के आधार पर हों।   जब तक यह दृश्य बना रहेगा—अनपढ़ बैठे हैं, पढ़ा खड़ा है; कुर्ता बैठा है, वर्दी खड़ी है; खादी बैठी है, खाकी खड़ी है—तब तक यह कहना कठिन होगा कि हमने शिक्षा को सचमुच सम्मान दिया है। लोकतंत्र का उद्देश्य केवल सत्ता‑हस्तांतरण नहीं, विवेकपूर्ण शासन है। और विवेक शिक्षा, ज्ञान और योग्यता से ही आता है।  

भारत यदि सचमुच एक परिपक्व लोकतंत्र बनना चाहता है, तो उसे तय करना होगा कि वह शिक्षा को केवल डिग्री और नौकरी तक सीमित रखेगा, या उसे शासन और नीति‑निर्माण के केंद्र तक पहुँचने देगा। जिस दिन पढ़ा‑लिखा केवल खड़ा नहीं, बल्कि सम्मान के साथ निर्णय लेते हुए दिखाई देगा, उसी दिन कहा जा सकेगा कि इस देश में शिक्षा का मज़ाक नहीं, उसका सम्मान हो रहा है।

जब शिक्षा को सम्मान नहीं मिलेगा, तब लोकतंत्र सिर्फ संख्या का खेल बनकर रह जाएगा। सवाल यह नहीं कि कौन खड़ा है और कौन बैठा, सवाल यह है कि क्या हम ज्ञान और योग्यता को फिर से अपनी व्यवस्था का आधार बना पाएँगे या नहीं। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब सत्ता और समझ साथ चलें। अगर शिक्षा को लगातार नज़रअंदाज़ किया गया, तो निर्णयों की गुणवत्ता गिरती जाएगी और उसका खामियाजा पूरी पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा। आज अगर पढ़ा खड़ा है और अनपढ़ बैठा है, तो कल सवाल सिर्फ सम्मान का नहीं, भविष्य का होगा। अब भी समय है कि लोकतंत्र में योग्यता और शिक्षा को उसका वास्तविक स्थान दिया जाए। शिक्षा का अपमान सिर्फ एक वर्ग का नहीं, पूरे लोकतंत्र का नुकसान है। अब फैसला समाज को करना है वह ज्ञान चुने या अज्ञान। जहाँ ज्ञान खड़ा है और अज्ञान बैठा है, वहाँ लोकतंत्र की नींव ही हिल रही है। लोकतंत्र के कटघरे में शिक्षा..!