

संचय की मानसिकता मनुष्य को सुरक्षा का भरोसा देती है—कल की अनिश्चितताओं से बचने का एक उपाय। लेकिन जब यही मानसिकता आवश्यकता से आगे बढ़कर आदत और फिर लालच का रूप ले लेती है, तब यह व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक संकट का कारण बन जाती है। संसाधनों की असमानता, बढ़ती दूरी और टूटता सामूहिक विश्वास इसी सोच की उपज हैं। सवाल यह है।सहेजना ज़रूरी है, पर कितना? संचय प्रवृत्ति का द्वंद्व। सहेजना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है-भविष्य की चिंता, असुरक्षा का भय और जरूरतों का अनुमान उसे संग्रह की ओर ले जाता है। लेकिन जब यह सहेजना आवश्यकता से आगे बढ़कर लालच बन जाए, तब वही संचय समाज, प्रकृति और संवेदनाओं के लिए संकट बन जाता है। सवाल यह नहीं कि सहेजना गलत है, सवाल यह है कि कितना सहेजना ज़रूरी है और कहाँ रुक जाना चाहिए? यही द्वंद्व मनुष्य को मनुष्य से और प्रकृति से टकराने पर मजबूर करता है।क्या संचय वास्तव में हमें सुरक्षित करता है, या समाज को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है..? संचय की मानसिकता: सुरक्षा या सामाजिक संकट..?
मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह इस जीवन को स्थायी मानकर चलने लगता है। वह सोचता है कि जितना अधिक वह संचय कर लेगा-धन, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा या संबंध-उतना ही उसका भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। वास्तव में, इसी सोच के कारण वह निरंतर संग्रह में लगा रहता है। परंतु संचय की यह प्रवृत्ति, जब आवश्यकता से अधिक(बहुत अधिक संचय की भावना)हो जाती है, तब वह जीवन को सरल नहीं बल्कि बोझिल बना देती है। मनुष्य का मन धीरे-धीरे इच्छाओं, भय और असंतोष से भरने लगता है। वह आज में जीना भूलकर कल की चिंता में अपना वर्तमान खो देता है। हालांकि, कुछ हद तक व्यक्ति को संचय करना ठीक है, जैसा कि भविष्य की आवश्यकता हेतु संचय, विपत्ति हेतु संचय,आने वाले कल हेतु संचय आदि।
संस्कृत में एक श्लोक में कहा गया है कि-‘अद्य कृत्वा न कर्तव्यं कर्तव्यमद्य एव तत्। भविष्ये निश्चयं कृत्वा संचयं कुरु बुद्धिमान्॥’ अर्थात् इसका मतलब यह है कि आज जो करना आवश्यक है, उसे आज ही करो। भविष्य को ध्यान में रखकर बुद्धिमान व्यक्ति संचय करता है।विपत्ति में भी संचय का महत्व है, क्यों कि संचित धन विपत्ति में मित्र के समान सहायक होता है; बिना संचय के कोई सहारा नहीं रहता। इसीलिए संस्कृत में कहा गया है-‘संचितं हि भवेद् वित्तं विपत्तौ मित्रवत् सदा। असंचितस्य लोकेऽस्मिन् नास्ति कश्चित् सहायः॥’ लेकिन आज का व्यक्ति हरदम,हर पल पदार्थ में रचा-बसा नजर आता है।वह ज्यादा से ज्यादा संचय कर लेना चाहता है,आवश्यकता से बहुत अधिक संचय। थोड़ा-थोड़ा संचय करना ठीक है। इस संबंध में,संचय ग़र करना ही है तो व्यक्ति को मधुमक्खी से शिक्षा (थोड़ा-थोड़ा संचय) की शिक्षा लेनी चाहिए।

जैसे मधुमक्खी प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा मधु संचित करती है, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति नियमित रूप से संचय करता है। बड़े खूबसूरत शब्दों में कहा गया है-‘यथा मधुकरो नित्यं मधु संगृह्य गच्छति।तथा बुद्धिमान् नित्यं अल्पमल्पं संचिनोति॥’ कहना ग़लत नहीं होगा कि आदमी की संचय करने के पीछे आने वाले कल की सोच निहित होती है। कहते हैं कि जिसने पहले से संचय कर लिया, उसे भविष्य का शोक नहीं होता। संस्कृत में कहा गया है कि-‘न हि भविष्यतः शोकः कृतसंचयमेव हि।बुद्धिमान् स भविष्याय पूर्वमेव संचिनोति॥’ हालांकि, इसके विपरीत प्रकृति हमें बिल्कुल भिन्न संदेश देती है। पक्षियों के जीवन को देखें। वे कभी संचय नहीं करते। न उनके पास गोदाम होते हैं, न तिजोरियाँ। हर सुबह वे खुले आकाश में निकल पड़ते हैं-नई खोज, नए दाने और नए अनुभव की तलाश में। उन्हें यह चिंता नहीं सताती कि कल क्या होगा या परसों क्या मिलेगा। वे जानते हैं कि आज का दिन आज के लिए है। शाम होते-होते, दिन भर की उड़ान और संघर्ष के बाद, वे अपने छोटे-से घोंसलों में लौट आते हैं और शांति से विश्राम करते हैं। उनका घोंसला भी संग्रह का स्थान नहीं, बल्कि विश्राम और सुरक्षा का प्रतीक होता है।
वास्तव में, पक्षियों का यह जीवन हमें यह सिखाता है कि विश्वास और संतोष कितने महत्वपूर्ण हैं। वे प्रकृति पर भरोसा करते हैं और अपने श्रम पर भी। उन्हें भविष्य की अनिश्चितता डराती नहीं, क्योंकि वे वर्तमान में पूरी निष्ठा से जीते हैं। अगली सुबह फिर वही उल्लास, वही चहचहाहट और वही नई शुरुआत होती है। उनके जीवन में भय कम और स्वतंत्रता अधिक होती है।मनुष्य यदि चाहे तो पक्षियों से बहुत कुछ सीख सकता है। संचय आवश्यक है, परंतु सीमा में। आवश्यकता और लालच के बीच का अंतर समझना ही जीवन की परिपक्वता है। जब संचय ही जीवन का लक्ष्य बन जाता है, तब आनंद, प्रेम और शांति पीछे छूट जाते हैं। मनुष्य स्वयं द्वारा बनाए गए भंडार का रक्षक बनकर रह जाता है, जबकि जीवन उससे कहीं अधिक विशाल और प्रवाहमय है। सच्चा सुख अधिक जमा करने में नहीं, बल्कि कम में संतोष ढूँढने में है। पक्षियों की तरह हर दिन को एक नई यात्रा मानकर, पूरे मन से जीना ही जीवन की सार्थकता है।
आज का श्रम, आज का आनंद और शाम का विश्राम-यही जीवन की सरल, सुंदर और संतुलित लय है। यदि मनुष्य इस लय को समझ ले, तो उसका जीवन भी हल्का, मुक्त और आनंदपूर्ण हो सकता है। अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि संचय जीवन में सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता देता है, इसलिए यह आवश्यक है। लेकिन जब संचय आवश्यकता से अधिक होकर लोभ, संसाधनों की बर्बादी या दूसरों के अभाव का कारण बन जाए, तो वह अनुचित हो जाता है। अतः संतुलित और उद्देश्यपूर्ण संचय ही उचित माना जाना चाहिए।
शायद समाधान त्याग में नहीं, संतुलन में है। आवश्यकता और लालच के बीच की रेखा जितनी स्पष्ट होगी, समाज उतना ही न्यायपूर्ण बनेगा। सहेजना जीवन की सुरक्षा है, लेकिन बाँटना उसकी संवेदना। जब मनुष्य यह समझ लेगा कि अतिरिक्त संग्रह नहीं, साझा विवेक ही स्थायी सुख का आधार है—तभी संचय प्रवृत्ति का यह द्वंद्व शांत होगा और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना संभव हो पाएगी। संचय अपने आप में गलत नहीं है, गलत तब होता है जब वह दूसरों की आवश्यकता पर भारी पड़ने लगे। सुरक्षा की भावना यदि साझा जिम्मेदारी में बदल जाए, तो समाज मजबूत होता है, लेकिन जब संग्रह ही जीवन का लक्ष्य बन जाए, तो वही संकट का कारण बनता है। अब समय है कि हम संचय और संवेदना के बीच संतुलन खोजें—क्योंकि सुरक्षित व्यक्ति से पहले, सुरक्षित समाज ज़रूरी है। संचय की मानसिकता: सुरक्षा या सामाजिक संकट..?























