

संसद की गरिमा के प्रश्न स्थाई भाव बन रहे हैं। संसद देश काल का दर्पण होती है। यह केवल बजट पास करने या कानून बनाने का ही संवैधानिक निकाय नहीं होती। सदन की गरिमा और मर्यादा बहुधा तार तार हो रही है। संसद की गरिमा को उच्च स्तर पर बनाए रखने का कर्तव्य सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की ही जिम्मेदारी है। उत्तरदायित्व का निर्वाहन शोर शराबे से नहीं होता। सदन के भीतर शोर शब्दों का विकल्प नहीं होता। कांग्रेस दीर्घकाल तक सत्ता में रही है। देश की संसदीय राजनीतिक संस्कृति को विकसित करने की जिम्मेदारी कांग्रेस की ही रही है। लेकिन विपक्षी दल की भूमिका में कांग्रेस वैचारिक विकल्प नहीं दे पाई। दुनिया भर के संसदीय जनतंत्रों में सत्ता पक्ष का विकल्प देने की जिम्मेदारी विपक्ष की ही होती है। सदन में अचानक किसी मुद्दे पर उबाल आ जाना बड़ी बात नहीं है। तीखी नोक झोंक भी संभव है। लेकिन योजना बनाकर सदन के भीतर उत्पात करना किसी भी दशा में उचित नहीं कहा जा सकता।
भारतीय संसद में बहुत कुछ अप्रिय घटित हो रहा है। ऐसा उत्पात सदन की मर्यादा का हनन है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा है कि, ”कांग्रेस के सांसद किसी अप्रत्याशित घटना को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम देना चाहते थे।” बिरला ने कहा कि उन्होंने नेता सदन और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सतर्क किया था कि ऐसी कोई बड़ी घटना संभव थी। बिरला ने यह भी कहा कि अभी बुधवार को विपक्ष के कुछ सदस्यों ने जैसा व्यवहार किया वैसा लोकसभा की शुरुआत से लेकर आज तक कभी नहीं हुआ। यद्यपि कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष के दावे को झूठ बताया है। लेकिन मूलभूत प्रश्न है कि प्रधानमंत्री के आसन के सामने तीन महिला सदस्यों का खड़े होना किस दृष्टि से संसदीय है। लोकसभा अध्यक्ष के अनुसार उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अनुरोध किया था कि वे सदन में न आएं।
18वीं संसद में प्रेरक घटनाएं नहीं दिखाई पड़ती। विपक्ष अपने संसदीय दायित्वों के निर्वाहन में सफल नहीं रहा। व्यवधान और शोर बार-बार के स्थगन और संसदीय शब्दों का प्रयोग लगातार हो रहा है। राष्ट्रीय विमर्श के प्रश्न बहस का मुद्दा नहीं बन पाए। वैकल्पिक विषयों पर सदन के पटल पर विकल्प देना विकल्प के क्रियान्वयन के लिए सुझाव देना विपक्ष की जिम्मेदारी है। यूरोपीय संसदीय राजनीति के विद्वान हेराल्ड लास्की ने विपक्ष के तीन कर्तव्य बताए थे। पहला टू प्रपोज दि गवर्नमेंट-सुझाव देना। दूसरा टू अपोज दि गवर्नमेंट-राष्ट्रीय मुद्दों पर सकारात्मक विरोध करना और तीसरा विकल्प देने के लिए तैयार रहना-टू डिपोज दि गवर्नमेंट। ब्रिटिश संसदीय परंपरा में विपक्ष को ’गवर्नमेंट इन वेटिंग’ कहा जाता है। लेकिन यहां शोर और स्थगन ही विपक्ष के हथियार बन गए हैं।
संसद के विशेषाधिकार महत्वपूर्ण हैं। प्रधानमंत्री सदन का नेता होता है। नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं होती। सदन की गरिमा को बनाए रखते हुए उसे सरकार की नीतियों की आलोचना करनी चाहिए। उस आलोचना का आधार होना चाहिए। सदन में प्रयुक्त की जाने वाली भाषा संसदीय व्यवहार का प्रमुख हिस्सा है। अपशब्द विचार प्रकट करने का सही माध्यम नहीं होते। अपशब्दों का प्रयोग संसदीय कर्तव्य के आदर्श निर्वाहन का विकल्प नहीं होता। लेकिन यहां प्रधानमंत्री के आसन के समक्ष खड़े होकर शोर मचाना, महिला सांसदों का आसन को घेर कर खड़े होना जैसे प्रसंग रोजमर्रा की कार्यवाही का हिस्सा बन रहे हैं।
प्रधानमंत्री के विरुद्ध किसी अनहोनी के सम्बंध में बिरला का रहस्योद्घाटन गंभीर प्रकृति का है। यह छोटी-मोटी घटना नहीं है। योजना बनाकर संसद की कार्यवाही को किसी भी रूप में प्रभावित करने की इच्छा भी खतरनाक है। यह सदन के विशेषाधिकार का भी उल्लंघन है। लोकसभा अध्यक्ष को घटना के सभी तथ्यों की जानकारी है। इसलिए ऐसे गंभीर मुद्दे पर विशेषाधिकार के अवमान की कार्यवाही होनी चाहिए। यद्यपि ब्रिटिश संसद को संसदीय मामलों में लोकतंत्र की जननी कहा जाता है, लेकिन ब्रिटिश संसद के जन्म के बहुत पहले भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं थीं। लुडविग जैसे विद्वानों ने वैदिक काल में ही भारत की संसदीय संस्थाओं का उल्लेख किया है।
सभा और समितियां ऋग्वेद में हैं। अथर्ववेद में हैं। महाभारत में हैं। वैदिक साहित्य में सभा के सदस्य सभासद कहलाते थे। जो सभेय थे, सभा में सुंदर बोलते थे, वे सभ्य कहे जाते थे। उत्तर वैदिक काल और पुराणों के समय भिन्न-भिन्न जनहितकारी विषयों पर विचार गोष्ठियां होती थीं। भाषा में मधुरता थी। आचार और विचार मर्यादित थे। लेकिन आधुनिक भारत की संसद तमाम प्रतिभाओं के बावजूद मर्यादित रूप में नहीं चलती। संसदीय कार्यवाही प्रेरित नहीं करती। यह हताश और निराश करती है।
संविधान सभा की कार्यवाही लंबे समय तक चली थी। सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. आम्बेडकर, कमलापति त्रिपाठी, विशंभर दयालु त्रिपाठी, मौलाना हजरत मोहानी, हरि विष्णु कामथ, हृदयनाथ कुंजूरू, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे विद्वान सदस्य थे। इस लंबी कार्यवाही में कहीं कोई कटुता नहीं दिखाई पड़ी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सभा की अध्यक्षता कर रहे थे। संविधान सभा ने देश को एक राज व्यवस्था दी। राष्ट्रवादी मूल और आदर्श दिए, लेकिन आश्चर्य है कि ऐसी परंपराओं के उत्तराधिकारी होकर भी हम अपनी संसद को सुव्यवस्थित नहीं चला पा रहे हैं। दुर्भाग्य का विषय है कि प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के पास नीतियों के स्तर पर कोई विकल्प नहीं है। शोर स्थाई भाव है।
सदन राष्ट्रीय विमर्श के संवैधानिक मंच हैं। विपक्ष को तथ्य और तर्क सहित चर्चा करनी चाहिए। मूलभूत प्रश्न है कि प्रश्नों का उद्देश्य क्या है? क्या लोकतंत्र की मजबूती हंगामे से ही संभव है। क्या शोर शराबा और हंगामा ही बहस का उपकरण हो सकते हैं। लोकसभा के मंच से लगातार विपक्ष द्वारा यही कहा जा रहा है कि हंगामा हथियार हो गया है। विपक्ष के पास तथ्य नहीं है। विपक्ष को लगता है कि विपक्ष के पास तथ्य और तर्क से ज्यादा हंगामा और नारेबाजी के उपकरण ही हैं। विपक्ष सरकार को घेरने के अलावा और किसी लक्ष्य से प्रेरित नहीं है। वह राष्ट्रीय आवश्यकता की रणनीति पर कम और हंगामा द्वारा राजनीतिक बढ़त लेने का हथियार ज्यादा है।
सदन में अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर कम से कम विपक्ष से अपेक्षा की जा सकती है कि वह उत्तरदायी बने। प्रश्न पूछे। विकल्प दे। सुझाव रखे। सरकार को जवाबदेह बनाए। विपक्ष का यह भी कर्तव्य है कि वह सदन को हंगामे का मंच न बनाएं। वैकल्पिक विचार दे और संसदीय कार्यवाही को राष्ट्रहितैषी बनाए। संप्रभुता अभद्र नहीं होती। संसद सर्वोच्च संप्रभु संस्था है। विधि निर्मात्री है, संविधान संशोधन के अधिकार से भी लैस है। राज्यों के विधानमण्डल इसी की प्रतिछाया हैं, लेकिन संसद और विधानमण्डल स्वयं अपनी बनाई कार्यसंचालन नियमावली का अनुपालन नहीं करा पाते। राष्ट्र क्षुब्ध है।























