जानें क्या हैं समाजवाद के दो शब्द

सम्पन्नता और समता समाजवाद के दो महत्त्व पूर्ण शब्द हैं,समता और सम्पन्नता के बिना भय और षोषण विहिन मुक्त भारत सम्भव नहीं। डाॅ0 राम मनोहर लोहिया ने समाजवाद को दो शब्दों में परिभाषित किया।समाजवाद एक आर्थिक-सामाजिक दर्शन है। समाजवादी व्यवस्था में धन-सम्पत्ति का स्वामित्व और वितरण समाज के नियन्त्रण के अधीन रहते हैं। आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक प्रत्यय के तौर पर समाजवाद निजी सम्पत्ति पर आधारित अधिकारों का विरोध करता है। उसकी एक बुनियादी प्रतिज्ञा यह भी है कि सम्पदा का उत्पादन और वितरण समाज या राज्य के हाथों में होना चाहिए।डॉ0 राममनोहर लोहिया ने  समाजवाद को  दो शब्दों में परिभाषित किया-समता और सम्पन्नता। इन दो शब्दों में समाजवाद का पूरा मतलब निहित है। समता और सम्पन्नता जुडवाँ हैं। उन्होंने समता हासिल करने के लिए लिखा कि इनमें से हर मुद्दे में बारूद भरा हुआ है। किसी में कम किसी में ज्यादा। किसी भी एक मुद्दे को अपना लेने से बड़े-बड़े गुल खिलेंगे।

डॉ0 लोहिया कहते थे धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म। धर्म श्रेयस की उपलब्धि का प्रयत्न करता है और राजनीति बुराई से लड़ती है। यह कथन धर्म और राजनीति को परस्पर पूरक बना देने के साथ-साथ धर्म को रूढ़ियों और अंधविश्वास से मुक्त करने की प्रेरणा देता है और राजनीति को अधिकार, मद और स्वार्थपरता से दूर रहने की दृष्टि देता है। भारत के तीर्थ, भारत की नदियां, हिमालय, भारत की संस्कृति, भारतीय जन की एकता, भारत का इतिहास, वशिष्ठ, बाल्मीकि, रामायण आदि पर लिखे गये लेख उनकी मौलिक रचनाएं हैं। 

प्राथमिक शिक्षा के सभी विशेष स्कूल बंद किये जायें। अलाभकर जोतों से लगान अथवा मालगुजारी खत्म हो। संभव है कि इसका नतीजा हो सभी जमीन का अथवा लगान का खात्मा और खेतिहर आयकर की शुरूआत। 5 या 7 वर्ष की ऐसी योजना बने, जिसमें सभी खेतों को सिंचाई का पानी मिले। चाहे वह पानी मुफ्त अथवा किसी ऐसे दर पर या कर्ज पर कि जिससे हर किसान अपने खेत के लिए पानी ले सके। अंग्रेजी भाषा का माध्यम सार्वजनिक जीवन के हर अंग से हटे। हजार रुपए महीने से ज्यादा का खर्चा कोई व्यक्ति न कर सके। अगले बीस वर्ष के लिए रेलगाड़ियों में मुसाफिरी के लिए एक ही दर्जा हो। अगले 20 वर्षों के लिए मोटर कारखानों की कुल क्षमता बस, मशीन, हल और टैक्सी बनाने के लिए इस्तेमाल हो। कोई निजी इस्तेमाल की गाड़ी न बने। एक ही फसल के अनाज के दाम का उतार-चढ़ाव 20 प्रतिशत के अंदर हो,और जरूरी इस्तेमाल की उद्योगी चीजों के बिक्री के दाम लागत खर्च के डेढ़ गुना से ज्यादा न हों। पिछड़े समूहों यानी आदिवासी, हरिजन, औरतें हिंदू तथा अहिंदुओं की पिछड़ी जातियों को 60 प्रतिशत का विशेष अवसर मिले। जाहिर है कि यह विशेष अवसर ऐसे धंधों पर लागू नहीं होता जिसमें खास हुनर की आवश्यकता है। जैसे चीर-फाड़, किंतु थानेदारी और विधायकी ऐसे धंधों में नहीं गिने जा सकते। 2 मकानों से ज्यादा मकानी मल्कियत का राष्ट्रीयकरण, जमीन का असरदार बंटवारा और उसके दामों पर नियंत्रण। 

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